राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की सदस्यता जाने के बाद अचानक से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल ये चर्चा इसलिए शुरू हुई, क्योंकि इंदिरा गांधी की सदस्यता भी कोर्ट के आदेश के बाद चली गई थी, वो भी तब जब वो खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं। इसी के बाद देश में आपातकाल लग गया था, लेकिन रुकिए क्या आपको पता है इंदिरा गांधी की सदस्यता एक बार नहीं बल्कि दो बार गई थी। एक बार पीएम पद पर बने रहने के समय और एक बाद विपक्ष में होने के समय।
क्या है इंदिरा की कहानी
सबसे पहले बात करते हैं पहली बार सदस्यता जाने की। इस घटना की सबसे ज्यादा चर्चा होती है। इस केस को राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के नाम से जाना जाता है। हालांकि कानून की किताबों में इस उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण के नाम से जाना जाता है।
क्यों छिनी थी सदस्यता
साल 1971 की बात है। लोकसभा चुनाव चल रहा था। इंदिरा गांधी रायबरेली से मैदान में थीं, उनके सामने थे राजनारायण। राजनारायण को अपनी जीत को लेकर पूरा भरोसा था, लेकिन जब रिजल्ट आया तो राजनारायण हजारों वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे। राजनारायण को अपनी हार पर विश्वास नहीं हुआ और इंदिरा के खिलाफ कोर्ट पहुंच गए। वहां उन्होंने कई आरोप लगाए, जिसमें से दो में इंदिरा गांधी को दोषी ठहराया गया और उनका चुनाव रद्द कर दिया गया। जिसके बाद इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट गईं, वहां से पूरी तरह से राहत नहीं मिली और जिसके बाद अगले ही दिन इंदिरा ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी।
दूसरी बार की क्या है कहानी
दूसरी बार उनके सदस्यता तब छीनी गई जब वो चिकमंगलूर से उपचुनाव जीत कर संसद पहुंची थीं। दरअसल जब आपातकाल हटा तब फिर से इंदिरा के सामने रायबरेली में राजनारायण ही उतरे और उन्होंने इतिहास रचते हुए इंदिरा गांधी को हरा दिया। तब कांग्रेस को बड़ी हार मिली थी। लेकिन इंदिरा की लोकप्रियता कुछ ही दिनों में लौटने लगी। जनता के बीच वो जाने लगीं, इसी बीच कर्नाटक के चिकमंगलूर में उपचुनाव हुआ और इंदिरा वहां से चुनावी मैदान में उतर गईं। यहां से इंदिरा ने जीत भी हासिल कर ली और संसद पहुंच गईं।
मोरारजी देसाई का 'चक्रव्यूह'
इंदिरा गांधी लोकसभा तो पहुंच गईं, लेकिन तब देश के पीएम मोरारजी देसाई थे, जो इंदिरा के कट्टर विरोधी थे। पहले कांग्रेस में ही थे, बाद में इंदिरा से मतभेद होने पर अलग हो गए थे। जनता पार्टी को जीत मिली तो पीएम बने थे। यहां मोरारजी देसाई ने इंदिरा के खिलाफ चक्रव्यूह रच दिया। इंदिरा के खिलाफ पीएम पद पर रहने के दौरान सरकारी अफसरों का अपमान करने, पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगाकार प्रस्ताव पेश किया गया। प्रस्ताव पास हो गया। सात दिन की लंबी बहस के बाद इंदिरा के खिलाफ विशेषाधिकार समिति का गठन किया गया। जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इंदिरा के खिलाफ लगे आरोप सही हैं। उन्होंने पद का दुरुपयोग किया है। इसलिए इंदिरा गांधी की सदस्यता रद्द की जाती है। इस तरह से इंदिरा गांधी की सदस्यता दूसरी बार छिनी गई।
फिर जीती इंदिरा
इस बार सदस्यता के जाने के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता और बढ़ गई। उधर जनता पार्टी में कलह बढ़ता ही चला गया। सरकार गिर गई, पहले मोरारजी देसाई गए फिर चौधरी चरण सिंह आए, तीन साल में दो प्रधानमंत्री हुए, लेकिन सरकार दोनों की नहीं चली, जिसके बाद 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी फिर से प्रचंड बहुमत से जीतकर पीएम बन गईं।
