Times Now Navbharat
live-tv
Premium

कागजी नोटों की जगह पॉलिमर नोट लाने पर RBI क्यों कर रहा विचार, क्या हैं खासियतें, बचेंगे लाखों करोड़?

Polymer Currency: भारत में जल्द पॉलिमर नोट आने की संभावना है। RBI की प्रिंटिंग यूनिट ने प्रस्ताव मांगे हैं। ये नोट ज्यादा टिकाऊ, सुरक्षित, नकली नोट रोकने और लागत घटाने में मददगार होंगे।

Image
RBI क्यों कर रहा है पॉलीमर नोट लाने का विचार? (तस्वीर-AI)
Authored by: Ramanuj Singh
Updated Jul 22, 2026, 12:45 IST
Follow on Google News

Polymer Currency : भारत में करेंसी नोटों को ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नोट छापने वाली इकाई ने पॉलिमर आधारित बैंक नोटों (Polymer Banknotes) के निर्माण के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। आर्थिक जानकारों के मुताबिक पॉलिमर नोट कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा लंबे समय तक चलते हैं, नकली नोटों पर नियंत्रण में मदद करते हैं और पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। भारत में हर साल इस्तेमाल के कारण खराब हो चुके अरबों रुपये मूल्य के नोटों को नष्ट करना पड़ता है। इसके अलावा नकली नोटों की समस्या भी लंबे समय से बनी हुई है। ऐसे में पॉलिमर नोटों को करेंसी सिस्टम में शामिल करने से नोटों की उम्र बढ़ाने और सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

हर साल अरबों नोट हो जाते हैं बेकार, बढ़ता है खर्च

भारत दुनिया के सबसे बड़े करेंसी बाजारों में से एक है। देश में बड़ी मात्रा में नकदी का इस्तेमाल होता है, जिसके कारण नोटों के खराब होने की प्रक्रिया भी तेज रहती है। पिछले एक दशक में भारत ने करीब 50 लाख करोड़ रुपये मूल्य के पुराने और खराब नोटों को सिस्टम से बाहर किया है। कागजी नोट लगातार इस्तेमाल, नमी, गंदगी और फटने जैसी समस्याओं के कारण जल्दी खराब हो जाते हैं। खराब नोटों को बदलने के लिए नए नोट छापने पड़ते हैं, जिससे सरकार और रिजर्व बैंक पर अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ता है।

पॉलिमर के नोट क्यों जरूरी?

दुनिया के कई देशों में कागज के नोटों की जगह अब पॉलिमर आधारित नोट तेजी से अपनाए जा रहे हैं। ये नोट न सिर्फ ज्यादा लंबे समय तक चलते हैं, बल्कि नकली नोटों की समस्या से निपटने में भी मददगार साबित हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पॉलिमर नोटों की उम्र सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है। ब्रिटेन में किए गए अध्ययन में पाया गया कि पॉलिमर नोट लंबे समय तक चल सकते हैं और इनके खराब होने की संभावना कम होती है। पॉलिमर नोटों की खासियत यह है कि ये सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत होते हैं। ये पानी, धूल और बार-बार मोड़ने जैसी स्थितियों में भी ज्यादा समय तक टिके रह सकते हैं। इससे नोटों को बार-बार बदलने की जरुरत कम हो सकती है।

RBI की प्रिंटिंग यूनिट ने मांगे प्रस्ताव, कागजी नोटों की जगह पॉलिमर नोट पर विचार

RBI की प्रिंटिंग यूनिट ने मांगे प्रस्ताव, कागजी नोटों की जगह पॉलिमर नोट पर विचार

नकली नोटों की चुनौती से निपटने में मददगार

भारत में नकली नोटों की समस्या भी एक बड़ी चुनौती रही है। खासकर 500 रुपये के नोट नकली नोटों में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले मूल्यवर्ग में शामिल हैं। पॉलिमर नोटों में कई आधुनिक सुरक्षा फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जिन्हें कॉपी करना आसान नहीं होता। इनमें पारदर्शी विंडो, विशेष इंक, माइक्रो प्रिंटिंग और अन्य सुरक्षा तकनीकें शामिल होती हैं। दुनिया के कई देशों में पॉलिमर नोटों के इस्तेमाल के बाद नकली नोटों की संख्या में कमी देखी गई है। यही वजह है कि भारत भी अब इस विकल्प को गंभीरता से देख रहा है।

ऑस्ट्रेलिया ने की थी शुरुआत, कई देशों ने अपनाया

दुनिया में पॉलिमर नोटों की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया ने की थी। करीब 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने 10 डॉलर का पहला पॉलिमर नोट जारी किया था। इसके बाद 1996 तक ऑस्ट्रेलिया ने अपने सभी मूल्यवर्ग के नोटों को पॉलिमर में बदल दिया। ऑस्ट्रेलिया के अनुभव के बाद कई देशों ने इस तकनीक को अपनाना शुरू किया। 1990 और 2000 के दशक में वियतनाम, मलेशिया, रोमानिया, न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे देशों ने पॉलिमर नोटों को अपनी करेंसी व्यवस्था में शामिल किया। कनाडा ने भी 2011 से 2013 के बीच चरणबद्ध तरीके से सभी मूल्यवर्ग के नोटों को पॉलिमर में बदल दिया। वहीं ब्रिटेन ने 2016 से 2021 के बीच अपने सभी प्रमुख नोटों को पॉलिमर आधारित बना दिया।

