Sonia Gandhi citizenship : कांग्रेस की संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी की नागरिकता से जुड़े मामले में दिल्ली की एक अदालत के आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने मंगलवार को सवाल उठाए। भंडारी ने पूछा कि सोनिया गांधी को वोट दिलवाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने फर्जी दस्तावेज बनवाए? भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि संविधान के मुताबिक भारत का नागरिक ही मतदान करने का पात्र है जबकि उस समय सोनिया गांधी भारत की नागरिक नहीं थी।
‘वोट चोरी’ वाले लोकतंत्र की चोरी में शामिल हैं-भंडारी
दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए भंडारी ने कहा, 'भारत का संविधान कहता है कि वोट देने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना जरूरी है। 1980 में सोनिया गांधी भारत की नागरिक नहीं थीं। 1980 में अदालत में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें पूछा गया था कि जब सोनिया गांधी भारत की नागरिक नहीं थीं, तो उन्हें वोट डालने की अनुमति किस आधार पर दी गई? क्या उन्होंने दस्तावेजों में जालसाजी करने की कोशिश की थी? कल दिल्ली की एक अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत को इस बात की जांच करने का आदेश दिया कि क्या कोई संज्ञेय अपराध हुआ था। जो लोग ‘वोट चोरी’ की बात कर रहे हैं, वे लोकतंत्र की चोरी में शामिल हैं।'
'इस मामले की जांच की जानी चाहिए'
भाजपा प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आप अदालत की टिप्पणी देखें, तो उसमें कहा गया है कि जिस मजिस्ट्रेट अदालत ने मामले को खारिज कर दिया था, उसने अपने विवेक का उचित इस्तेमाल नहीं किया और संज्ञेय अपराध के खुलासे से जुड़े अपने मूल दायित्व का निर्वहन नहीं किया। अदालत का भी मानना है कि इस मामले की जांच की जानी चाहिए।'
कोर्ट ने सुनवाई का रास्ता साफ किया
दरअसल, दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का नाम 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले मतदाता सूची में शामिल किए जाने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के अनुरोध संबंधी याचिका पर फिर से सुनवाई का सोमवार को रास्ता साफ कर दिया। सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गांधी के खिलाफ आरोपों की जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था।
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने का यह आदेश राउज एवेन्यू अदालतों की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दायर शिकायत पर मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर आया।
'अदालत के आदेश में कानून के प्रति निष्ठा होनी चाहिए'
आदेश के महत्वपूर्ण हिस्सों को मौखिक रूप से पढ़ते हुए न्यायाधीश ने कहा, 'अदालत के आदेश में कानून के प्रति निष्ठा होनी चाहिए, न कि तथ्यों के साथ खिलवाड़। इस कसौटी पर जब यह न्यायालय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) द्वारा पारित किए गए इस आदेश को देखता है, तो इसमें खामियां पाता है।’न्यायाधीश ने कहा कि त्रिपाठी की शिकायत थी कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित रूप से अवैध तरीके से दर्ज किया गया था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 1983 में हासिल की थी। हालांकि, नाम 1982 में हटा दिया गया था, लेकिन 1983 में उसे फिर से शामिल कर लिया गया।
एसीजेएम के आदेश में इसका कुछ भी उल्लेख नहीं
न्यायाधीश ने कहा, 'इसमें आरोप लगाया गया था कि यह दोबारा नाम शामिल किया जाना भी 30 अप्रैल, 1983 को उनके द्वारा नागरिकता हासिल किए जाने से पहले हुआ था।’उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह बिना सबूत के कोरे दावों पर आधारित थी, जिसमें धोखाधड़ी और जालसाजी की जरूरी जानकारी नहीं थी, तथा शिकायत 1980 की अप्रमाणित मतदाता सूची की फोटो कॉपी की फोटो कॉपी पर आधारित थी। न्यायाधीश ने कहा कि एसीजेएम के आदेश में इसका कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में कैसे शामिल किया गया, 1982 में हटाया गया और फिर 1983 में दोबारा दर्ज किया गया।
शिकायत खारिज करना सही फैसला नहीं था-कोर्ट
न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित आदेश में यह पता लगाने के बजाय कि क्या इन आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है, शिकायत को बस जरूरी जानकारी की कमी वाला बताकर खारिज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के हिस्से को भी यह कहते हुए सतही तौर पर खारिज कर दिया गया कि यह '1980 की कथित अप्रमाणित मतदाता सूची के हिस्से की फोटो कॉपी की फोटो कॉपी’है। उन्होंने कहा, 'एसीजेएम के समक्ष सीमित अनुरोध यह था कि मतदाता सूची के अंश और अन्य आरोपों को पर्याप्त माना जाए, या फिर सोनिया गांधी का नाम कथित तौर पर धोखाधड़ी से दर्ज किए जाने के मामले में जांच का आदेश दिया जाए।’
(एजेंसी इनपुट)
