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'NCPCR सिर्फ कागजों पर नहीं रह सकता’, शिक्षा के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग (NCPCR) के रवैये पर नाराजगी जताई है। शीर्ष कोर्ट ने चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 फीसदी आरक्षण लागू करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR के रवैये पर नाराजगी जताई। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि आयोग की भूमिका सिर्फ राज्यों से आंकड़े जुटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे यह सुनिश्चित करने में भूमिका निभानी होगी कि कानून का उद्देश्य जमीन पर लागू हो।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा, “वे इतने उदासीन तरीके से कैसे काम कर सकते हैं? NCPCR को कौन चलाता है? हम अगले सुनवाई में उस अधिकारी को मौजूद रहने के लिए कहेंगे।” कोर्ट ने साफ किया कि यह अवमानना की कार्यवाही नहीं है, लेकिन आयोग को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

NCPCR चेयरपर्सन और डायरेक्टर को कोर्ट में पेश होने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। बेंच ने कहा कि कोर्ट ने एनसीपीसीआर से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ओर से जारी नियमों और प्रावधानों की जानकारी जुटाने को कहा था, लेकिन आयोग की भूमिका केवल “जानकारी जुटाने” तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आयोग को राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 के उद्देश्य को लागू कराने की दिशा में काम करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हर पड़ोस के स्कूल में इस व्यवस्था को लागू किया जाए।

क्या है RTE की धारा 12(1)(c)?

शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 12(1)(c) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त पड़ोस के स्कूलों को प्रवेश स्तर पर कम से कम 25 फीसदी सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूहों के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होती हैं। इन बच्चों को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट इसी प्रावधान के देशभर में लागू होने की निगरानी कर रहा है।

‘सिर्फ मुफ्त शिक्षा देना मकसद नहीं’

कोर्ट ने इस मामले में जनवरी में दिए अपने फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि 25 फीसदी आरक्षण का उद्देश्य केवल कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सामाजिक एकीकरण भी है यानी अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को एक ही पड़ोस के स्कूल में साथ पढ़ने का अवसर मिले। इसी निगरानी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को मामले में शामिल किया था और उसे राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा धारा 12(1)(c) को लागू करने के लिए बनाए गए नियमों और व्यवस्थाओं की जानकारी जुटाने को कहा था।

‘NCPCR की भूमिका बहुत बड़ी है’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। बेंच ने कहा कि आयोग एक वैधानिक संस्था है और कोर्ट के फैसले में एनसीपीसीआर से बड़ी उम्मीदें रखी गई हैं। कोर्ट ने कहा कि आयोग के नेतृत्व को यह समझना होगा कि उसके ऊपर कितनी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने आगे कहा कि आयोग को शिक्षा के अधिकार के कानून के तहत एक नियामक संस्था के तौर पर काम करना है और पड़ोस के स्कूलों में धारा 12 के उद्देश्य को वास्तविकता में बदलना होगा।

‘सिर्फ कागजों पर नहीं रहना चाहिए’

कोर्ट ने टिप्पणी की कि आयोग को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। “हम उन्हें और काम करने का अधिकार देंगे। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे सिर्फ कागजों पर हैं।” कोर्ट की चिंता यह थी कि राज्यों से आंकड़े और नियमों की जानकारी इकट्ठा करने के बाद अगला कदम क्या होगा यानी 25 फीसदी आरक्षण वास्तव में स्कूलों में लागू कैसे होगा?

27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने दी जानकारी

सुनवाई में कोर्ट को बताया गया कि 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने इस प्रक्रिया के तहत अपनी प्रतिक्रिया दी है। इसके अलावा केंद्रीय RTE नियमों का ड्राफ्ट भी राज्यों के साथ साझा किया गया है। हालांकि, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है और NCPCR को आगे भी कई कदम उठाने होंगे। इसी पर कोर्ट ने आयोग की भूमिका को और प्रभावी बनाने की बात कही।
Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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