बेलागवी विवाद को लेकर कर्नाटक सरकार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है। कर्नाटक सरकार का मानना है कि किसी भी राज्य के पुनर्गठन अधिनियम को भाषाई आधार पर चुनौती देना असंवैधानिक है। 1956 में कर्नाटक राज्य के बनने बाद से ही तीन मराठी बोलने वाले इलाकों को महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग उठती रही है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2004 से ही राज्य पुनर्गठन आयोग को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है। इसी को लेकर आज कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने देश के जाने माने वकील मुकुल रोहतगी से मुलाकात की।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपना पक्ष इन बिंदुओं पर रखेगी:
1.किसी भी राज्य की सीमा या अस्तित्व का निर्धारण सिर्फ भाषाई आधार पर नहीं होता है।
2. किसी भी राज्य का बंटवारे का आधार वित्तीय-आर्थिक परिस्थितियों और प्रशासनिक कारकों को मद्देनजर रख कर किया जाता है।
3. ऐसे में किसी भी राज्य के पुनर्गठन अधिनियम को इस आधार पर चुनौती देना असंवैधानिक है कि मराठी भाषी लोग उस क्षेत्र में रहते हैं।
4. भारत के किसी भी राज्य को अपने ही सीमाओं में बदलाव करने का अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 3 किसी भी राज्य को ये अधिकार नहीं देता है। ऐसे में संसद किसी नए राज्य के गठन के लिए सिर्फ उसका परामर्श लेती है।
5. भारत का संघीय ढांचा संयुक्त राज्य अमेरिका से बिलकुल अलग है।
क्या है बेलागवी या बेलगाम विवाद?
1956 में जब कर्नाटक राज्य का पुनर्गठन किया गया था उस वक्त महाराष्ट्र के कुछ हिस्से कर्नाटक राज्य में आ गए। महाराष्ट्र ने 2806 वर्ग मील के इलाके पर अपना दावा कर रखा है जिसमें 814 गांव शामिल हैं। बेलागवी, कारवार और निप्पनी ये तीन बस्तियां स्वतंत्रता से पहले बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा थे। महाराष्ट्र का तर्क है ये कि इन सभी इलाकों में मराठी बोलने वाली आबादी बड़ी संख्या में रहती है साथ ही इन गांवों में रिकॉर्ड भी मराठी भाषा में रखे जाते हैं इसलिए इन्हें महाराष्ट्र में मिला देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का क्या है रुख?
2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि इस सीमा विवाद के मुद्दे को आपसी बातचीत से सुलझाया जाना चाहिये और भाषायी मानदंड पर विचार नहीं होना चाहिये क्योंकि इससे अधिक व्यावहारिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। हालांकि इस मामले की सुनवाई अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में चल रही है।
