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न प्रयागराज कनेक्शन और न अतीक से दुश्मनी, माफिया बंधुओं की हत्या के पीछे छूटे ये 5 सवाल

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 17, 2023, 07:26 AM IST

Atique Ahmed Death News in Hindi: अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। पुलिसिया लापरवाही से लेकर इंटरनेशनल साजिश तक की बातें सामने आ रही हैं। ऐसे में हम आपको अतीक को मारने वाले तीनों आरोपियों की कुंडली समेत उन पांच सवालों से वाकिफ कराएंगे, जो इस हत्याकांड के बाद उठ रहे हैं।

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अतीक-अशरफ हत्याकांड

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Atique Ahmed Death News: जिस प्रयागराज में एक समय अतीक और उसके गुर्गों की तूती बोलती थी। जिस प्रयागराज में बंदूक के दम पर अतीक समानान्तर सरकार चलाता था, उसी प्रयागराज में अतीक को गोलियों से भून दिया जाएगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। कैमरे के सामने हुई इस हत्या ने पूरे देश को देखा। दिल दहला देने वाली इस घटना से पूरा उत्तर प्रदेश कांप गया है, लेकिन यह हत्या अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ कर गई है।

अतीक और उसके भाई अशरफ की पुलिस हिरासत में हुई हत्या के बाद एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें हत्या के आरोपी तीनों शूटरों का कहना है कि वह अतीक की कई दिनों से रेकी कर रहे थे, वह उसे मारकर लोकप्रिय होना चाहते थे। हालांकि, अतीक से पूछताछ के दौरान जो इनपुट सामने आए थे, उनके मद्देनजर शूटरों के इस बयान पर भरोसा करना मुश्किल है। क्योंकि अतीक को मारने वाले शूटरों का न तो कोई प्रयागराज कनेक्शन था और न ही अतीक से कोई पुरानी दुश्मनी। ऐसे में हम आपको अतीक को मारने वाले तीनों आरोपियों की कुंडली समेत उन पांच सवालों से वाकिफ कराएंगे, जो इस हत्याकांड के बाद उठ रहे हैं।

सबसे पहले अतीक को मारने वाले शूटरों के बारे में

अतीक के हमलावरों ने मौका-ए-वारदात पर ही सरेंडर कर दिया था। तीनों की पहचान लवलेश तिवारी, अरुण मौर्य और सनी के रूप में की गई है। इन तीनों की क्राइम लिस्ट भी बड़ी नहीं है। तीनों छोटे-मोटे अपराधी हैं। लवलेश तिवारी की उम्र 22 साल है और वह बांटा जिले का रहने वाला था। दूसरा आरोपी मोहित उर्फ सनी हमीरपुर का निवासी था और तीसरा आरोपी अरुण मार्य कासगंज का रहने वाला है। तीनों का कहना है कि वे अतीक के गैंग को खत्म कर मशहूर होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पुलिस सुरक्षा के बीच अतीक और उसके भाई अशरफ को मार डाला।

अतीक से नहीं थी कोई दुश्मनी

अतीक के हत्यारों की कुंडली से एक बात तो साफ है कि तीनों आरोपियों का कोई प्रयागराज कनेक्शन नहीं है। और न ही ये इन तीनों आरोपियों की अतीक अहमद और उसके गैंग से कोई जातीय दुश्मनी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि इन तीनों हत्यारों का मकसद क्या है। तीनों का पारिवारिक बैकग्राउंड भी आपराधिक नहीं है।

हत्या के पीछे छूटे ये पांच सवाल

अतीक अहमद और अशरफ की हत्या दिल दहला देने वाली थी। पुलिस सुरक्षा के बीच तीनों को गोलियों से भून दिया गया। ऐसे में इस हत्याकांड के पीछे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्ष सरकार पर कई तरह के आरोप लगा रही है। जानते हैं उन सवालों के बारे में -

सवाल नंबर 1 - अतीक के बेटे असद के एनकाउंटर के बाद अतीक का आतंकी कनेक्शन भी सामने आया था। पुलिस को इनपुट मिले थे कि अतीक को हथियारों की सप्लाई पाकिस्तान से होती है। ऐसे में अतीक की हत्या के पीछे क्या कोई इंटरनेशनल कनेक्शन है?

सवाल नंबर 2 - अतीक की हत्या के पीछे खालिस्तानी कनेक्शन भी सामने आय है। बयान में कहा गया है कि पाकिस्तानी एजेंसी ISI द्वारा पंजाब प्रांत में ड्रोन से हथियार गिराए जाते हैं। कुछ हथियार लश्कर-ए-तैयबा को भेजे जाते हैं तो कुछ खालिस्तानी अलगाववादी संगठनों को। ऐसे में इन हत्याकांड के पीछे क्या कोई खालिस्तानी साजिश है?

सवाल नंबर 3 - अतीक अहमद को पिछली सरकारों से समर्थन प्राप्त था, यह बात किसी से छिपी नहीं है। सियासी समर्थन के कारण ही अतीक का साम्राज्य भी बढ़ता चला गया। ऐसे में पुलिसिया पूछताछ के दौरान अतीक बड़े खुलासे कर सकता था?

सवाल नंबर 4 - अतीक को जिन शूटरों ने मारा, उन्होंने अपने बयान में कहा है कि उन्होंने मशहूर होने के लिए ऐसा किया। हालांकि, उनकी कमजोर तैयारी ने इस दावे पर सवाल खड़ा कर दिया है। और तो और इन हत्यारों के पास से जो ऑटोमैटिक हथियार बरामद हुए, वह कोई आम बात नहीं है। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या अतीक को मारने के लिए किसी ने सुपारी दी थी?

सवाल नंबर 5 - अतीक को जिस वक्त मारा गया, उस समय वह गुड्डू मुस्लिम के बारे में कुछ कह रहा था। बात पूरी होती, इससे पहले ही हत्या को अंजाम दे दिया गया। गुड्डू मुस्लिम उमेश पाल हत्याकांड के बाद से फरार है। उसे बमबाज के नाम से जाना जाता है। ऐसे में क्या अतीक गुड्डू मुस्लिम के बारे में कोई बड़ा खुलासा करने वाला था।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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