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अजित की बगावत या शिंदे के पर कटे? सबकुछ 'मिशन लोकसभा'... 5 प्वाइंट्स में समझें BJP की पॉलिटिक्स

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jul 3, 2023, 08:48 AM IST

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र के सियासी भूचाल से जो बातें निकल कर सामने आ रही हैं। उसमें पहली यह है कि एनसीपी में टूट से शरद पवार का महाराष्ट्र की सियासत में कद घटा है, जिसका सीधा असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वहीं, दूसरी यह कि भाजपा ने एकनाथ शिंदे के बढ़ते कद को थामने का प्रयास किया है।

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Maharashtra Politics: बीते दो सालों में महाराष्ट्र एक ऐसे राज्य के तौर पर उभरा है, जहां सबसे ज्यादा सियासी घटनाक्रम हुए हैं। पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना टूटी और अब शरद पवार की NCP। भले ही प्रत्यक्ष तौर पर यह दिखाई दे रहा हो कि इन दो बड़े सियासी घटनाक्रमों के बाद शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे और अब अजित पवार को बड़ा फायदा हुआ हो, लेकिन इन सभी बातों के पीछे BJP की सियासत छिपी है।

पहले तो एकनाथ शिंदे की बगावत से BJP ने विधानसभा में अपना दावा मजबूत किया और अब NCP की टूट को आगामी लोकसभा चुनाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। हालिया, सियासी भूचाल से जो बातें निकल कर सामने आ रही हैं। उसमें पहली यह है कि एनसीपी में टूट से शरद पवार का महाराष्ट्र की सियासत में कद घटा है, जिसका सीधा असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वहीं, दूसरी यह कि भाजपा ने एकनाथ शिंदे के बढ़ते कद को थामने का प्रयास किया है।

पांच प्वाइंटस में समझते हैं भाजपा का महाराष्ट्र में 'मिशन लोकसभा' क्या है? और हालिया घटनाक्रम से उसे कैसे फायदा हो रहा है?

1. भाजपा के सामने नया विकल्प

अजित पवार महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा कद रखते हैं। शरद पवार के बाद वह एनसीपी के सबसे बड़े नेता के तौर पर जाने जाते थे और एक साथ नौ विधायकों को शिंदे सरकार में मंत्रि पद मिलना भी इस बात का प्रमाण है कि भाजपा उनके कद से वाकिफ है। हालांकि, राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अजित की बगावत का सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी के होता दिख रहा है। अजित की बगावत से जहां एकनाथ शिंदे की बढ़ती लोकप्रियता को थामने का प्रयास किया गया है, तो भाजपा को अब महाराष्ट्र के सियासी जमीन पर नया विकल्प भी मिल गया है।

2. शरद पवार की ताकत कम हुई

2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव में एनसीपी के जरिए शरद पवार भाजपा का महाराष्ट्र में बड़ा नुकसान कर सकते थे। हालांकि, भाजपा ने अजित पवार को अपने खेमे में खड़ा करके उनकी ताकत को कम करने का प्रयाास किया है। अब लोकसभा चुनाव में उसे एक नया पार्टनर मिल गया है, जिसका फायदा वह एनसीपी का बड़ा वोटबैंक अपने पक्ष में करने में उठा सकती है।

3. विपक्षी एकता को झटका

यह ऐसा समय है, जब विपक्षी महागठबंधन का शोर तेजी से सुनाई दे रहा है। महाराष्ट्र के हालिया घटनाक्रम को विपक्षी एकता पर प्रहार के रूप में भी देखा जा रहा है। शरद पवार इस गठबंधन के बड़े चेहरे के तौर पर जाने जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने अपनी इस चाल से विपक्षी एकता को भी बड़ा झटका दिया है। अब शरद पवार की पार्टी ही दो फाड़ हो चुकी है और उनके साथ भी वही स्थिति हो गई है, जो एक साल पहले उद्धव ठाकरे की हुई थी।

4. कांग्रेस के लिए भी चुनौती

कांग्रेस के लिए यह एक ऐसा समय है, जब पार्टी देश भर में अपनी खोई जमीन तलाशने का भरपूर प्रयास कर रही है। कई राज्यों में उसे सफलता भी मिली है, जिसने भाजपा की टेंशन बढ़ा दी है। महाराष्ट्र में कांग्रेस का एनसीपी और उद्धव ठाकरे खेमे के साथ गठबंधन है। यह गठबंधन लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए मुसीबत बन सकता था। हालांकि, अब एनसीपी में में आई दरार का फायदा भाजपा को होता दिख रहा है, जिसने कांग्रेस के भी चुनौती खड़ी कर दी है।

5. फडणवीस का कद बढ़ेगा

उद्धव ठाकरे से बगावत करके जब एकनाथ शिंदे राज्य के मुख्यमंत्री बने तो भाजपा ने वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस को डिप्टी सीएम बनाया। हालांकि, सरकार के चेहरे के तौर पर फडणवीस ही आगे दिखाई देए। इस स्थिति को एकनाथ शिंदे ने भांप लिया और कुछ ऐसे निर्णय लिए, जिसे अपने ही सहयोगी फडणवीस को चुनौती के रूप में देखा गया। शिवसेना की ओर से हालिया विज्ञापन विवाद इसका ताजा उदाहरण भी है। ऐसे में भाजपा ने महाराष्ट्र सरकार में अजित पवार को शामिल कराया, जिसके बाद पवार और फडणवीस की जोड़ी शिंदे के लिए चुनौती बनती दिखाई दे रही है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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