बीते पखवाड़े से लगातार अमेरिकी वायुसेना हूतियों के ठिकानों पर कहर बरपा रही है। अपने एरियल ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी बमवर्षकों ने हूतियों के ट्रेनिंग सेंटरों, हथियारखानों, मिसाइल यूनिट्स, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन ठिकानों और आला कमांडरों के घरों पर अग्निवर्षा की। अगर इसी रफ्तार और पैनेपन के साथ अमेरिकी हमले जारी रहे तो हूतियों की जंगी कुव्वत धूल चाटने लगेगी और उनका वजूद मटियामेट हो जायेगा। जो अभी हूतियों के साथ हो रहा है, ठीक वैसा हिजबुल्लाह के साथ हुआ। लेबनानी सरजमीं पर तेल अवीव ने हिजबुल्लाह की जंगी काबिलियत को रौंदते हुए उसके कमांडरों को ढ़ेर कर दिया। हिजबुल्लाह की गैर मौजूदगी को लेबनानी सेना ने भरा, साथ ही सैन्य तौर पर अहम ठिकानों को अपने काबू में ले लिया। इसके बाद मुल्क को नया निजाम और नयी हुकूमत मिली।
असरदार रहा USAF का एरियल ऑपरेशन
लेबनान वाला किस्सा कुछ हद तक सीरिया में भी दिखायी दिया, जहां बशर अल-असद की फौज कमजोर होते ही हयात तहरीर अल-शाम ने वहां अपना परचम फहरा दिया। असद हुकूमत की जड़े उखाड़ते हुए हयात तहरीर अल-शाम इदलिब से अलेप्पो होते हुए दमिश्क तक पहुंच गया। हिजबुल्लाह, सीरियाई सेना और हूतियों का ऑपरेशनल पैटर्न लगभग एक सा ही है, हिजबुल्लाह और असद के साथ क्या हुआ वो अब हूतियों के साथ होता दिख रहा है। यमन में हूतियों की सामरिक पकड़ लगातार ढ़ीली पड़ती दिख रही है, उनका किला ढ़हने के कगार पर है। मौजूदा हालतों में उनके पास अपना वजूद बनाए रखने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा।
पेंटागन के इशारे पर जो ऑपरेशन USAF कर रही है, वो काफी असरदार दिख रहा है। अब हूतियों के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि वो अपनी मौजूदगी को बनाए रखने के लिए ट्रंप के सामने घुटने टेक दे और समझौते की मेज पर आ जाये। हूतियों को नेस्तनाबूत करने के लिए मरीन और एरियल हमले नाकाफी है, डेल्टा और ग्रीन बैरेट फोर्सेस को जमीनी हमले करने होगें तभी ये मुमकिन हो पायेगा। अब दुनिया को इंतज़ार है कि यमन की सेना सना में अपने झंडा लहराए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जंगी बादल नहीं छंटेगें। भले ही अमेरिकी दबाव में हूती अपने हथियार डाल दे लेकिन कुछ समय बाद वो तेहरान की शह पर फिर से लड़ाई के लिए तैयार हो जायेगें। इस सूरत में यमन का उत्तरी इलाका उनके वर्चस्व की सरजमीं बना रहेगा।
साफ है अंकल सैम की मंशा
तालिबान, हूती और हिजबुल्लाह जैसी कट्टरपंथी जम़ाते इतनी आसानी से गायब नहीं होती। ऐसे मिलिशिया गुट भले ही सैन्य झड़पों में हार जाए लेकिन ये कभी भी ज़बरदस्त वापसी कर सकते है। मैदान में फिर लौटने के लिए ये एलायंस बना सकते है, नौज़वानों की बरगलाकर उनकी भर्ती और ट्रेनिंग कर सकते है, फंडिंग इकट्ठा कर सकते है। सबसे बड़ी और अहम बात इन इदारों से जुड़े कट्टरपंथी सूबाई और ग्लोबल खींचतान का फायदा उठाने से तनिक भी नहीं चूकते। हूतियों पर हुआ USAF का हालिया हमला ग्लोबल रजामंदी है, क्योंकि उनकी कार्रवाईयों को संगीन जुर्म करार दिया गया है। पेंटागन के हमलों से दो बातें साफ है पहली ये कि अंकल सैम चाहते है कि हूतियों की जंगी ताकत जमींदोज हो जाये क्योंकि ये ग्लोबल नेवल ट्रांसपोर्टेशन के लिए बड़ा खतरा है। दूसरी ये कि व्हाइट हाउस मिलिशिया गुट से ये चाहता है कि वो लाल सागर के रास्ते गुजरने वाले तिजारती जहाज़ों पर हमला ना करें। भले ही ये दोनों सूरतें मुकम्मल हो जाए लेकिन यमन की आवाम के लिए हूती नासूर ही बने रहेंगे।
