पीएम मोदी और नीतीश कुमार (फोटो: canva)
Bihar Election Result :वैसे तो कहा जाता है कि राजनीति में महाराष्ट्र और बिहार का छत्तीस का आंकड़ा रहता है लेकिन इस छत्तीस के आँकड़े के भ्रम को मिटाने का काम किया बीजेपी अध्यक्ष और गृहमंत्री शाह ने अपनी रणनीति के ज़रिये। अपनी अचूक और माइक्रोमैनेजमेंट की चुनाव रणनीति के ज़रिए लोकसभा चुनाव से पहले ही महाराष्ट्र के क़द्दावर नेता और संघ की खाँटी पृष्ठभूमि से सींचे हुए विनोद तावड़े को बिहार का प्रदेश प्रभारी बना कर सभी को चौंका दिया था लेकिन शाह को ऐसे ही राजनीति का चाणक्य नहीं कहा जाता। आज बिहार चुनाव की एतिहासिक जीत से ये एक बार फिर से साबित हो गया है।
और चुनाव आते ही चुनावी रणनीति में माहिर केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को चुनाव प्रभारी की भूमिका में बिहार के मैदान में उतार दिया। इसके बाद विनोद और धर्मेन्द्र की जोड़ी ने अपने सियासी समीकरणों के गणित में विपक्ष को ऐसे फंसा दिया कि एनडीए ने इस चुनाव में इतिहास ही रच दिया।
प्रधानमंत्री मोदी की जनसभाएं जहां जहां हुई वहां काफी वोट प्रतिशत इस बार बढ़ा और इस बार वोटिंग परसेंट बढ़ने के साथ ही विपक्ष लगातार दावा कर रहा था कि बढ़ा हुआ वोट परिवर्तन के लिए है लेकिन आंकड़ों को देखेंगे तो जो वोट प्रतिशत बढ़ा है उसमें आधी आबादी का हिस्सा ज़्यादा रहा है। और आधी आबादी को अपने पाले में करने के लिए नीतीश सरकार पहले ही तुरुप का इक्का चल चुकी थी और उसके तहत 10-10 हज़ार रूपये महिलाओं के खाते में डाल दिये गये थे और बाद में अपना काम शुरू करने के लिए २ लाख रूपये तक देने का वायदा किया गया था। ये रणनीति इस जीत की गेमचेंजर मानी जा रही है।
हालांकि इससे पहले इस जीत की आधारशिला रखने का काम विनोद तावड़े जेडीयू नेता संजय झा और ललन सिंह के साथ मिल कर रख चुके थे। गृहमंत्री शाह के निर्देश पर विनोद तावड़े ने चुनाव घोषित होने से पहले ताबड़तोड़ बैठकें कीं और सभी 243 सीटों पर जातिगत समीकरण का पता लगाया और यह सुनिश्चित किया कि अगर सीटें गठबंधन को भी मिलती हैं, तो भाजपा द्वारा तय की गई जाति का ही उम्मीदवार होना चाहिए और आखिरकार धर्मेन्द्र प्रधान, सम्राट चौधरी के साथ मिल कर सहयोगी दलों को मनाया और 95% सीटों पर ऐसा ही हुआ।
इसके साथ ही सभी विधानसभा क्षेत्रों में पहली बार एनडीए सम्मेलन कराये गये जिससे सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं के साथ चुनाव से पहले ही बेहतर तालमेल बनाने में आसानी हुई। इसमें भी कोई शक नहीं कि इस एतिहासिक चुनावी जीत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री शाह के तूफ़ानी दौरे ने तूफ़ान का रूख ही पलट दिया और उसमें सोने पर सुहागा रहा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का प्रभावी चेहरा जिसने एनडीए घटक दलों के साथ साथ दलितों और पिछड़ों के बीच में जादुई परिणामों को सामने लाने का काम किया।
पिछले चुनाव में चिराग ने जदयू को बहुत नुकसान पहुंचाया था इसलिए उस नुक़सान से बचने के लिए बीजेपी ने चिराग की ज़्यादा सीटों की माँग भी मान ली। पीएम मोदी-सीएम नीतीश की विश्वसनीयता भी बहुत बड़ा कारण इस जीत के पीछे कि वो जो कहते हैं वो पूरा करते हैं। जबकि विपक्ष कई राज्यों में अपने वादे पूरा करने में नाकाम रहा है।
मगध और शाहबाद क्षेत्र में पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा को साथ लाने का साहसिक फ़ैसला किया ताकि राजपूत और कुशवाहा एक साथ आ सकें और उसका परिणाम अब सामने है हालांकि पैर छूने वाली तस्वीर दिखा कर विपक्षी बाँटने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे।
पीके और उनकी पार्टी को भी तय रणनीति के हिसाब से तवज्जों नहीं दी गई जो सटीक साबित हुई। संकल्प पत्र के समय NDA के नेताओं ने विशेष तौर पर ध्यान दिया क्योंकि सभी को पता था कि प्रधानमंत्री मोदी इन घोषणाओं पर कड़ी नज़र रखते हैं ताकि वे पूरी हों और यह कोई रेवड़ी या मुफ़्त की बात न हो।
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