UGC के नए नियमों पर सरकार में चल रहा मंथन, जल्द ही जारी कर सकती है SOP
- Edited by: अमित कुमार मंडल
- Updated Jan 28, 2026, 03:13 PM IST
सरकार का मानना है कि यूजीसी के नए नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक कदम हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि नियमों की व्याख्या या क्रियान्वयन के दौरान किसी समुदाय, छात्र या शिक्षक के साथ अन्याय न हो।
UGC नियमों पर सरकार का मंथन
New UGS Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर लगातार रोष बढ़ता जा रहा है। इसे लेकर सरकार भी एक्शन में आ गई है। सूत्रों के अनुसार यूजीसी के नए नियमों को लेकर फैली आशंकाओं पर सरकार जल्द स्थिति स्पष्ट करने जा रही है। इस मुद्दे पर मंत्रालय के भीतर लगातार मंथन चल रहा है और सभी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है। मंत्रालय सूत्रों के अनुसार यूजीसी नियमों को लेकर जो भ्रम और विरोध सामने आया है, उसे दूर करने के लिए मंत्रालय स्तर पर विस्तृत चर्चा हो रही है। चूंकि मामला इस समय सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में सरकार कानूनी दायरे में रहते हुए अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर सकती है।
सरकार जल्द ही जारी करेगी SOP
सरकारी सूत्रों का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य किसी भी वर्ग को निशाना बनाना नहीं है। नियमों के तहत गठित जांच समितियां निष्पक्ष होंगी और इनमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, ताकि किसी भी प्रकार के भेदभाव या एकतरफा कार्रवाई की आशंका न रहे। सूत्रों का कहना है कि जांच प्रक्रिया को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उन्हें देखते हुए सरकार जल्द ही SOP जारी करेगी। इस एसओपी में यह स्पष्ट किया जाएगा कि शिकायतों की जांच किस तरह होगी, अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी और दुरुपयोग की किसी भी संभावना को कैसे रोका जाएगा।
सरकार का मानना है कि यूजीसी के नए नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक कदम हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि नियमों की व्याख्या या क्रियान्वयन के दौरान किसी समुदाय, छात्र या शिक्षक के साथ अन्याय न हो। सूत्रों के मुताबिक स्थिति स्पष्ट होने के बाद सरकार संबंधित पक्षों छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और संस्थानों से संवाद भी बढ़ा सकती है ताकि सभी आशंकाओं का समाधान किया जा सके और नियमों को लेकर व्याप्त भ्रम खत्म हो।
सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के हाल में अधिसूचित एक नियम को चुनौती देने वाली उस याचिका पर सुनवाई के लिए बुधवार को सहमति जताई, जिसमें यह दलील दी गई है कि नियम में जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग करने वाले वकील की दलीलों पर गौर किया।
वकील ने कहा, सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव बढ़ सकता है। मेरा मुकदमा ‘राहुल दीवान एवं अन्य बनाम भारत सरकार’ है। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, हमें पता है कि क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि खामियां दूर कर दी जाएं। हम इसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगे। भेदभाव की शिकायतों की जांच और समता को बढ़ावा देने के लिए सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समता समिति गठित करने को अनिवार्य करने वाले नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 के तहत इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। याचिका में कहा गया है कि नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित कर दिया गया है। इन नियमों के खिलाफ विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं, जहां छात्र समूह और संगठन इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
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