प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को लेकर केंद्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दलील
Presidential Reference: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए राष्ट्रपति संदर्भ में यह सवाल उठाया गया है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए निश्चित समय सीमा में बांधा जा सकता है। इस पर केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी लिखित दलीलें दाखिल की हैं। केंद्र सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि यदि अदालत राष्ट्रपति और राज्यपालों पर ऐसी समय सीमा थोपती है तो यह शक्तियों के नाजुक संतुलन(sepration of power) को बिगाड़ देगा और देश में संवैधानिक अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जाएगी।
एसजी तुषार मेहता के जरिए जो दलीलें दी गई हैं उसमें कहा गया है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को संविधान ने जो विवेकाधिकार की शक्तियां दी हैं, उसे सीमित करना न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों में दखल होगा। सरकार का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट या राज्यों के हाईकोर्ट इस तरह का आदेश देकर उन शक्तियों का इस्तेमाल करने लगेंगे संविधान ने उन्हें दिया ही नहीं है। केंद्र ने अदालत को आगाह भी किया है कि इस समय सीमा तय करने से न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जटिलता आएगी बल्कि यह सरकार और शासन की कार्यप्रणाली को भी असंतुलित करेगा। सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की भूमिका संविधान के मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लचीली होनी चाहिए न कि इसको किसी समय सीमा में बांधना चाहिए। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ 19 अगस्त से शुरू करेगी।
जब राष्ट्रपति को किसी महत्वपूर्ण कानूनी या संवैधानिक मसले पर स्पष्टता या उसकी विस्तृत व्याख्या की जरूरी होती है, तो वे सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 में ये प्रावधान किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ऐसे रेफरेंस पर अपनी कानूनी राय देता है। और यह राय लिखित में दी जाती है। जिसे राष्ट्रपति को भेजा जाता है, लेकिन यह राय बाध्यकारी नहीं होती। इसका मतलब राष्ट्रपति इसे मान भी सकते हैं और नहीं भी मान सकते हैं।
इसी साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि राष्ट्रपति और राज्यपाल विधेयकों को अपनी टेबल पर लटकाकर नहीं रख सकते। अपने आदेश में अदालत ने संकेत दिया था कि उन पर एक विधेयकों पर फैसला लेने के लिए एक उचित समय सीमा होनी चाहिए, ताकि ये तय हो सके कि विधेयक को मंजूरी मिलेगी या इसे अस्वीकार कर दिया जाएगा। इस आदेश के बाद राज्यों और राज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होने लगी। इसी संवैधानिक टकराव को रोकने लिए राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से प्रेसिडेंशियल रेफरेंस की मांग की।
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