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पायलट-गहलोत की सुलह में अब भी कुछ अनसुलझे सवाल! क्या बदलने वाली है जादूगर की भूमिका? अब खड़गे के बयान का इंतजार

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 30, 2023, 10:23 PM IST

Ashok Gehlot Sachin Pilot Controversy: ऐसा पहली बार नहीं है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लड़ाई में कांग्रेस आलाकमान को दखल न करनी पड़ी हो। और यह भी पहली बार नहीं है कि आलाकमान ने दोनों के बीच सबकुछ ठीक होने की बात कही है। इससे पहले भी दोनों नेता कई बार आमने-सामने आए और पार्टी में आंतरिक कलह की कलई खुल गई।

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क्या बदल जाएगी जादूगर की भूमिका

Ashok Gehlot Sachin Pilot Controversy: राजस्थान (Rajasthan Congress) में इस साल के अंत तक विधानसभा (Rajasthan Election) चुनाव होने हैं। इससे पहले राज्य कांग्रेस के अंदर सियासी भूचाल मचा हुआ है। राजस्थान कांग्रेस (Congress) के दो धुरंधर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और सचिन पायलट (Sachin Pilot) एक बार फिर आमने-सामने हैं। हालांकि, कांग्रेस आलाकमान की ओर से दावा किया गया है कि दोनों के बीच समझौता हो गया है और कांग्रेस पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ेगी।

कांग्रेस की ओर से यह बयान तब सामने आया है, जब सोमवार को अशोक गहलोत और सचिन पायलट की बीते सोमवार को हाईकमान के सामने पेशी हुई। इस बैठक में दोनों नेताओं के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल, राहुल गांधी भी मौजूद रहे। बैठक करीब चार घंटे तक हुई और इसके बाद केसी वेणुगोपाल बाहर आए और उन्होंने दोनों के बीच समझौते का ऐलान किया। हालांकि, यह समझौता किस फार्मूले पर हुआ है, इसकी जानकारी उन्होंने नहीं दी। न ही अब तक दोनों नेताओं (अशोक गहलोत और सचिन पायलट) की ओर से इसके बारे में कोई बयान जारी किया गया है। अब सभी की निगाहें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से टिकी हुई हैं।

क्या सबकुछ ठीक हो गया है?

ऐसा पहली बार नहीं है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लड़ाई में कांग्रेस आलाकमान को दखल न करनी पड़ी हो। और यह भी पहली बार नहीं है कि आलाकमान ने दोनों के बीच सबकुछ ठीक होने की बात कही है। इससे पहले भी दोनों नेता कई बार आमने-सामने आए और पार्टी में आंतरिक कलह की कलई खुल गई। इसकी शुरुआत 2018 से हुई, जब राजस्थान में कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। माना जा रहा था कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तब से लेकर अब तक जब-जब सचिन पायलट को मौका मिलता है, वह अशोक गहलोत पर निशाना साधने से नहीं चूकते हैं। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों के बीच इस बार विवाद पूरी तरह खत्म हो गया है।

सुलह का क्या है फार्मूला?

राजस्थान कांग्रेस के दोनों नेताओं के बीच विवाद को किस फार्मूले पर सुलझाया गया? यह सबसे बड़ा सवाल है। दरअसल, आगामी विधानसभा चुनाव में अगर कांग्रेस को दोबारा सत्ता हासिल करनी है, तो पार्टी के लिए ये दोनों नेता बहुत जरूरी हैं। ऐसे में आलाकमान किभी भी सूरत में दोनों को नाराज नहीं करना चाहेगा। हालांकि, दोनों के विवाद में कांग्रेस आलाकमान ने बीच का रास्ता क्या निकाला है, यह मल्लिकार्जुन खड़गे ही जानते हैं। हालांकि, उन्होंने इस पर अब तक चुप्पी साध रखी है।

क्या बदल जाएगी जादूगर की भूमिका?

इस सवाल को समझने से पहले इसके मूल में जाते हैं। दरअसल, अशोक गहलोत ने आज एक बयान दिया-अगर सचिन पायलट पार्टी में हैं तो साथ मिलकर काम क्यों नहीं करेंगे। उन्होंने आगे कहा कि मेरे लिए पद मायने नहीं रखता है। मैं तीन बार मुख्यमंत्री रहा, काम में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज मेरी ड्यूटी यह है कि मैं उस दिशा में काम करूं कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार फिर से वापस आए। अशोक गहलोत के इस बयान के कई सियासी मायने हैं। इससे यह भी संकेत जा रहा है कि आलाकमान के साथ बैठक में जो फार्मूला तय हुआ है, उसमें कहीं अशोक गहलोत की भूमिका बदलने तो नहीं वाली है?

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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