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असम चुनाव: बदले समीकरणों के बीच ‘अहोम फैक्टर’ से बढ़ी सियासी अनिश्चितता

असम विधानसभा चुनाव पहली नजर में भले ही बीजेपी के लिए सहज दिखते हों, लेकिन जमीनी सियासत इसके उलट एक जटिल तस्वीर पेश कर रही है। परिसीमन के बाद बदले आंकड़े, मुस्लिम वोटों का संभावित बंटवारा और अपर असम में उभरती अहोम अस्मिता, इन सभी कारकों ने चुनाव को दिलचस्प और अनिश्चित बना दिया है।

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असम में कांग्रेस-AIUDF की टक्कर में ओवैसी की एंट्री, क्या भाजपा को होगा इसका फायदा?

Photo : IANS

Asaam Assembly Election 2026: परिसीमन के बाद असम राज्य में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 39 से घटकर 22 रह गई है। कागज़ी तौर पर यह बदलाव बीजेपी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। इन सीटों पर कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के बीच सीधा मुकाबला है, जबकि असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री ने मुकाबले को और बहुकोणीय बना दिया है। ऐसे में वोटों के बंटवारे की संभावना बीजेपी के पक्ष में जाती दिखती है, लेकिन चुनावी तस्वीर सिर्फ इन सीटों तक सीमित नहीं है।

अपर असम बना चुनाव का असली रणक्षेत्र

चुनाव का असली मुकाबला अब अपर असम में सिमटता नजर आ रहा है, जहां अहोम समुदाय का प्रभाव निर्णायक है। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी , अमित शाह और हेमंता बिस्वा सरमा इस क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। यहां मुकाबला सीधा नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समीकरणों पर टिका हुआ है।

गौरव गोगोई और अस्मिता की राजनीति

कांग्रेस के गौरव गोगोई अपर असम में एक मजबूत चेहरे के रूप में उभरे हैं। इस क्षेत्र में पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा तेजी से केंद्र में आ रहा है। करीब 10 प्रतिशत माने जाने वाले अहोम वोट बैंक में अगर असंतोष संगठित होता है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इस बीच राहुल गाँधी भी समय-समय पर सांस्कृतिक मुद्दों को उठाकर इस नैरेटिव को धार देने की कोशिश कर रहे हैं।

‘अस्मिता बनाम शासन मॉडल’ की सीधी टक्कर

इस बार का चुनाव पारंपरिक बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की राजनीति से आगे निकल चुका है। अब मुकाबला “अस्मिता बनाम शासन मॉडल” का बन गया है। एक ओर हेमंता बिस्वा सरमा विकास, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस पहचान और असुरक्षा के सवालों को केंद्र में रख रही है।

विपक्ष की बिखरी ताकत या आखिरी वक्त की एकजुटता?

कांग्रेस और AIUDF के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा फिलहाल बीजेपी को राहत देती दिखती है। हालांकि, अगर चुनाव के अंतिम चरण में विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण होता है, तो तस्वीर अचानक बदल सकती है। वहीं अखिल गोगोई जैसे क्षेत्रीय नेता भी इस समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

बढ़त के बावजूद बीजेपी अलर्ट मोड में

बढ़त के संकेतों के बावजूद बीजेपी ने अपने प्रचार अभियान में कोई ढिलाई नहीं दिखाई है। शीर्ष नेतृत्व लगातार मैदान में डटा हुआ है, जिससे साफ है कि पार्टी इस चुनाव को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। असम की राजनीति में अक्सर आंकड़ों से ज्यादा माहौल निर्णायक साबित होता है। कुल मिलाकर, बीजेपी के लिए चुनौती सिर्फ मुस्लिम बहुल सीटों का गणित नहीं, बल्कि अपर असम का “खामोश वोटर” है। अगर यह खामोशी टूटी, तो आसान दिख रही लड़ाई भी कड़ी हो सकती है। असम की सियासत की यही खासियत है जहां आंकड़े कुछ और कहते हैं, लेकिन नतीजे अक्सर अलग कहानी लिखते हैं।

Himanshu Tiwari
हिमांशु तिवारीauthor

हिमांशु तिवारी एक पत्रकार हैं जिन्हें प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का 16 साल का अनुभव है। मैंने अपना करियर क्राइम रिपोर्टर के रूप में शुरू किया था लेकिन बाद में पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में शिफ्ट हो गया। पिछले 12 से अधिक वर्षों से बीजेपी, आरएसएस को कवर कर रहे हैं, कुछ आम चुनावों और कई विधानसभा चुनावों की सटीक रिपोर्टिंग भी की है। "सारी दुनिया एक मंच है" और इसलिए रंगमंच और नाटक लिखने में गहरी रुचि है।

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