Delhi Riots 2020 : साल 2020 के दिल्ली दंगा मामले में दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल किया। इस हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने गंभीर आरोप लगाए हैं। पुलिस का आरोप है कि 2020 के दिल्ली दंगे साजिश का नतीजा थे और इन संगठित दंगों के जरिए 'रिजीम चेंज ऑपरेशन' को अंजाम देने की असफल कोशिश हुई। पुलिस ने कहा है कि जांच में मिले चश्मदीद, दस्तावेजी और तकनीकी सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि दंगे एक गहरी साम्प्रदायिक साजिश के तहत रचे गए थे। पुलिस का दावा है कि इस दिल्ली दंगे का मास्टरमाइंड उमर खालिद था।
'अन्य राज्यों में दिखा दिल्ली हिंसा जैसा पैटर्न'
अपने इस हलफनामे में पुलिस ने कहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ जनविरोध को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। पुलिस के अनुसार, इस पूरे अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता और अखंडता पर चोट करना था। दिल्ली पुलिस ने शीर्ष अदालत को बताया कि यह हिंसा सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। इसी तरह की हिंसा का पैटर्न उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, केरल और कर्नाटक सहित कई राज्यों में भी देखने को मिला। पुलिस ने इसे राष्ट्रव्यापी संगठित हिंसा का एक पैटर्न बताया है।
दावा-आरोपियों ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया
पुलिस का दावा है कि उमर खालिद, शरजील समेत अन्य आरोपियों ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया। हलफनामा में खालिद का नाम कई बार आया है। हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने कुछ आरोपियों जिनमें उमर खालिद, शरजील इमाम जैसे नाम शामिल हैं पर न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। पुलिस ने कहा कि इन लोगों ने जानबूझकर देरी की रणनीति अपनाई और गैर-जरूरी अर्जियों एवं सामूहिक असहयोग के जरिए मुकदमे की प्रक्रिया को धीमा किया।
जांच में मिले अहम एवं मजबूत सबूत
पुलिस ने कहा है कि उनके पास वीडियो फुटेज, कॉल डिटेल्स, सोशल मीडिया चैट्स और गवाहों के बयान जैसे कई सबूत हैं, जो इस साजिश की गहराई को दिखाते हैं। अधिकारियों ने कहा कि यह केवल अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, बल्कि योजनाबद्ध अभियान था जिसमें संगठनों और व्यक्तियों की सक्रिय भूमिका थी।
'दंगों का मकसद भारत की संप्रभुता-एकता पर प्रहार करना था'
उमर खालिद और अन्य की जमानत याचिका के जवाब में दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे एक योजनाबद्ध 'रेजीम चेंज ऑपरेशन' का हिस्सा थे, जिनका मकसद भारत की संप्रभुता और एकता पर प्रहार करना था। यह हलफनामा उमर खालिद बनाम राज्य (दिल्ली सरकार) मामले और उससे जुड़े पांच अन्य मामलों में दाखिल किया गया है।
CAA विरोध के नाम पर रची गई देशविरोधी साजिश
दिल्ली पुलिस ने कहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ आंदोलन को हथियार बनाकर जनता को भड़काने और हिंसा फैलाने की साजिश रची गई थी। हलफनामे में कहा गया योजना का उद्देश्य भारत की अखंडता को चोट पहुंचाना था, ताकि देश में सांप्रदायिक वैमनस्य फैले और सार्वजनिक व्यवस्था ध्वस्त हो।
ट्रंप की यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की थी योजना
पुलिस का दावा है कि साजिश इस तरह बनाई गई थी कि यह हिंसा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान हो, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भारत की ओर खिंचे और देश को वैश्विक स्तर पर बदनाम किया जा सके। हलफनामे के अनुसार, चैट और डिजिटल साक्ष्य यह दिखाते हैं कि सीएए का विरोध वैश्विक कैम्पेन के रूप में इस्तेमाल किया गया ताकि भारत को मुस्लिम विरोधी देश के रूप में पेश किया जा सके।
देशभर में एक जैसे दंगे-यूपी, बंगाल, केरल और असम में भी हिंसा
दिल्ली पुलिस ने कहा कि इस साजिश का असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं था। समान पैटर्न की हिंसा देश के कई राज्यों में फैली।
1.उत्तर प्रदेश के 20 जिलों में हिंसा, 19 से अधिक मौतें, 370 एफआईआर दर्ज।
2.असम में 5 लोगों की मौत, 175 गिरफ्तारियां।
3.पश्चिम बंगाल में रेलवे संपत्ति को ₹70 करोड़ से अधिक का नुकसान।
4.केरल, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाएं।
उमर खालिद की भूमिका गहरी और केंद्रीय