हूतियों के लिए मुश्किल वक्त
बीते महीने से ही अमेरिकी सुरक्षा बल इस बात का इंतजार कर रहे है कि हूती अपनी हथियारबंद कार्रवाईयों पर विराम लगाए ताकि अरबी प्रायद्वीप समेत बाब अल-मन्देब जलडमरूमध्य में अमेरिकी जहाजों समेत अन्य जहाजों पर खतरा ना मंडराए। फिलहाल हूतियों ने सफेद झंडा उठाने और ऐसा वादा करने की कोई कवायद नहीं की। जिस तरह से हूतियों पर अमेरिकी दबाव बढ़ा है, उसे देखकर ये लगता है कि अब वो दिन दूर नहीं जब ये मिलिशिया गुट दावा करेगा कि उसने गाजा के हालातों को सामान्य करने के लिए अपने हमलों को रोका। अगर किसी भी तरह हूती सना के तख्त पर अपनी पकड़ बनाए रखते है तो ये उनकी फतेह होगी। हमास गाजा में बिखर चुका है, असद की हुकूमत गिर चुकी है और हिजबुल्लाह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। इन हालातों के बीच हूती अपना वजूद कायम रख पाते है तो ये उनके लिए बड़ी बात होगी।
राजनीतिक समाधान की ओर बढ़ सकता है मिलिशिया गुट
अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हालात बदलने के लिए तुरूप का इक्का साबित हो सकता। इससे हूतियों का पूरी तरह से सफाया हो जायेगा या फिर वो अपनी जंगी ताकत छोड़ने के लिए बेबस हो जायेगें। ये सब जमीनी हमले के बिना मुमकिन नहीं हो पायेगा। फिलहाल यमन को ऐसी तटस्थ आर्मी की दरकार जो कि घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी को मान्य हो। सिर्फ ऐसी यमनी सेना ही हूतियों की कमजोरी से माइलेज हासिल कर सकती है, साथ ही सना में उसकी गैरमौजूदगी से बने खतरों को रोकने के लिए वो अहम होगी। मौजूद अमेरिकी हमले का मकसद हूतियों का तख्तापलट करना या फिर इस मिलिशिया गुट का स्वरूप बदलना नहीं बल्कि हूतियों को हराकर उन्हें राजनीतिक समाधान की दिशा में ढकेलना है। करीब 11 साल पहले इस मुद्दे पर पहले आम सहमति बनी थी, लेकिन हूतियों द्वारा सत्ता पर कब्जा किए जाने के बाद से इस राह में कई रोड़े सामने आए। हूतियों के दखल के कारण उस दौरान आम यमनियों को भारी निराशा हाथ लगी थी।
जंगी बंदिशों में फंसे हूती
बता दे कि हूतियों के पास ईरानी तकनीक से बनी बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन है, जो कि अमेरिका पर पलटवार करने के लिए नाकाफी है। अगर वो हमला करते भी है तो वो सीमित होगा। USAF अपने हमलों में ज्यादा आक्रामकता लाती है तो वो तेहरान के हुक्मरानों से पैसे, हथियार और तकनीक मांग सकता है। ये बात इस पर निर्भर करेगी कि ईरान अमेरिका से किस स्तर का सीधा टकराव चाहता है। फिलिस्तीनियों को दिए कथित समर्थन की दुहाई देते हुए वो अपने वैचारिक रंग में सऊदी अरब को रंगने की कोशिश करेगा। अगर हूती हमले झेलने में नाकाम रहे तो वो शांति वार्ता के लिए व्हाइट हाउस या यूएन की दहलीज पर पहुंच सकते हैं, लेकिन उसका अड़ियल रवैया और उस पर पड़ा ईरानी असर उसे इस बात की इज़ाजत नहीं देता।
