Lung Cancer: फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। हर साल लाखों लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं और इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की होती है, जिनमें बीमारी का पता काफी देर से चलता है। यही वजह है कि मेडिकल फील्ड में लंबे समय से ऐसे तरीकों की तलाश में जुटा था, जिनकी मदद से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम समय रहते पहचाना जा सके और बीमारी को विकसित होने से पहले ही रोका जा सके।
हालांकि अब द फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस दिशा में एक ऐसी खोज की है, जिसे भविष्य में कैंसर की रोकथाम की दिशा में गेम चेंजर माना जा सकता है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ब्लड टेस्ट (Blood Test for Lung Cancer) किया है, जिससे लंग कैंसर का पता लगाना आसन हो सकता है। इस टेस्ट में रक्त में मौजूद कुछ विशेष प्रोटीनों की पहचान की है, जो फेफड़ों के कैंसर को विकसित होने से पांच साल से भी संकेत दे सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं इसके बारे में...
क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है ये रिसर्च
लंग कैंसर का पता लगाने की दिशा में ये रिसर्च इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि फेफड़ों के कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण साफ नहीं दिखाई देते हैं। कई मामलों में मरीज को बीमारी का पता तब चलता है जब कैंसर शरीर में काफी फैल चुका होता है। ऐसे में इलाज करना कठिन हो जाता है और कई मामलों में जान जाने का जोखिम बढ़ जाता है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति में कैंसर विकसित होने का खतरा सालों पहले ही पहचान लिया जाए तो उसे निगरानी, जीवनशैली में बदलाव और इलाज से उसे ठीक किया जा सकता है। यही कारण है कि ये नई खोज मेडिकल फील्ड में काफी फायदेमंद मानी जा रही है।
दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया रिसर्च
इस रिसर्च में दुनिया के चार महाद्वीपों में 80 से अधिक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की टीम ने सहयोग किया। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने हजारों लोगों के ब्लड सैंपल की जांच की गई और ऐसे जैविक संकेतकों (बायोमार्कर्स) की तलाश की, जो भविष्य में फेफड़ों के कैंसर के जोखिम की जानकारी दे सकें।
इस रिसर्च में शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्लड में मौजूद 14 विशेष प्रोटीन ऐसे हैं, जिनका स्तर बढ़ने पर फेफड़ों के कैंसर की संभावना भी बढ़ जाती है। इस रिसर्च में इन प्रोटीनों का संबंध शरीर में होने वाली सूजन यानी इन्फ्लेमेशन से पाया गया है।
नॉन स्मोकर्स को भी खतरा
इस शोध की एक और खास बात यह रही कि वैज्ञानिकों ने अपने निष्कर्षों को दुनिया भर के आठ अलग-अलग डेटा सेटों में भी परखा। इनमें ताइवान का एक बड़ा डेटा सेट शामिल था, जिसमें अधिकांश प्रतिभागी ऐसे लोग थे जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था। इससे यह संकेत मिला कि यह बायोमार्कर केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि नॉन स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के जोखिम का पता लगाने में मदद कर सकता है।

नॉन स्मोकर्स को भी खतरा
क्या दवा से रोका जा सकेगा लंग कैंसर
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों को शुरुआती स्तर पर ऐसे संकेत भी मिले कि पहले से उपलब्ध एक एंटी-इंफ्लेमेटरी दवा फेफड़ों के कैंसर का जोखिम कम कर सकती है। यानी आपको इस टेस्ट में किसी तरह का संकेत दिखे तो आपका इलाज दवा के द्वारा पहले ही शुरू किया जा सकता है।
हालांकि अभी इस रिसर्च के निष्कर्ष प्रारंभिक चरण में है और इसे अंतिम रूप से साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर रैंडमाइज्ड क्लिनिकल ट्रायल की आवश्यकता है। यदि भविष्य के अध्ययन भी यही परिणाम दिखाते हैं, तो यह पहली बार होगा जब किसी व्यक्ति के जैविक जोखिम के आधार पर कैंसर की रोकथाम के लिए दवा दी जा सकेगी।
अभी और रिसर्च की जरूरत
हालांकि यह रिसर्च बेहद आशाजनक है, लेकिन फिलहाल आम लोगों के लिए ऐसा कोई ब्लड टेस्ट उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन प्रोटीनों की पहचान को और बड़े समूहों में सत्यापित करना होगा। इसके साथ ही यह भी साबित करना होगा कि इन संकेतों के आधार पर किया गया इलाज वास्तव में कैंसर को रोक सकता है या नहीं।
लंग कैंसर के इलाज की ओर महत्वपूर्ण कदम
पिछले दो दशकों में फेफड़ों के कैंसर की पहचान और उपचार में काफी प्रगति हुई है। स्क्रीनिंग तकनीकों, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी ने मरीजों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बाद भी यह बीमारी आज भी दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में शामिल है। ऐसे में यह नई खोज न केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि उस भविष्य की झलक है जहां कैंसर का इलाज करने के बजाय उसे होने से पहले ही रोका जा सकेगा।
