Katchatheevu Island Dispute: भारत और श्रीलंका के बीच दशकों पुराने कच्चाथीवू द्वीप (Katchatheevu Island) समझौते को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। BJP के वरिष्ठ सांसद और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे (Nishikant Dubey) ने कांग्रेस नेतृत्व पर करारा हमला बोला है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर "कांग्रेस का काला अध्याय 102" शीर्षक से एक पोस्ट साझा करते हुए आरोप लगाया कि 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के इस रणनीतिक द्वीप को श्रीलंका को एक गिफ्ट के रूप में सौंप दिया था।
बिना सहमति के हुआ था समझौता
निशिकांत दुबे ने अपने विस्तृत पोस्ट में दावा किया कि 26 जून 1974 को हुए इस ऐतिहासिक समझौते के लिए तमिलनाडु के तत्कालीन नेतृत्व और वहां की जनता को भरोसे में नहीं लिया गया था। उन्होंने कहा कि नेहरू के जमाने से ही इस द्वीप को श्रीलंका को देने की बात चल रही थी। साल 1961 में जवाहरलाल नेहरू इस पर दस्तखत करना चाहते थे, लेकिन तब विदेश और कानून मंत्रालय ने इसका पुरजोर विरोध किया था।
नेहरू के निधन के बाद इंदिरा गांधी ने इस प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया। दुबे का संगीन आरोप है कि जून 1974 में इंदिरा गांधी ने विदेश सचिव को चेन्नई भेजकर तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्य सचिव को एक तरह से धमकाया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि को इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह दूर रखा गया था।
संविधान के उल्लंघन का आरोप
बीजेपी सांसद ने इस समझौते की संवैधानिक वैधता पर भी बड़े सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के मुताबिक देश की कोई भी जमीन किसी विदेशी ताकत को सौंपने के लिए संसद में कानून पास कराना अनिवार्य है, लेकिन नेहरू-गांधी परिवार ने न तो संविधान की परवाह की और न ही सुप्रीम कोर्ट की।
इस गलत फैसले का सबसे बड़ा खामियाजा आज तमिलनाडु के मछुआरे भुगत रहे हैं। पाक जलडमरू मध्य (Palk Strait) में स्थित इस 285 एकड़ के निर्जन द्वीप के श्रीलंका के पास चले जाने से भारतीय मछुआरों के पारंपरिक अधिकार छिन गए। निशिकांत दुबे ने कहा कि आज जब भी हमारे मछुआरे वहां समुद्र में जाते हैं, तो श्रीलंकाई सरकार उन्हें पकड़कर जेलों में डाल देती है और उन पर जुल्म ढाती है।
हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार कूटनीतिक रास्तों से हमारे मछुआरों की सुरक्षा और उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए श्रीलंकाई प्रशासन के संपर्क में रहता है, लेकिन इस पुराने समझौते ने भारतीय सीमा सुरक्षा पर एक स्थायी सवाल खड़ा कर दिया है।