हलफनामे के मुताबिक, उमर खालिद को इस साजिश का मुख्य रणनीतिकार बताया गया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप और जामिया को-ऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) जैसी इकाइयां बनाईं, जो हिंसा फैलाने के लिए समन्वय का काम कर रही थीं। पुलिस ने कहा कि उमर ने कई बैठकों में भाग लिया, भाषण दिए और चक्का जाम को हिंसक आंदोलन में बदलने की योजना तैयार की।
उपद्रव-हिंसा के लिए हुईं कई गुप्त बैठकें
पुलिस के अनुसार, दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 के बीच कई गुप्त बैठकें हुईं। इन बैठकों में सोशल मीडिया, पर्चों और भाषणों के जरिए भीड़ जुटाने की योजना बनाई गई। पुलिस का कहना है कि स्टूडेंट्स ऑफ जामिया और मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ जेएनयू जैसे व्हाट्सएप ग्रुप का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए किया गया।
53 लोगों की मौत और 753 FIR:दंगे की भयावहता
हलफनामे में कहा गया कि इन दंगों में 53 लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए और 753 एफआईआर दर्ज की गईं। सार्वजनिक और निजी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। पुलिस ने कहा कि यह कोई स्वतःस्फूर्त दंगा नहीं था, बल्कि योजनाबद्ध हमले थे जो दिल्ली को जलाने के लिए किए गए।
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग- जानबूझकर मुकदमे में देरी
दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद और अन्य आरोपियों पर अदालत की प्रक्रिया को जानबूझकर बाधित करने का आरोप लगाया। हलफनामे में कहा गया कि धारा 207 CrPC की कार्यवाही पूरी होने में दो साल लगे क्योंकि आरोपी बार-बार स्थगन लेते रहे। यह भी कहा गया कि आरोप तय करने की प्रक्रिया में आरोपी 50 से अधिक तारीखों पर अनुपस्थित रहे या बहाने बनाते रहे। दिल्ली हाई कोर्ट के तस्लीम अहमद बनाम राज्य फैसले का हवाला देते हुए पुलिस ने कहा कि मुकदमे में देरी के लिए आरोपी खुद जिम्मेदार हैं।900 गवाहों का तर्क मात्र दिखावा-आरोपी
पुलिस ने कहा कि आरोपी बार-बार यह तर्क दे रहे हैं कि केस में 900 गवाह हैं, इसलिए मुकदमा लंबा चलेगा। लेकिन पुलिस का कहना है कि केवल 150-200 गवाह ही मुख्य हैं, जिनसे जिरह में ज्यादा समय नहीं लगेगा, यदि आरोपी सहयोग करें। पुलिस ने यह भी बताया कि 58 गवाहों ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए हैं और 47 गवाहों को सुरक्षा दी गई है।यूएपीए के तहत जमानत का कोई अधिकार नहीं
दिल्ली पुलिस ने गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024) मामले का हवाला देते हुए कहा कि यूएपीए अधिनियम की धारा 43D(5) के तहत जमानत अपवाद है, नियम नहीं। पुलिस ने कहा, जब किसी के खिलाफ गंभीर आरोप प्रथम दृष्टया साबित हों, तब जमानत नहीं दी जा सकती। इन आरोपियों ने जिस साजिश में भूमिका निभाई, वह राष्ट्र की जड़ों को हिलाने के समान है।पूर्व अपीलें वापस लीं, अब नई याचिकाएं दाखिल की गईं
पुलिस ने बताया कि उमर खालिद और अन्य सह-आरोपी पहले भी जमानत के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गए थे, लेकिन बिना दलील दिए याचिकाएं वापस ले लीं। हलफनामे में कहा गया, पहले जिन याचिकाओं को खुद वापस लिया गया, अब उन्हीं बिंदुओं पर नई याचिकाएं दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है।
विलंब को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता
पुलिस ने कहा कि आरोपी लंबे समय से जेल में हैं, लेकिन यह देरी उनकी अपनी वजह से हुई। हाई कोर्ट ने भी माना कि आरोपी खुद मुकदमे की प्रक्रिया को खींच रहे हैं ताकि बाद में यही बहाना बनाकर जमानत ले सकें। सुप्रीम कोर्ट से कहा गया है कि लंबी हिरासत के आधार पर जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता, जब विलंब स्वयं आरोपियों की वजह से हुआ हो।
हलफनामे में कई तकनीकी सबूतों का जिक्र है जिसमें
- व्हाट्सएप ग्रुप्स में साजिश के संदेश
- विदेशी हस्तियों का हवाला देकर विरोध का एजेंडा फैलाना
- सोशल मीडिया पोस्ट जिनमें हिंसा का समर्थन या उकसावा था
इसे केवल स्थानीय दंगे के रूप में न देखे कोर्ट-पुलिस
पुलिस ने कहा कि ये डिजिटल सबूत दंगों में आरोपियों की सीधी भागीदारी दिखाते हैं। न्यायालय को इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश के रूप में देखना चाहिए। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि अदालत इस मामले को केवल एक स्थानीय दंगे के रूप में न देखे, बल्कि इसे भारत की संप्रभुता के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रायोजित अभियान माने। हलफनामे में कहा गया, ऐसे संगठित दंगों को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'रेजीम चेंज ऑपरेशन' कहा जाता है, जिनका उद्देश्य लोकतांत्रिक सरकारों को कमजोर करना होता है।
