Canada CSIS Blames Khalistanis: भारत और कनाडा के राजनयिक संबंधों के बीच चल रहे ऐतिहासिक तनाव के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। वर्ष 1985 में हुए एयर इंडिया के विमान 'सम्राट कनिष्क' (फ्लाइट 182) ब्लास्ट के चार दशक से भी अधिक समय बाद, कनाडा की मुख्य खुफिया एजेंसी 'कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा' (CSIS) ने आखिरकार सच को स्वीकार कर लिया है। कनाडाई इतिहास के सबसे बड़े और जघन्य आतंकवादी हमले के लिए CSIS ने आधिकारिक तौर पर 'कनाडा स्थित खालिस्तानी आतंकवादियों' को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है।
CSIS ने पहली बार खुलकर लिया 'खालिस्तान' का नाम
विमान हादसे की बरसी के मौके पर जारी एक आधिकारिक सोशल मीडिया बयान में कनाडाई खुफिया एजेंसी ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर अलगाववादी आंदोलन को इस कत्लेआम का सूत्रधार बताया। CSIS ने लिखा, '23 जून, 1985 को कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा लगाए गए एक बम ने हवा में ही विमान को नष्ट कर दिया था, जिससे उसमें सवार सभी यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई थी, जिनमें से अधिकांश कनाडाई नागरिक थे। यह कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला है और हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा समुदाय के लिए एक निर्णायक क्षण है।'
यह पहली बार है जब ओटावा प्रशासन या उसकी किसी शीर्ष एजेंसी ने अपने सार्वजनिक बयानों या स्मारकों में सीधे तौर पर 'खालिस्तान' शब्द का इस्तेमाल कर इस हमले की जिम्मेदारी तय की है।
आखिर सच स्वीकारने में क्यों लगे 41 साल?
इस ऐतिहासिक सच को स्वीकार करने में कनाडा को चार दशक इसलिए लग गए क्योंकि वहां का सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह पंगु थी। साल 2010 में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जॉन मेजर के नेतृत्व में हुई एक सार्वजनिक जांच में खुलासा हुआ था कि कनाडाई खुफिया एजेंसियों (CSIS) और पुलिस (RCMP) के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी और 'शीत युद्ध' के कारण यह जांच भटकी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देने वाले कनाडाई कानून खालिस्तानी समूहों को दण्ड से मुक्ति दिलाने में मदद करते हैं। (Image: AP)
चौंकाने वाली बात यह है कि CSIS ने बब्बर खालसा के मुख्य सरगना तलविंदर सिंह परमार की कई घंटों की महत्वपूर्ण वायरटैप (कॉल रिकॉर्डिंग्स) को खुद ही नष्ट कर दिया था, जो अपराधियों को सजा दिलाने के लिए सबसे बड़ा सबूत हो सकती थीं। इसके अलावा, कनाडा के नेताओं और जनता ने 329 मौतों (जिनमें 268 कनाडाई नागरिक थे) को एक दूर देश की 'भारतीय समस्या' मानकर नजरअंदाज कर दिया था। गवाहों को डराया-धमकाया गया और मुख्य गवाहों की हत्याएं तक कर दी गईं, जिसके चलते 2005 में मुख्य आरोपी बरी हो गए थे।
भारत के लिए यह स्वीकारोक्ति क्यों है बेहद बड़ी?
1970 और 80 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के खात्मे के बाद कई भगोड़े खालिस्तानी आतंकी भारत से भागकर कनाडा, ब्रिटेन और पश्चिमी देशों में शरण ले चुके थे। कनाडा ने दशकों तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) की आड़ में इन भारत विरोधी तत्वों को अपनी धरती का इस्तेमाल करने दिया।
भारत लगातार आरोप लगाता रहा है कि कनाडा स्थित ये चरमपंथी संगठन भारत में हत्याएं, मानव तस्करी, ड्रग्स और संगठित अपराधों के जरिए टेरर फंडिंग कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान यह विवाद तब अपने चरम पर पहुंच गया जब उन्होंने कनाडाई संसद में खड़े होकर भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) पर खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप मढ़ दिया था।
मार्क कार्नी प्रशासन के तहत बदला रुख
हालांकि, कनाडा में नेतृत्व और शासन के बदलते मिजाज (मार्क कार्नी प्रशासन) के साथ ही वहां की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इसी साल मार्च (2026) में जारी अपनी वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्ट में CSIS ने माना था कि 'कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथी समूह (CBKE)' कनाडा की आंतरिक सुरक्षा और उसके हितों के लिए एक गंभीर खतरा बन चुके हैं। वे कनाडाई संस्थाओं का दुरुपयोग कर भोले-भाले लोगों से पैसे ऐंठ रहे हैं और उसे हिंसक गतिविधियों में डाइवर्ट कर रहे हैं। अब कनिष्क विमान हादसे के पीछे सीधे तौर पर खालिस्तानियों का नाम लेकर कनाडा ने यह साफ कर दिया है कि भारत का कड़ा रुख और चिंताएं हमेशा से पूरी तरह जायज थीं। अब भविष्य में किसी भी बड़े मंच पर भारत खालिस्तानियों की भारत के प्रति साजिश को साबित कर सकेगा और इसके लिए फ्लेन को उड़ाने के लिए खुद कनाडा की स्वीकृति महत्वपूर्ण रहेगी।
