Mother Funeral On Bicycle: कहा जाता है कि मां-बाप जिंदगी भर पेट काटकर बच्चों को इस उम्मीद में पालते हैं कि बुढ़ापे में वे उनका सहारा बनेंगे और मौत के बाद सम्मान से उन्हें विदा करेंगे। लेकिन ओडिशा के बरगढ़ जिले से आई एक मर्मांतक तस्वीर ने इंसानियत और खून के रिश्तों को शर्मसार कर दिया है। यहां एक मां के शव को चार कंधे तक नसीब नहीं हुए। आखिरकार, सिस्टम की बेरुखी और अपनों की बेदिली के बाद एक बेटी को अपनी बूढ़ी मां के शव को साइकिल पर बांधकर अंतिम संस्कार के लिए ले जाना पड़ा।
घंटों इंतजार के बाद भी नहीं आया छोटा बेटा
दिल को झकझोर देने वाला यह मामला बरगढ़ जिले के पाइकमाल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कांटापड़ा गांव का है। यहां रहने वाली 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला जयन्ती बछा का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। जयन्ती के बड़े बेटे की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। मां की सांसें थमने के बाद रिश्तेदारों ने उनके छोटे बेटे को तुरंत इसकी सूचना दी। परिवार को पूरी उम्मीद थी कि मां की मौत की खबर सुनकर बेटा सब छोड़कर भागा चला आएगा, लेकिन कलयुगी बेटा मां को आखिरी कंधा देने तो दूर, उनका चेहरा देखने तक नहीं पहुंचा।
न समाज आगे आया, न मिली सरकारी गाड़ी
परिजनों ने भारी मन से घंटों तक बेटे का रास्ता देखा, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी उम्मीदें टूट गईं। हद तो तब हो गई जब शव को सम्मानजनक तरीके से श्मशान घाट ले जाने के लिए कोई सरकारी एम्बुलेंस या शव वाहन भी उपलब्ध नहीं हो सका। ग्रामीण इलाकों में अक्सर शव यात्रा के लिए मिलने वाली सरकारी मदद इस गरीब परिवार तक नहीं पहुंच पाई। गांव के लोग और दूर के रिश्तेदार भी इस लाचार परिवार की मदद के लिए आगे नहीं आए।
साइकिल पर बांधा शव, देखने वालों की रो पड़ीं आंखें
जब अंतिम संस्कार के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा, तो जयन्ती बछा की बेटी, नाती और नातिन ने खुद ही मोर्चा संभाला। उन्होंने कुछ पड़ोसियों की मदद से शव को तैयार किया और उसे एक पुरानी साइकिल के कैरियर पर रस्सी से अच्छी तरह बांध दिया। इसके बाद बेटी और नाती साइकिल को पैदल ढकेलते हुए श्मशान घाट की ओर निकल पड़े। रास्ते में जिसने भी इस मंजर को देखा, उसकी आंखें नम हो गईं और हर कोई समाज की इस बेरुखी को कोसता नजर आया।
समाज के चेहरे पर तमाचा है यह घटना
साइकिल पर निकली इस अंतिम यात्रा ने देश की तरक्की और सामाजिक ताने-बाने पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। यह घटना सिर्फ एक परिवार की लाचारी नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि कैसे आज के दौर में रिश्ते केवल खुशियों के लेन-देन तक सिमट कर रह गए हैं। हालांकि, इस बेहद कठिन समय में बेटी और नातिन ने जिस तरह अपने कर्तव्य को निभाया, उसने यह साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होती हैं। ओडिशा की यह मार्मिक घटना आज हर संवेदनशील इंसान को सोचने पर मजबूर कर रही है।
