प्रयागराज के एक निजी स्कूल की छात्रा को स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति देने वाली याचिका खारिज करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सियासी बयानबाजी शुरू हो गई है। अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले को चुनौती देने के लिए शीर्ष अदालत का रुख करेगा। वहीं कांग्रेस और भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आई है।
AIMPLB के सदस्य और धर्मगुरु खालिद रशीद फरंगी महली ने मंगलवार को कहा कि बोर्ड इस मामले से अवगत है और उसे लगता है कि फैसले में कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति है। उन्होंने कहा कि हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा रहा है और बोर्ड इस मुद्दे को अदालत के सामने मजबूती से रखेगा।
खालिद रशीद ने कहा कि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म के मूल और आवश्यक सिद्धांतों का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। उनके मुताबिक, कुरान और हदीस में हिजाब का उल्लेख है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मुस्लिम महिलाएं इसे पहनती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि कोई छात्रा अपने धार्मिक दायित्वों का पालन करना चाहती है तो उसके अधिकार पर भी विचार किया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने कहा- कपड़े चुनना महिला का अधिकार
हाई कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने महिलाओं के पहनावे की स्वतंत्रता को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि हर महिला को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसमें हिजाब, घूंघट या कोई अन्य परिधान चुनने का अधिकार भी शामिल है। खेड़ा ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से कांग्रेस महिलाओं के अपने फैसले लेने के अधिकार के साथ खड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं, इसका फैसला धार्मिक विद्वानों को करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी महिला को उसकी जाति, वर्ग या धर्म के आधार पर अपने पहनावे का चुनाव करने से नहीं रोका जाना चाहिए।BJP ने फैसले को बताया ऐतिहासिक
दूसरी ओर, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। दिल्ली में इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है और स्कूल में शिक्षा तथा धार्मिक पहचान को अलग-अलग नजरिए से देखना चाहिए। अजय आलोक ने कहा कि स्कूल में सभी धर्मों के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं और वहां पढ़ाई प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने किताबों को शिक्षा के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि स्कूल में किसी विशेष धार्मिक पहचान के प्रदर्शन को जरूरी नहीं माना जाना चाहिए।हाई कोर्ट ने किस आधार पर याचिका खारिज की?
यह मामला प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा से जुड़ा है। छात्रा इसी स्कूल में कक्षा 11 में दाखिला लेना चाहती है और उसने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर हिजाब या हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी। 21 अगस्त को न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह स्थापित करने में सफल नहीं रही कि हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके पालन के बिना उसके धर्म पर असर पड़ेगा।
अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह दावा कर देना पर्याप्त नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा मौलिक अधिकार के दायरे में आती है। इसके लिए तथ्यात्मक और कानूनी आधार के साथ पर्याप्त सामग्री पेश करनी होगी।
अदालत ने स्कूल की तस्वीरों का भी किया जिक्र
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्कूल की विभिन्न कक्षाओं की तस्वीरों का भी उल्लेख किया। अदालत के मुताबिक, याचिकाकर्ता के अलावा किसी अन्य छात्रा ने हिजाब नहीं पहना था। यहां तक कि उसी धार्मिक समुदाय से आने वाली छात्राएं भी बिना हेडस्कार्फ के स्कूल यूनिफॉर्म में दिखाई दीं। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई पर्याप्त धार्मिक या प्रामाणिक दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि कक्षा के भीतर हिजाब पहनना उसके धर्म के पालन के लिए अनिवार्य है और इसे नहीं पहनने से उसके धार्मिक विश्वास का मूल स्वरूप प्रभावित होगा।राज्य और CBSE ने क्या कहा?
वहीं, इस याचिका का राज्य सरकार की ओर से भी विरोध किया गया। अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता गिरिजेश कुमार त्रिपाठी ने दलील दी कि संबंधित स्कूल एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त संस्थान है। ऐसे में स्कूल की आंतरिक व्यवस्था और यूनिफॉर्म से जुड़े फैसलों में राज्य का हस्तक्षेप सीमित है। राज्य की ओर से कहा गया कि स्कूल में यूनिफॉर्म तय करना उसकी प्रशासनिक और नीतिगत व्यवस्था का हिस्सा है। इसे धर्म का पालन करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
वहीं, CBSE की ओर से पेश अधिवक्ता आलोक तिवारी ने भी राज्य की दलीलों का समर्थन किया। इसके बाद हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता मांगी गई राहत की हकदार नहीं है।
