NASA ISRO Moon Base Project: भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष संबंध अब एक नए आयाम (Orbit) में प्रवेश कर रहे हैं। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने मंगलवार को आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि नासा (NASA) ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को अपने महत्वाकांक्षी 'मून बेस (Moon Base) प्रोग्राम' में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। यह ऐतिहासिक निमंत्रण 5-6 अगस्त को इसरो मुख्यालय बेंगलुरु में आयोजित सिविल स्पेस जॉइंट वर्किंग ग्रुप (CSJWG) की 9वीं बैठक के बाद सामने आया है।
क्या है 'मून बेस' और कहां बनेगा यह ठिकाना?
नासा का मून बेस प्रोग्राम केवल एक बार जाकर वापस लौटने वाला चंद्रमा मिशन नहीं है, बल्कि यह इंसानों की लंबे समय तक रहने योग्य उपस्थिति दर्ज कराने का एक बहु-चरणीय प्रयास है।
कहां बनेगा बेस: मून बेस का निर्माण चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास किया जाएगा। यह वही क्षेत्र है जहां चंद्रयान-3 के जरिए भारत ने इतिहास रचा था।
कैसे होगा निर्माण: शुरुआत में रोबोटिक मिशन और तकनीकी प्रदर्शन किए जाएंगे। इसके बाद धीरे-धीरे इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर सिस्टम, कम्युनिकेशन, लॉजिस्टिक्स और हैबिटेशन (रहने योग्य आवास) विकसित किए जाएंगे।
समयसीमा: नासा ने अपने शुरुआती तीन मून बेस मिशनों की योजना तैयार कर ली है, जिनका पहला चरण 2026 के अंत या उसके बाद लॉन्च किया जाना तय है।
मिशन का मुख्य मकसद क्या है?
इसके पहले मकसद की बात करें तो यह चंद्रमा पर स्थायी मानव उपस्थिति के लिए अहम माना जा रहा है। चांद की सतह पर वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों के रहने, शोध करने और संसाधन जुटाने के लिए एक स्थायी ढांचा तैयार करना इसका मकसद है।
साथ ही आर्टमिस समझौते को जमीन पर उतारना है। भारत द्वारा हस्ताक्षरित 'आर्टमिस एकॉर्ड्स' (Artemis Accords) के शांतिपूर्ण और टिकाऊ अंतरिक्ष अन्वेषण के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देना भी इसका एक मकसद है।
साथ ही मंगल मिशन की तैयारी भी अहम होती है, क्योंकि मून बेस का उपयोग भविष्य के गहरे अंतरिक्ष मिशनों और मंगल ग्रह पर मानव को भेजने से जुड़ी तकनीकों के परीक्षण के लिए एक 'लॉन्चपैड' के रूप में किया जाएगा।

निसार (NISAR) से 'मून बेस' तक का सफर
इस साझेदारी से भारत को क्या बड़ी उपलब्धि मिलेगी?
ग्लोबल स्पेस लीडरशिप: चंद्रयान की सफलताओं के बाद, इस प्रोजेक्ट में शामिल होने से इसरो दुनिया की शीर्ष अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ तकनीक और डेटा साझा करने की अग्रिम पंक्ति में आ जाएगा।
तकनीकी बढ़त: मून हैबिटेशन, स्पेस पावर जनरेशन, एडवांस्ड रोबोटिक्स और गहरे अंतरिक्ष संचार जैसे क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों और निजी स्पेस स्टार्टअप्स को बड़ा एक्सपोजर मिलेगा।
कमर्शियल स्पेस सेक्टर को बढ़ावा: इस मिशन में नासा और इसरो के साथ-साथ निजी उद्योग की भी भागीदारी होगी, जिससे भारत के एयरोस्पेस इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा।