इन वज़हों से ताकतवर रहे हूती मिलिशिया
जैदी शिया मुस्लिमों की क्षेत्रीय/रणनीतिक समझ और वैचारिक आक्रामकता ने मिलिशिया संगठन हूती की नींव रखी थी। कई वज़हें रही कि ये वक्त के साथ मजबूत होता चला गया। भौगोलिक स्थिति से इस संगठन को खासा फायदा मिला, यमन की पश्चिमी सीमा से लगे लाल सागर में इनकी सक्रियता ने वैश्विक कारोबारी रूट पर अपना आंतकी दखल दिया। यमन का उत्तरी-पश्चिमी सूबाई प्रांत सादा हूतियों का गढ़ रहा, जहां के दुर्गम पहाड़ी इलाके ने मिलिशियाओं को अमेरिकी-इस्राइली हमले से महफूज़ पनाहगाह दी। हूतियों में आक्रामकता का कारण यमन में उनका अल्पसंख्यक होना रहा, उनका हमेशा ये मानना रहा कि यमन कि सुन्नी बहुल सरकार औऱ उसके सऊदी सरपरस्तों ने उन्हें हाशिए पर ढ़केला। इसी सोच ने उन्हें तेहरान के करीब ला खड़ा किया और वो उनका प्रॉक्सी बन गया। साल 2014 के यमन गृहयुद्ध ने इन्हें सत्ता में हिस्सेदार बना दिया, जब तत्कालीन राष्ट्रपति हादी अपने मुल्क से भागकर सऊदी अरब के शरणार्थी बने। इसके बाद से यमन का पश्चिमी हिस्सा और राजधानी सना इनके काबू में आ गए। ठीक अगले साल सऊदी ने जब हूतियों के खिलाफ मोर्चा खोल तो उन्होनें इसे बाहरी दखल बताते हुए जनसमर्थन को अपने पक्ष में कर लिया। जंगी ताकत और जनसमर्थन के बल पर हूती मिलिशिया ने हुदैदा बंदरगाह पर अपना कंट्रोल बना लिया। अपने नियंत्रण में आए इलाकों से ये टैक्स वसूलने लगे, तेल और कारोबार में दखल देकर खुद माली तौर पर मजबूत किया। बाहरी दबावों के आगे झुके बिना उसने दुनिया को दिखाया कि वो पश्चिमी ताकतों के बड़े हमलों के सामने टिक सकता है। सऊदी एलायंस से वो आठ सालों तक जंगी मोर्चे पर जूझता रहा लेकिन उसने घुटने नहीं टेके। भौगोलिक अनुकूलन, स्थानीय जनसमर्थन, ईरानी करीबी और गुरिल्ला रणनीति ने हूतियों को लाल सागर का खतरनाक खिलाड़ी बना दिया। इसी बुनियाद पर वैश्विक व्यापार के समुद्री मार्ग को रोककर वो गाहे-बगाहे दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचते रहे।
यमन का राजनीतिक गलियारा हूतियों के लिए आखिरी विकल्प
यमन पर हूती मिलिशियाओं का कब्जा होने के बाद से ये गुट अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता और वैधता के संकट से जूझ रहा है। इसलिए हूतियों ने यमन प्रशासन से जुड़ी तमाम ईकाइयों को अपनी छत्रछाया में रखा। फिलहाल के हमले के बाद वो एक विकल्प को अपना सकता है कि वो खुद को पूरी तरह से राजनीतिक इकाई में तब्दील कर ले ताकि जंग और अराजकता की तस्वीर बदल सके। इससे उन सभी मुद्दों को हल निकल सकेगा जिसे लेकर अमेरिका संवेदनशील है साथ ही इस राह पर बढ़कर हूतियों को अमेरिकी सुरक्षा बलों के कोप का सामना नहीं करना पड़ेगा। अमेरिकी हमला यमन में बदलाव की नींव रख सकता है, ऐसे में हूती अपना रवैया और तासीर बदलकर सियासी गलियारे में घुसकर खुद को बचा सकते है।
(इस लेख के लेखक राम अजोर जो वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।)
