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दहेज-विरोधी कानून अप्रभावी और दुरुपयोग का शिकार, सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने कहा, एक ओर जहां कानून अप्रभावी है और इसलिए दहेज की कुप्रथा व्यापक रूप से जारी है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा-498 ए के साथ-साथ इस अधिनियम (दहेज निषेध अधिनियम) के प्रावधानों का इस्तेमाल गुप्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भी किया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट की दहेज केस मामलों में टिप्पणी (ANI)

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि दहेज प्रथा का उन्मूलन एक अत्यावश्यक संवैधानिक और सामाजिक आवश्यकता है। साथ ही रेखांकित किया कि मौजूदा कानून अप्रभावी और दुरुपयोग दोनों से ग्रस्त हैं, और यह बुराई अब भी व्यापक रूप से प्रचलित है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मुद्दे से निपटने के लिए सभी के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर जोर देते हुए उच्च न्यायालयों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304-बी और 498-ए के तहत लंबित मामलों की संख्या (सबसे पुराने से लेकर सबसे नए तक) का पता लगाने सहित कई निर्देश जारी किये ताकि उनका शीघ्र निपटान किया जा सके।

दहेज हत्या के 24 साल पुराने मामले में फैसला

पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी दहेज हत्या से संबंधित है, वहीं धारा 498-ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला से क्रूरता सें संबंधित है। पीठ ने दहेज हत्या के 24 साल पुराने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए केंद्र और राज्यों को सभी स्तरों पर शैक्षिक पाठ्यक्रम में आवश्यक बदलावों पर विचार करने का निर्देश दिया, साथ ही इस संवैधानिक स्थिति को मजबूत करने का भी निर्देश दिया कि विवाह के दोनों पक्ष एक दूसरे के बराबर हैं और कोई भी दूसरे के अधीन नहीं है। पीठ ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि दहेज प्रथा केवल हिंदुओं में ही नहीं पाई जाती, बल्कि यह अन्य समुदायों में भी प्रचलित है जो विभिन्न धर्मों और आस्थाओं को मानते हैं।

कहा- कानून अप्रभावी इसलिए कुप्रथा जारी

शीर्ष अदालत ने कहा, एक ओर जहां कानून अप्रभावी है और इसलिए दहेज की कुप्रथा व्यापक रूप से जारी है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा-498 ए के साथ-साथ इस अधिनियम (दहेज निषेध अधिनियम) के प्रावधानों का इस्तेमाल गुप्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भी किया गया है। पीठ ने कहा, अप्रभाविता और दुरुपयोग के बीच यह उतार-चढ़ाव एक न्यायिक रूप से असहज स्थिति पैदा करता है जिसका तत्काल समाधान करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर सुनाया, जिसमें 2001 के दहेज हत्या मामले में एक महिला सहित दो व्यक्तियों को बरी कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने अपीलें स्वीकार कर लीं और मामले में उनकी दोषसिद्धि को बहाल कर दिया।

हालांकि, अदालत ने 94 वर्षीय महिला दोषी को कारावास की सजा नहीं दी। अदालत ने दोषी व्यक्ति को निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। पीठ ने कि हालांकि इस मामले में आरोपियों को आखिरकार सजा मिल गई है, लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ऐसा नहीं होता है। शीर्ष अदालत ने कहा, कई लोग खुलेआम दहेज मांगते और देते हैं, वे बिना किसी सजा के बच जाते हैं। विभिन्न न्यायिक निर्णयों में बार-बार यह बात सामने आई है कि दहेज निषेध अधिनियम (डीपीए), (1961) के कार्यान्वयन में कई कठिनाइयां हैं। कई निर्देश पारित करते हुए पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों को दहेज की कुप्रथा और इससे बचने की आवश्यकता के बारे में सूचित और जागरूक किया जाए।

फैसले में कहा गया, इस प्रकार, यह निर्देश दिया जाता है कि राज्य और यहां तक कि केंद्र सरकार भी सभी स्तरों पर शैक्षिक पाठ्यक्रम में आवश्यक बदलावों पर विचार करें, जिससे इस संवैधानिक स्थिति को सुदृढ़ किया जा सके कि विवाह के पक्षकार एक दूसरे के बराबर हैं और कोई भी पक्षकार दूसरे के अधीन नहीं है, जैसा कि विवाह के समय धन और/या वस्तुओं के लेन-देन से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। पीठ ने कहा कि कानून में राज्यों में दहेज निषेध अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन अधिकारियों को विधिवत रूप से प्रतिनियुक्त किया जाए और उन्हें सौंपे गए कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने कहा कि स्थानीय अधिकारियों द्वारा ऐसे अधिकारियों के संपर्क विवरण का पर्याप्त प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे नागरिकों में जागरूकता सुनिश्चित हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों से निपटने वाले पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिससे वे इन मामलों में अक्सर सामने आने वाले सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों को पूरी तरह से समझ सकें। पीठ ने कहा कि इससे अधिकारियों की संवेदनशीलता सुनिश्चित होगी, जिससे वे वास्तविक मामलों और उन मामलों के बीच अंतर कर सकेंगे जो तुच्छ हैं और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हैं। पीठ ने कहा कि जब तक इस बुराई को जड़ से खत्म नहीं किया जाता, तब तक इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, और जो मूल रूप से बेटी को शादी के समय स्वेच्छा से उपहार देने की प्रथा के रूप में शुरू हुई थी, ताकि वह अपने उपयोग और वित्तीय स्वतंत्रता के लिए इसका इस्तेमाल कर सके, वह समय के साथ एक संस्थागत प्रथा में बदल गई और अनुलोम विवाह (उच्च वर्ग में विवाह) का अहम पहलू बन गई।

पीठ ने कहा, उच्च वर्ग में विवाह करने की यह प्रथा जाति और रिश्तेदारी से जुड़ी है, साथ ही, बोलचाल की भाषा में कहें तो, इससे जुड़े समाज के बोझ से भी। शीर्ष अदालत ने कहा गया है कि यह मामला दर्शाता है कि दहेज प्रथा केवल हिंदुओं में ही नहीं पाई जाती, बल्कि यह अन्य समुदायों में भी प्रचलित है जो विभिन्न धर्मों और आस्थाओं को मानते हैं। पीठ ने कहा, इस्लाम में दहेज, कड़ाई से कहें तो, निषिद्ध है। वास्तव में, इसके विपरीत ही निर्धारित है। ‘मेहर’ एक अनिवार्य उपहार है जो दूल्हे को शादी के समय दुल्हन को देना आवश्यक है। पीठ ने कहा कि दहेज प्रथा का उन्मूलन एक अत्यावश्यक संवैधानिक और सामाजिक आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने अनुपालन सुनिश्चित करने के साथ ही मामले की सुनवाई चार सप्ताह के बाद सूचीबद्ध की।

Amit Mandal
अमित कुमार मंडलauthor

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर 15 सालों से अधिक का अनुभव उन्हें खबरों को देखने की व्यापक दृष्टि देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाइव ब्लॉग, स्पेशल स्टोरीज और एक्सप्लेनेर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। एंगल चुनने की कला, खबरों की गति को समझना और समय पर सही जानकारी पहुंचाना—ये उनकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। अमित अपने करियर में करीब 20 हजार से अधिक न्यूज आर्टिकल, एनालिसिस और एक्सप्लेनर पब्लिश कर चुके हैं।

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