ईरान चाहता है कि इजरायल के हमलों की भारत निंदा करे।
Israel-Iran Conflict: इजरायल और ईरान संघर्ष नाजुक दौर में पहुंच गया है। दोनों देश एक दूसरे पर हवाई हमला कर भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में अमेरिका भी इस युद्ध में उतर सकता है। बीते दिनों व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड के साथ हुए लंच के बाद अटकलें और तेज हो गई है। एक्सपर्ट की मानें तो ईरान पर हमले की सूरत में अमेरिका पाकिस्तान के सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकता है। ट्रंप ने मुनीर से इस बारे में चर्चा की होगी। इस बीच, ईरान के एक राजनयिक ने बयान देकर भारत के लिए एक मुश्किल स्थिति खड़ी कर दी है। उन्होंने कहा है कि ईरान चाहता है कि भारत इजरायली हमलों की निंदा करे।
ईरानी दूतावास में मिशन के उप प्रमुख मोहम्मद जावेद हुसैनी ने कहा कि भारत ‘ग्लोबल साउथ’ का अगुवा है और ईरान को उम्मीद है कि एक संप्रभु देश पर हमला कर अंतरराष्ट्रीय कानून का ‘उल्लंघन’करने वाली इजरायली कार्रवाई की नई दिल्ली निंदा करेगी। उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना है कि भारत सहित हर देश को इसकी (इजराइली सैन्य कार्रवाई की) निंदा करनी चाहिए, ईरान के साथ उनके संबंधों के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।’ईरानी राजनियक की यह मांग भारत सरकार के लिए पसोपेश में डालने वाली स्थिति है। भारत का ईरान और इजरायल दोनों के साथ दोस्ती है। या कहिए इजरायल के साथ ज्यादा नजदीकी है। इजरायल के हवाई हमलों की निंदा कर भारत उसे नाराज नहीं करना चाहेगा। वह तटस्थ रहते हुए वह दोनों देशों से बातचीत के जरिए समस्या का हल निकालने पर जोर देना चाहेगा। भारत चाहेगा कि दोनों में देशों में शांति और इलाके में स्थिरता हो।
हालांकि, एक तरह से भारत ने अपने रुख का संकेत उस समय दे दिया जब शंघाई सहयोग संगठन ने इजरायल के हमलों की निंदा की। इजरायल की निंदा करने वाले एससीओ के सदस्य देशों के बयान से भारत ने खुद को अलग कर लिया। इस बयान में इजरायल के शुरुआती हमलों की निंदा की गई थी। चूंकि, ईरान की तरफ से अब प्रत्यक्ष रूप से मांग की गई है, ऐसे में भारत सरकार के लिए कोई रुख अख्तियार करना आसान नहीं होगा। जानकार मानते हैं कि मध्य पूर्व में उभरते एक नए और खतरनाक संघर्ष को लेकर भारत को कूटनीतिक रूप से अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, भारत पारंपरिक रूप से संकट के समय प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है। दशकों से अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति के तहत, भारत ने ईरान और सऊदी अरब, इजरायल, फिलिस्तीन, अमेरिका और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने की कोशिश की है।
हालांकि, इजरायल और ईरान के बीच चल रहा वर्तमान संघर्ष भारत के लिए अब तक की सबसे कठिन परीक्षा में से एक होगा। इजरायल भारत का एक अत्यंत करीबी भागीदार बन चुका है, खासकर हथियारों के व्यापार के क्षेत्र में। भारत, इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार है और इजरायल भारत का चौथा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है। इस व्यापार में पिछले एक दशक में 33 गुना की वृद्धि हुई है। इसके अलावा, भारत और इजरायल के बीच वाणिज्यिक सहयोग में भी भारी वृद्धि हुई है। यही नहीं भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी की अडानी ग्रुप इजरायल के हैफा बंदरगाह का संचालन करती है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीति और शासन शैली में अक्सर समानता देखी जाती है।
भारत के ईरान और व्यापक मध्य पूर्व में भी बड़े हित हैं। यह सही है कि भारत ने अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से ईरान से ऊर्जा आयात में कटौती की है और द्विपक्षीय व्यापार सीमित है लेकिन भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए प्रतिबद्ध है, जो मध्य एशिया के साथ व्यापार और संपर्क को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, ईरान में लगभग 11,000 भारतीय नागरिक हैं, जिनमें से कई छात्र हैं। जैसा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुआ था, भारत का प्राथमिक उद्देश्य इन भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालना है। मध्य पूर्व भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार और निवेश का एक प्रमुख स्रोत है। भारत के कई अहम साझेदार—जैसे मिस्र, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात—इस क्षेत्र में हैं। यह क्षेत्र भारत के लिए कई बहुपक्षीय परियोजनाओं का भी केंद्र है, जैसे I2U2 क्वाड और इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर। इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र में लाखों भारतीय प्रवासी रहते हैं।
एक्सपर्ट मानते हैं कि इन सभी कारणों से इजरायल-ईरान संघर्ष पर भारत का दृष्टिकोण यूक्रेन युद्ध के प्रति अपनाई गई नीति जैसा ही रहेगा। एक ओर, भारत इजरायल या उसके नेतृत्व की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करेगा, वहीं दूसरी ओर वह संघर्ष को कम करने और कूटनीति के माध्यम से समाधान निकालने पर जोर देगा। हालांकि, इस बार दांव कहीं ज्यादा ऊंचे हैं, क्योंकि यह संघर्ष भारत की भौगोलिक सीमा के काफी करीब है। भारत के पड़ोस के बाहर यदि कोई सबसे रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्र है तो वह मध्य पूर्व ही है। इसीलिए, भारतीय अधिकारियों को अत्यंत सावधानीपूर्वक कूटनीति अपनानी होगी ताकि इजरायल के साथ घनिष्ठ भागीदारी को बरकरार रखते हुए ईरान और अन्य मध्य-पूर्वी मित्रों के साथ संबंधों को बिगड़ने से रोका जा सके। भारत अब तक के सबसे पतले कूटनीतिक रस्सी पर चल रहा है।
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