Children Health Concerns: केस 1. ग्यारह साल का ईशान स्कूल में ठीक से पढ़ता नहीं है, लंच नहीं करता, दोस्तों से घुलता मिलता नहीं है। आई साइट ठीक होने के बावजूद उसे सिर में दर्द की शिकायत रहती है। उसके पेरेंट्स कई डॉक्टर्स को दिखा चुके - लेकिन कोई सही समाधान नहीं निकला है।
केस 2. बारह साल की केशवी ने जब से स्कूल बस से जाना शुरू किया तब से वो बहुत चिड़चिड़ी हो गई है। उसे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है। वो होम वर्क नहीं करना चाहती है और हर समय बस उसे हाई कैलोरी वाले स्नैक्स ही चाहिए होते हैं।
क्या आपका बच्चा भी ईशान या केशवी जैसा है। या फिर उसमें ही कुछ ऐसे ही मिलते जुलते लक्षण दिखते हैं। अगर ऐसा होता है तो एक बार अपने बच्चे का स्लीप शेड्यूल चेक करें। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी नींद पूरी नहीं हो रही है। हाल ही में एक ऐसी ही रिसर्च ने पेरेंट्स को इसके लिए आगाह भी किया है।

नींद की कमी से बच्चे में डिप्रेशन हो सकता है
बच्चों की नींद पर क्या कहती है रिसर्च
नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. (प्रो.) वी.के. पॉल ने नींद की कमी पर एक अध्ययन जारी करते हुए बताया है कि हमारे स्कूली बच्चों में से एक-चौथाई पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं जिससे उनमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केन्द्र (एनएचएसआरसी) और सर गंगा राम अस्पताल द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन में 12-18 वर्ष की आयु के स्कूल जाने वाले किशोरों को स्टडी किया है। इसके तहत जानने की कोशिश की गई कि उनमें नींद की कमी का स्तर क्या है और यह किस प्रकार उनके आचार-व्यवहार को प्रभावित करती है।
इसमें पाया गया कि 22.5 प्रतिशत किशोर नींद से वंचित हैं, जो कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। अध्ययन में शामिल 60 प्रतिशत प्रतिभागियों में डिप्रेशन के लक्षण दिखे जबकि 65.7 प्रतिशत किशोरों में फोकस की कमी पाई गई।
क्यों ठीक से सो नहीं पा रहे हैं बच्चे
अध्ययन से पता चला है कि स्कूल की दिनचर्या और पारिवारिक आदतों के चलते उनकी नींद अधूरी रह जा रही है। स्क्रीन टाइम भी एक बड़ा कारण है जो बच्चे अपनी नींद पूरी नहीं कर पा रहे हैं। बेशक अध्ययन के निष्कर्ष एक चिंताजनक हैं। कई रिसर्च पहले ही साबित कर चुकी हैं कि पूरी नींद न मिलने से किशोरों में एकाग्रता की कमी, भावनात्मक असंतुलन और पढ़ाई में खराब परफॉर्मेंस जैसी चीजें देखने में आती हैं। जानें वो कारण जिनकी वजह से बच्चों की नींद अधूरी रह जाती है -
- जल्दी स्कूल शुरू होना। भारत में कई स्कूल सुबह 6:30 या 7:00 बजे शुरू हो जाते हैं। इससे बच्चों को बहुत सुबह उठना पड़ता है, जिससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती।
- अत्यधिक होमवर्क और ट्यूशन भी इसका कारण है। स्कूल के बाद कोचिंग, ट्यूशन और तमाम एक्स्ट्रा क्लासेज के कारण बच्चों को देर रात तक जागना पड़ता है।
- मोबाइल, टैबलेट और टीवी पर देर रात तक समय बिताने से नींद की गुणवत्ता और मात्रा दोनों पर असर पड़ता है।
- अभिभावकों की अपेक्षाएं और दबाव भी इसकी एक वजह है। बच्चों पर पढ़ाई और प्रतियोगिता में आगे रहने का दबाव उनके आराम और नींद को कम कर देता है।
