Bharat Ratna to Karpoori Thakur: केंद्र सरकार ने भारत रत्न (Bharat Ratna) का ऐलान कर दिया है, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) को भारत रत्न (Bharat Ratna Award 2024) दिए जाने का ऐलान किया गया है उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा जाएगा, गौर हो कि कर्पूरी ठाकुर 100वीं जन्म जयंती भी आने वाली है।
लोकप्रियता के कारण उन्हें जन-नायक कहा जाता था, कर्पूरी ठाकुर भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, राजनीतिज्ञ तथा बिहार राज्य के दूसरे उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनका जन्म 24 जनवरी 1924 को हुआ था और 1988 में निधन हुआ था।
कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे
कर्पूरी ठाकुर का जन्म समस्तीपुर के एक गांव पितौंझिया, जिसे अब कर्पूरीग्राम कहा जाता है, में हुआ था, भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उन्होंने २६ महीने जेल में बिताए थे। वह 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तथा 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे।
वह 'जन नायक' कहलाते हैं
वह जन नायक कहलाते हैं, सरल और सरस हृदय के राजनेता माने जाते थे। सामाजिक रूप से पिछड़ी किन्तु सेवा भाव के महान लक्ष्य को चरितार्थ करती नाई जाति में जन्म लेने वाले इस महानायक ने राजनीति को भी जन सेवा की भावना के साथ जिया। उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जन नायक कहा जाता था, वह सदा गरीबों के अधिकार के लिए लड़ते रहे।
पिछड़ों को 12 प्रतिशत आरक्षण दिया
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पिछड़ों को 12 प्रतिशत आरक्षण दिया मुंगेरी लाल आयोग के तहत् दिए और 1978 में ये आरक्षण दिया था जिसमें 79 जातियां थी जिसमें पिछड़ा वर्ग के 4% और अति पिछड़ा वर्ग के 8% दिया था। उनका जीवन लोगों के लिए आदर्श से कम नहीं था।
डॉ राम मनोहर लोहिया राजनीतिक गुरु थे
1977 में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार के वरिष्ठतम नेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा से नेतापद का चुनाव जीता और राज्य के दो बार मुख्यमंत्री बने। लोकनायक जयप्रकाशनारायण एवं समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया इनके राजनीतिक गुरु थे रामसेवक यादव एवं मधुलिमये जैसे दिग्गज साथी थे।
जब मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था
कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था। ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए।