ब्रिटेन में दिखा बड़ा बदलाव

ब्रिटेन ने पॉलिमर नोटों को लॉन्च करने के बाद इनके फायदे देखे हैं। आंकड़ों के अनुसार पॉलिमर नोटों की अनुमानित उम्र कागजी नोटों से काफी ज्यादा है। £5, £10, £20 और £50 जैसे नोटों में पॉलिमर तकनीक अपनाई गई। पॉलिमर नोटों में मौजूद सुरक्षा फीचर्स नकली नोट बनाना मुश्किल बनाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पॉलिमर नोट जारी होने के बाद ब्रिटेन में नकली नोटों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई। £20 नोटों में नकली नोटों की संख्या लॉन्च से पहले ज्यादा थी, लेकिन पॉलिमर नोट आने के बाद इसमें बड़ी कमी आई। £50 नोटों में भी नकली नोटों की संख्या घटी। कनाडा में पॉलिमर नोटों की शुरुआत के बाद नोटों की लाइफ पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ी। कागजी नोटों की तुलना में पॉलिमर नोट ज्यादा टिकाऊ साबित हुए।

भारत ने पहले भी किया था पायलट प्रोजेक्ट

भारत में पॉलिमर नोटों को लेकर पहले भी प्रयास किए जा चुके हैं। साल 2012 में रिजर्व बैंक ने कुछ चुनिंदा शहरों में 10 रुपये के पॉलिमर नोटों का परीक्षण शुरू किया था। हालांकि, उस समय एटीएम मशीनों की तकनीकी अनुकूलता से जुड़ी समस्याओं के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी और इसे रोक दिया गया। अब तकनीक में बदलाव और वैश्विक अनुभवों को देखते हुए भारत दोबारा पॉलिमर नोटों की संभावना तलाश रहा है।

पर्यावरण और लागत दोनों के लिए फायदेमंद विकल्प

पॉलिमर नोटों का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इनकी लंबी उम्र से कागज, स्याही और ऊर्जा की खपत कम हो सकती है। पुराने नोटों को नष्ट करने की प्रक्रिया में भी कमी आ सकती है।हालांकि, पॉलिमर नोटों की शुरुआती छपाई लागत कागजी नोटों से अधिक हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल होने के कारण कुल लागत कम हो सकती है। इसके अलावा, पॉलिमर नोटों को रिसाइकिल भी किया जा सकता है, जिससे पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव कम करने में मदद मिलती है।

2026 में भारत की करेंसी व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद

RBI की नोट प्रिंटिंग इकाई द्वारा प्रस्ताव आमंत्रित करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत में पॉलिमर नोट कब और किस मूल्यवर्ग से शुरू किए जाएंगे। अगर भारत पॉलिमर नोटों को अपनाता है, तो यह देश की करेंसी व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा। इससे नोटों की मजबूती बढ़ेगी, नकली नोटों पर नियंत्रण बेहतर होगा और लंबे समय में नोट प्रबंधन की लागत भी कम हो सकती है। दुनिया के कई देशों के अनुभवों के बाद अब भारत भी अपनी करेंसी को ज्यादा सुरक्षित और आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ता नजर आ रहा है।

नोटबंदी के बाद बदली नोटों की तस्वीर

भारत में नोटों की छपाई और पुराने नोटों को हटाने की प्रक्रिया में पिछले एक दशक में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नोटबंदी के बाद देश में करेंसी प्रबंधन पर खर्च और नए नोटों की छपाई दोनों में तेजी आई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 से अब तक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने करीब 50 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नए नोट जारी किए हैं। इस दौरान हर साल बड़ी संख्या में पुराने और खराब हो चुके नोटों को चलन से बाहर किया गया। वित्त वर्ष 2017 में नोटबंदी के बाद बाजार में मौजूद नोटों की संख्या और मूल्य में भारी बदलाव आया। नोटबंदी के समय पुराने 500 और 1,000 रुपये के नोट वापस लिए गए थे, जिसके बाद नए डिजाइन के नोटों की छपाई बढ़ी।

हर साल नोट छापने पर हजारों करोड़ का खर्च

नए नोटों की छपाई भी सरकार के लिए एक बड़ा खर्च है। आंकड़ों के अनुसार नोट छापने पर हर साल करीब 5,000 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छपाई का खर्च करीब 4,875 करोड़ रुपये रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017 से अब तक हर 100 नए नोटों की आपूर्ति के बदले करीब 71 खराब या पुराने नोटों को चलन से हटाया गया। इसका मतलब है कि करेंसी सिस्टम में नए नोटों की एंट्री के साथ पुराने नोटों को लगातार बदला जा रहा है।

डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद नकदी की मांग कायम

यूपीआई और डिजिटल भुगतान के तेजी से बढ़ने के बावजूद भारत में नकदी की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कारोबारों में कैश लेनदेन की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसी वजह से RBI को लगातार नए नोट जारी करने और पुराने नोटों को बदलने की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ती है।

End of Article