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Power Corridor: आधी रात को भी फोन कर बुला लेते थे सीएम योगी, पूर्व DGP ओ.पी. सिंह ने खोले यूपी पुलिसिंग के बड़े राज

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) ओ.पी. सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत के खास पॉडकॉस्ट 'पॉवर कॉरिडोर' में अपने अनुभव साझा किए। इस दौरान उन्होंने यूपी की पुलिसिंग,राजनीतिक दबाव,योगी सरकार की कार्यशैली,माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई और कई चर्चित घटनाओं पर खुलकर बात की।

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पूर्व डीजीपी ओपी सिंह का बेबाक इंटरव्यू।

क्या 2017 के बाद उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था में वाकई बड़ा बदलाव आया? क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आधी रात को भी अधिकारियों से काम का हिसाब लेते थे? क्या अतीक अहमद को पहली बार गिरफ्तार करने की कोशिश ओ.पी. सिंह ने की थी? और क्या रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले आया फर्रुखाबाद बंधक कांड उनके पूरे करियर पर भारी पड़ सकता था?

इन तमाम सवालों का जवाब उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) ओ.पी. सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत के खास पॉडकॉस्ट 'पॉवर कॉरिडोर' में दिया। इस दौरान डॉ रमा सोलंकी से बात करते हुए करीब 37 साल तक पुलिस सेवा में रहे ओपी सिंह ने अपने अनुभव साझा किए। करीब एक घंटे के इस पॉडकास्ट में उन्होंने यूपी की पुलिसिंग,राजनीतिक दबाव,योगी सरकार की कार्यशैली,माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई और कई चर्चित घटनाओं पर खुलकर बात की।

क्या शिक्षक से IPS बनने का फैसला आसान था?

इस सवाल के जवाब में ओ.पी. सिंह ने बताया कि उन्होंने रांची, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। भारतीय पुलिस सेवा में आने से पहले वे दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में लेक्चरर थे। उन्होंने कहा कि शिक्षक का जीवन सम्मानजनक था, लेकिन उन्हें लगा कि पुलिस अधिकारी बनकर वे समाज के ज्यादा करीब रहेंगे और लोगों की सुरक्षा कर सकेंगे।

उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी केवल कानून लागू नहीं करता,बल्कि संकट में फंसे व्यक्ति को भरोसा और सुरक्षा का एहसास भी देता है। यही सोच उन्हें आईपीएस सेवा तक लेकर आई।

क्या 2017 से पहले यूपी पुलिस बैकफुट पर थी?

इस सवाल पर ओ.पी. सिंह ने कहा कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध, फिरौती के लिए अपहरण, माफियाओं का प्रभाव और सांप्रदायिक दंगे बड़ी चुनौती थे। उन्होंने कहा तब पुलिस कई मामलों में रक्षात्मक स्थिति में नजर आती थी। उन्होंने कहा कि 2017 के बाद सरकार ने सबसे पहले कानून के राज को मजबूत करने पर जोर दिया। संगठित अपराधियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई हुई। अपराधियों की अवैध संपत्तियां जब्त की गईं और पुलिस को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया गया। इसी दौरान 112 इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम को बेहतर किया गया और पुलिस के रिस्पॉन्स टाइम को लगभग 23 मिनट से घटाकर 10 मिनट तक लाया गया।

क्या योगी आदित्यनाथ आधी रात में भी काम का अपडेट लेते थे?

पूर्व डीजीपी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली का जिक्र करते हुए कहा कि वे बेहद अनुशासित और परिणाम पर केंद्रित प्रशासक हैं। उन्होंने बताया कि कई बार रात में डिनर के दौरान भी मुख्यमंत्री कार्यालय से फोन आ जाता था और बैठक के लिए बुलाया जाता था। यदि किसी काम की जिम्मेदारी दी गई होती थी तो उसका फॉलो-अप भी तुरंत होता था।

ओ.पी. सिंह ने दावा किया कि एक बार 4 हजार रुपये की लूट की घटना पर भी मुख्यमंत्री ने सीधे उनसे जवाब मांगा। उनके मुताबिक, इससे साफ था कि कानून-व्यवस्था से जुड़ा कोई भी मामला उनके लिए छोटा नहीं था। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस संसाधनों की जरूरत बताने पर मुख्यमंत्री ने विभाग का बजट करीब 18 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर 24,500 करोड़ रुपये तक कर दिया।

क्या अतीक अहमद से पहली भिड़ंत ओ.पी. सिंह की हुई थी?

पूर्व डीजीपी ने बताया कि जब अतीक अहमद पहली बार विधायक बना था,तब वे इलाहाबाद में एसपी सिटी थे। उन्होंने कहा कि अतीक ने उनके एक सब-इंस्पेक्टर को फोन पर गालियां दी थीं। इससे आहत होकर पुलिसकर्मी ने उन्हें पूरी घटना बताई। इसके बाद उन्होंने तत्काल अतीक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और खुद गिरफ्तारी के लिए निकले। हालांकि बाद में राजनीतिक दबाव के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।

क्या राजनीतिक दबाव हमेशा पुलिस के काम में आता है?

