Supreme Court News: पश्चिम बंगाल में फॉरेन ट्रिब्यूनल की गैरमौजूदगी देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अवैध विदेशी प्रवासियों को राहत दी है। कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए साफ किया है कि जमानत की शर्तों को पूरा करने के लिए संबंधित विदेशी नागरिक ट्रायल कोर्ट यानी संबंधित क्षेत्र की अदालत का रुख कर सकते हैं। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने अपने आदेश को स्पष्ट किया। कोर्ट के सामने यह बात रखी गई थी कि आदेश में फॉरेन ट्रिब्यूनल के सामने रिपोर्ट करने की शर्त लगाई गई है, जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ट्रिब्यूनल मौजूद नहीं है।
मूल रूप से 2011 में सामने आया था मामला
यह मामला उन विदेशी नागरिकों से जुड़ा है, जिन्हें फॉरेनर्स एक्ट के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद अपनी सजा पूरी करने के बावजूद पश्चिम बंगाल की जेलों या सुधार गृह में रखा गया था। मामला मूल रूप से 2011 में सामने आया था। एक याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर बताया था कि बांग्लादेशी नागरिकों को सजा पूरी होने के बाद भी जेल में रखा जा रहा है। उन्हें उनके देश वापस भेजे जाने तक हिरासत में रखा गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस पत्र पर स्वतः संज्ञान लिया था। बाद में 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट भेज दिया गया।
3 साल पहले सजा पूरी कर चुके लोगों को जमानत का आदेश
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने उन विदेशी नागरिकों को जमानत देने का रास्ता साफ किया था, जो अपनी सजा पूरी होने के तीन साल बाद भी पश्चिम बंगाल की जेलों में बंद थे। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे लोगों को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी जा सकती है। इनमें एक लाख रुपये के दो भारतीय जमानतदार, रिहाई के बाद रहने का सत्यापन योग्य पता बताना और बायोमेट्रिक जानकारी दर्ज कराने जैसी शर्तें शामिल थीं।
हर हफ्ते पुलिस स्टेशन में देनी होगी हाजिरी
पुराने आदेश में यह भी कहा गया था कि रिहा किए गए विदेशी नागरिक को हर सप्ताह उस पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा, जिसे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल तय करेगा। इसके अलावा पते में किसी भी बदलाव की जानकारी उसी दिन पुलिस को देनी होगी। पुलिस की ओर से हर तीन महीने में रिपोर्ट भी तैयार की जानी थी। अगर जमानत की शर्तों का उल्लंघन होता है तो संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लेकर ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की बात कही गई थी।
