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नंदीग्राम-रेजीनगर उपचुनाव पर क्यों टिकी बंगाल की सियासत? जानें TMC की अंदरूनी कलह ने कैसे बदला राजनीतिक गणित

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर में होने वाले उपचुनाव तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी विभाजन के बीच सियासी तौर पर अहम हो गए हैं। दोनों तृणमूल गुट अपनी राजनीतिक विरासत साबित करने की कोशिश में हैं, जबकि कांग्रेस और वामदल भी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में इन सीटों के नतीजे बंगाल में विपक्ष की राजनीति की दिशा पर असर डाल सकते हैं।

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नंदीग्राम-रेजीनगर उपचुनाव में TMC, कांग्रेस और वामदलों की टक्कर। AI IMAGE

तृणमूल कांग्रेस में अभूतपूर्व अंदरूनी कलह के बीच पश्चिम बंगाल के दो विधानसभा क्षेत्रों में छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव भाजपा विरोधी दलों के लिए खुद को विपक्ष के मुख्य चेहरे के रूप में स्थापित करने की बड़ी राजनीतिक लड़ाई में बदल गए हैं।

एक ओर जहां कांग्रेस और वामदल राज्य में अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने की कोशिशों में जुटे हैं। वहीं, दूसरी तरफ तृणमूल के दोनों गुटों में खुद को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर स्थापित करने की होड़ मची हुई है।

नंदीग्राम-रेजीनगर में किसकी चलेगी?

पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम और मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में होने वाले उपचुनाव से यह भी साफ हो जाएगा कि कौन-सा राजनीतिक दल उन मतदाताओं की आवाज बनकर उभरता है, जो सत्ताधारी भाजपा के तो खिलाफ हैं, लेकिन तृणमूल के साथ भी नहीं हैं।

तृणमूल 1990 के दशक के अंत में अपनी स्थापना के बाद से सबसे बड़े सियासी संकट से गुजर रही है। निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के किसी भी गुट को पार्टी के नाम और ’जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। आयोग ने ममता गुट को ’ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ’फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया है, जबकि अरूप रॉय नीत बागी गुट को ’डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ’लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है।

तृणमूल की विरासत पर दोनों गुट आमने-सामने

ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुटों के बीच पार्टी की संगठनात्मक और चुनावी विरासत पर नियंत्रण को लेकर जारी खींचतान के बीच, कांग्रेस और वामपंथी दल उन मतदाताओं को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के हाथों गंवा दिया था। विपक्षी मतों में विभाजन का फायदा भाजपा को मिल रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, "यह उपचुनाव इस बारे में है कि कौन-सा दल भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरता है। नंदीग्राम में भाजपा मजबूत स्थिति में है और यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-सी पार्टी दूसरे स्थान पर रहती है।"

Mamata Banerjee

बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी की फोटो।

नंदीग्राम में ममता गुट को बड़ा झटका

ममता गुट ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे को चुनाव मैदान में उतारा था। हालांकि, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद संचिता उपचुनाव से पीछे हट गईं। इसके बाद ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन की घोषणा की। हालांकि, प्रधान को नंदीग्राम में 2007 में हुए भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ दर्ज मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत ने प्रधान को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।

चक्रवर्ती ने कहा कि अल्पसंख्यकों के दबदबे वाले रेजीनगर में उपचुनाव के नतीजों से यह संकेत मिलने की संभावना है कि विधानसभा चुनावों के बाद अल्पसंख्यक मतदाताओं का रुझान किस तरफ है।

कांग्रेस-वामदलों की भी सियासी जमीन तलाशने की कोशिश

कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा, "कांग्रेस को अब तृणमूल की जगह लेने की कोशिश करनी चाहिए। हमें अल्पसंख्यक मतदाताओं सहित उन सभी लोगों के लिए स्वाभाविक पसंद के रूप में उभरना चाहिए, जो भाजपा विरोधी हैं।" ’डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ के नेता संदीपन साहा ने नंदीग्राम उपचुनाव के बारे में कहा, "यह चुनाव साबित कर देगा कि असली तृणमूल हम हैं, क्योंकि ममता गुट की उम्मीदवार मुकाबले से पीछे हट गई हैं।' बागी गुट ने नंदीग्राम से मोहम्मद एतेशामुल हक को अपना उम्मीदवार बनाया है।

विश्लेषकों का कहना था कि नंदीग्राम उपचुनाव इस बात को आंकने का मौका बनकर उभरा है कि क्या ममता गुट तृणमूल कांग्रेस की पहचान खोने के बाद भी अपनी अहमियत बनाए रख पाएगा या बागी गुट उस विरासत को चुनौती देगा और क्या कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाएगी?