इस सवाल पर ओ.पी. सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का अपनी बात रखना स्वाभाविक है। लेकिन अगर कोई दोषी व्यक्ति को बचाने के लिए दबाव बनाया जाए,तभी उसे राजनीतिक दबाव कहा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई विधायक किसी निर्दोष व्यक्ति के बारे में शिकायत करता है और जांच में बात सही निकलती है तो उसे दबाव नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि का अधिकार माना जाना चाहिए।

क्या स्टेट गेस्ट हाउस कांड में उन्हें बलि का बकरा बनाया गया था?

1995 के चर्चित स्टेट गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए ओपी सिंह ने कहा कि घटना वाले दिन ही उन्होंने एसएसपी लखनऊ का कार्यभार संभाला था। उन्होंने बताया कि सूचना मिलते ही वे और तत्कालीन जिलाधिकारी मौके पर पहुंचे,भीड़ को नियंत्रित किया और मायावती की सुरक्षा सुनिश्चित कराई। इसके बावजूद उन्हें निलंबित कर दिया गया। हालांकि उन्होंने कहा कि बाद में जांच में उन्हें दोषमुक्त पाया गया और उनकी सेवा बहाल कर दी गई।

क्या 2019 का कुंभ यूपी पुलिस की सबसे बड़ी परीक्षा था?

ओ.पी. सिंह ने कहा कि 2019 का प्रयागराज महाकुंभ उनके पूरे करियर की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में शामिल था। करीब 25 करोड़ श्रद्धालुओं की मौजूदगी, आतंकवादी खतरे और भीड़ प्रबंधन जैसी चुनौतियों के बावजूद आयोजन बिना किसी बड़ी घटना के संपन्न हुआ। उन्होंने कहा कि इसके पीछे महीनों की तैयारी, तकनीक, इंटेलिजेंस नेटवर्क और लगातार निगरानी का बड़ा योगदान था।

क्या रिटायरमेंट से एक दिन पहले पूरा करियर दांव पर लग गया था?

ओ.पी. सिंह ने बताया कि 30 जनवरी 2020 को, रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले, फर्रुखाबाद में एक व्यक्ति ने 21 बच्चों को बंधक बना लिया।उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनसे कहा था कि अगर एक भी बच्चे को नुकसान पहुंचा तो उनके पूरे कार्यकाल की उपलब्धियां धुंधली पड़ जाएंगी। इसके बाद आनन-फानन में यूपी एटीएस को सक्रिय किया गया। रातभर चले ऑपरेशन में सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और आरोपी मारा गया। उन्होंने इसे अपने पूरे करियर का सबसे तनावपूर्ण ऑपरेशन बताया।

क्या पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू करना आसान था?

ओ.पी. सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू कराने के लिए उन्होंने कई राज्यों का अध्ययन किया और विस्तृत प्रस्तुति तैयार की। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसके फायदे समझाए, जिसके बाद 2020 में लखनऊ और नोएडा में इसे लागू किया गया। उनके अनुसार, आज कई जिलों में यह व्यवस्था सफलतापूर्वक काम कर रही है।

क्या पुलिस सुधार सिर्फ अपराधियों पर कार्रवाई तक सीमित थे?

पूर्व डीजीपी ने कहा कि उनके कार्यकाल में पुलिस के व्यवहार और मनोबल पर भी बराबर ध्यान दिया गया। उन्होंने 'कॉप ऑफ द मंथ' जैसी पहल शुरू की, जवानों के साथ संवाद बढ़ाया और सोशल मीडिया सेल बनाकर आधुनिक पुलिसिंग को बढ़ावा दिया। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों को संवेदनशील व्यवहार का प्रशिक्षण दिया गया ताकि जनता के बीच पुलिस की सकारात्मक छवि बने।

क्या पुलिस का सबसे बड़ा हथियार सिर्फ सख्ती है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पुलिस की सबसे बड़ी ताकत केवल सख्ती नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। उन्होंने कहा कि एक अच्छा पुलिस अधिकारी वही है जो कानून का पालन कराने के साथ-साथ लोगों में सुरक्षा और भरोसे की भावना भी पैदा करे। यही वजह है कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में संवाद, तकनीक, प्रशिक्षण और नेतृत्व को पुलिसिंग का सबसे अहम आधार माना।
Dr Rama Solanki
डॉ रमा सोलंकीauthor

डॉ. रमा सोलंकी टीवी और डिजिटल मीडिया में 17 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट हैं, जिन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है। वह प्रभावशाली स्टोरीटेलिंग और डिजिटल इनोवेशन के संयोजन के लिए जानी जाती हैं। वह एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, डॉक्यूमेंट्री और ऑडियंस-सेंट्रिक कंटेंट के निर्माण में विशेष दक्षता रखती हैं। डॉ. सोलंकी शासन, जवाबदेही और जनहित से जुड़े राजनीतिक व खोजी कार्यक्रमों के निर्माण और एंकरिंग के लिए भी पहचान रखती हैं। आध्यात्मिक कंटेंट प्रोडक्शन में विशेषज्ञता रखते हुए उन्होंने लोकप्रिय टीवी और डिजिटल सीरीज का निर्माण व निर्देशन किया है, जिन्हें दर्शकों से व्यापक सराहना मिली। डिजिटल मीडिया में पीएचडी धारक डॉ. रमा सोलंकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कथाओं को आधुनिक प्रस्तुति और समकालीन संदर्भों से जोड़ने के लिए जानी जाती हैं।

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