नींद की कमी से बच्चों में क्या नुकसान होते हैं
पारस हॉस्पिटल में बाल रोग विभाग में सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर राकेश तिवारी बताते हैं कि बच्चों में नींद की कमी के कुछ सामान्य लक्षणों में चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग, सुबह उठने में कठिनाई, फोकस की कमी, दिन में नींद आना, कमजोर इम्यूनिटी के कारण बार-बार बीमार होना, हाइपरएक्टिविटी, और यहां तक कि मीठे या जंक फूड की लत तक शामिल हैं। इन संकेतों को अक्सर माता-पिता और शिक्षकों द्वारा गलत तरीके से समझा जाता है या नजरअंदाज किया जाता है। बच्चों को हर रात स्वस्थ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए 9 से 11 घंटे की नींद की आवश्यकता होती है, लेकिन आज की तेज़-तर्रार जीवनशैली, जल्दी स्कूल का समय, शैक्षणिक दबाव, और अत्यधिक स्क्रीन समय उनके आराम के घंटों को काफी कम कर रहे हैं।

ज्यादा स्क्रीन के लालच में भी बच्चे नींद पूरी नहीं करते
कई बच्चों में तो नींद की कमी से शारीरिक विकास पर असर तक देखने में आता है। दरअसल, नींद पूरी न होने से ग्रोथ हॉर्मोन का रिसाव गड़बड़ा जाता है जिससे बच्चे की हाइट, सेहत आदि पर भी फर्क पड़ता है।
कैसे सुधारें बच्चों की नींद का शेड्यूल
नींद को बच्चे की दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाना चाहिए। ये पोषण और शिक्षा जितना ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। माता-पिता और स्कूलों के बीच इस पर खुली बातचीत होनी चाहिए। इसमें स्कूल का टाइम और होमवर्क के लोड पर बातचीत होनी चाहिए। अगर कोई भी चीज बच्चे के मूल स्वास्थ्य को प्रभावित कर ही है तो उसमें सुधार होना चाहिए।
इसके अलावा डॉक्टर राकेश तिवारी ने बच्चों की नींद सुधारने के लिए ये उपाय सुझाए हैं -
- सोने के समय से कम से कम एक से दो घंटे पहले स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाना चाहिए क्योंकि इन उपकरणों से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन उत्पादन को दबा सकती है। यह स्लीप साइकिल को निर्धारित करने वाला हॉर्मोन है।
- बच्चे को दिन के दौरान नियमित शारीरिक गतिविधियों के लिए भेजें। जब तक बच्चा थकेगा नहीं, उसे अच्छी नींद नहीं आएगी।
- शाम को भारी रात के खाने और कैफीनयुक्त खाद्य पदार्थों या पेय से बचें।
- बच्चों की स्लीप साइकिल सही रखने के लिए उनके सोने और उठने का टाइम सुनिश्चित करें।
- घर का माहौल भी बच्चों के सोने के अनुरूप होना चाहिए। उस समय पेरेंट्स भी तेज आवाज में फोन पर बात या टीवी आदि ना देखें।
- माता-पिता को बच्चों को अत्यधिक ट्यूशन या पाठ्येतर गतिविधियों के साथ अधिक व्यस्त नहीं करना चाहिए। इससे उनके पास आराम के लिए पूरा समय उपलब्ध होगा।
ध्यान दें
ये स्टडी कुछ बच्चों का ही केस नहीं है। ये एक चेतावनी है कि यदि हमने अभी से इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों की सेहत और सीखने की क्षमता पर गहरा पड़ सकता है। स्कूल, माता-पिता और समाज को मिलकर बच्चों को पर्याप्त नींद दिलाने के लिए जागरूकता और ठोस पहल करनी होगी, तभी हम एक स्वस्थ और सक्षम भविष्य की नींव रख सकेंगे।