रेजीनगर में दोनों गुटों की सीधी टक्कर

पार्टी संगठन, कैडर और मतदाता आधार पर नियंत्रण को लेकर तृणमूल की अंदरूनी लड़ाई रेजीनगर में और स्पष्ट है, जहां दोनों गुट किस्मत आजमा रहे हैं।

हालांकि, रेजीनगर में शुरू में ममता गुट को झटका लगा था, जब उसके उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की घोषणा कर दी। उन्होंने कार्यकर्ताओं पर दबाव और मतदाताओं को ममता गुट की नयी पहचान एवं चुनाव चिह्न से अवगत कराने में आ रही दिक्कतों का हवाला दिया था।

हालांकि, बाद में ममता से बातचीत के बाद चौधरी ने अपना फैसला बदल लिया और चुनाव मैदान में लौट आए। ममता गुट के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने कहा, "नंदीग्राम में हमारी उम्मीदवार दबाव के आगे झुक गईं, लेकिन रेजीनगर में भारी दबाव के बावजूद चौधरी पीछे नहीं हटे। असल बात यह है कि भाजपा उपचुनाव को लेकर भी डरी हुई है।"

रेजीनगर में अल्पसंख्यक वोट सबसे बड़ा फैक्टर?

रेजीनगर में चौधरी का मुकाबला बागी गुट के सफीउज्जमां शेख, कांग्रेस के मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सैयद असद अली, आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के गुलाम नबी आजाद और भाजपा के सखाराव सरकार से है।

विश्लेषकों के मुताबिक, रेजीनगर में अल्पसंख्यक मतदाताओं की बड़ी संख्या इसे एक तरह की प्रयोगशाला बनाती है, जहां यह देखा जा सकता है कि क्या वह समर्थन आधार, जो अक्सर तृणमूल का साथ देता था, पार्टी के टूटने के बाद भी राजनीतिक रूप से एकजुट बना हुआ है या नहीं। विश्लेषकों का कहना था कि रेजीनगर में कांग्रेस दशकों पहले गंवाई अपनी सियासी जमीन वापस पाना चाहती है, वहीं वामपंथी दल तृणमूल के पाले में गए मतदाताओं के उनके खेमे में लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

दूसरी ओर, तृणमूल के दोनों गुट मतदाताओं से यह तय करने को कह रहे हैं कि मूल पार्टी की विरासत किस गुट को मिलनी चाहिए।

बंगाल में विपक्ष का चेहरा कौन?

माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजन चक्रवर्ती ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "राज्य में वामपंथी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतें भाजपा के खिलाफ विपक्ष के मुख्य चेहरे की भूमिका निभाएंगी।" वहीं, भाजपा प्रवक्ता देबजीत सरकार ने तृणमूल कांग्रेस के मूल चुनाव चिह्न को "डर का प्रतीक" बताया। उन्होंने कहा, "हमें इस बात की परवाह नहीं है कि कौन दूसरे या तीसरे स्थान पर आता है। हमें पता है कि भाजपा दोनों सीट जीतेगी।"

राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मोइत्रा ने कहा, "इन उपचुनाव का महत्व उन दो सीट से कहीं ज्यादा उस राजनीतिक जगह से है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा के खिलाफ विपक्ष के मुख्य चेहरे की जगह खाली है और उस पर कब्जा करने का मौका है। तृणमूल में आई संगठनात्मक दरार ने कांग्रेस और वाम दलों को पार्टी के दोनों विरोधी गुटों के साथ-साथ उस जगह पर कब्जे के लिए मुकाबला करने का मौका दिया है।"

दो सीटों के नतीजे तय करेंगे आगे की दिशा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता की धुरी बार-बार बदली है। पहले कांग्रेस की जगह वामदलों ने ली, फिर वामदलों की जगह तृणमूल कांग्रेस आई और 2026 में तृणमूल की जगह भाजपा ने ले ली। हालांकि, अभी फर्क यह है कि विपक्ष के मुख्य चेहरे के तौर पर किसी एक दल का निर्विवाद दावा नहीं है।

ऐसे में नौ अक्टूबर (नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव) के नतीजे शायद अपने आप में कोई अंत नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के अगले राजनीतिक दौर की शुरुआत हो सकते हैं।

भाजपा के प्रतिद्वंद्वी पार्टी से सत्ताधारी दल बनने के बाद यह सवाल कि उसके खिलाफ विपक्ष की कमान किसके हाथ में है, बंगाल में विपक्ष की राजनीति, गठबंधनों और लड़ाइयों को इन दो निर्वाचन क्षेत्रों से कहीं आगे तक प्रभावित करेगा।

Piyush Kumar
पीयूष कुमारauthor

पीयूष कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क पर Senior Copy Editor के रूप में कार्यरत हैं। देश-दुनिया की हलचल पर उनकी पैनी नजर रहती है और इन घटनाओं को सटीक, सरल और असरदार अंदाज में खबरों की भाषा देना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। ब्रेकिंग न्यूज की रफ्तार हो या किसी जटिल मुद्दे को आसान बनाकर समझाने वाले एक्सप्लेनर—पीयूष दोनों में बराबर दक्षता रखते हैं। न्यूज जजमेंट, फैक्ट-बेस्ड राइटिंग और एंड-टू-एंड कॉपी प्रोडक्शन पर इनकी पकड़ मजबूत है और अबतक 4,000 से अधिक स्टोरी लिख चुके हैं।

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