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दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आतिशी के पास क्या है सबसे बड़ी चुनौती? समझिए सारा गुणा-गणित

Delhi Politics: दिल्ली में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, उससे पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर आम आदमी पार्टी बड़ा फेरबदल कर रही है। ऐसे में आतिशी के समक्ष चुनाव से पहले लंबित जन कल्याण नीतियों को तेजी से लागू करने की चुनौती होगी। आपको बताते हैं, इससे जुड़ा सारा गुणा-गणित।

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आतिशी मार्लेना

Challenge for Atishi as CM of Delhi: आतिशी का नाम 21 सितंबर को दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ ही इतिहास के पन्नों पर अंकित हो जाएगा क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सुषमा स्वराज और कांग्रेस की शीला दीक्षित के बाद दिल्ली में इस पद पर पहुंचने वालीं वह तीसरी महिला होंगी।

योजनाओं पर तेजी से काम करने की कोशिश

आम आदमी पार्टी (आप) ने एक अहम मोड़ पर आतिशी को शीर्ष पद प्रदान किया है, क्योंकि पार्टी अगले साल की शुरुआत में दिल्ली विधानसभा चुनाव में ना केवल सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है, बल्कि वह चाहती है कि दिल्ली सरकार जन कल्याण से जुड़े लंबित नीतियों और योजनाओं पर तेजी से काम करे।

यह वजह है कि आतिशी को पद संभालने के बाद कड़ी मेहनत करनी होगी और मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना, इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2.0 और दहलीज पर सेवाओं की डिलीवरी जैसी अन्य योजनाओं के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए तेज गति से काम करना होगा।

मुश्किल दौर से गुजर रही थी दिल्ली सरकार

हालांकि, आतिशी के लिए ऐसी परिस्थितियों से जूझना कोई नई बात नहीं है। कैबिनेट में उनका शामिल होना भी तब हुआ जब पिछले साल केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा आबकारी नीति मामले में उपमुख्यमंत्री और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भरोसेमंद मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद सरकार मुश्किल दौर से गुजर रही थी। सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन के इस्तीफे के बाद आतिशी, सौरभ भारद्वाज के साथ दिल्ली सरकार में शामिल हो गईं।

गौतम गंभीर के खिलाफ लड़ा लोकसभा चुनाव

आतिशी (43)ने केजरीवाल सरकार में वित्त, राजस्व, शिक्षा और लोक निर्माण विभाग सहित 13 प्रमुख विभागों का नेतृत्व करते हुए शामिल हुईं। यहां मंगलवार को विधायक दल की बैठक के दौरान उन्हें सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया। आतिशी वर्ष 2013 में आप में शामिल हुईं और वह पर्दे के पीछे रहकर शिक्षा संबंधी नीतियों पर सरकार की सलाहकार के रूप में काम करती रहीं। लेकिन वर्ष 2019 में उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा, तब उन्होंने पूर्वी दिल्ली से भाजपा के गौतम गंभीर के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा। लेकिन, वह यह चुनाव हार गईं।

कालकाजी निर्वाचन क्षेत्र से विधायक हैं आतिशी

सक्रिय राजनीति में आने से पहले आतिशी ने अपना उपनाम मार्लेना, जो कि मार्क्स और लेनिन का प्रतीक था, हटा दिया था, क्योंकि वह चाहती थीं कि उनकी राजनीतिक संबद्धता को गलत तरीके से नहीं समझा जाना चाहिए। वर्ष 2020 में आतिशी ने विधानसभा चुनाव लड़ा और कालकाजी निर्वाचन क्षेत्र से विधायक बनीं।

आतिशी के माता-पिता विजय सिंह और तृप्ता वाही दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे। आतिशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से सर्वोच्च स्थान के साथ इतिहास में स्नातक की डिग्री हासिल की। उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा एवं इतिहास में परास्नातक की डिग्री हासिल की है।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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