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कैसा है झारखंड के 'गुरू जी' शिबू सोरेन का परिवार? हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के अलावा कौन-कौन

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jan 31, 2024, 11:41 PM IST

Shibu Soren Family Tree: हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का नाम भी मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे बताया जा रहा था। हालांकि, इस बीच सोरेन परिवार में आंतरिक कलह की खबरें सामने आईं। आइए जानते हैं पूरे परिवार के बारे में...

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संकट में सोरेन परिवार

Photo : Times Now Digital

Shibu Soren Family Tree: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को नाटकीय घटनाक्रम के बाद बुधवार देर रात प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी से पहले हेमंत सोरेन अपने विधायकों और ईडी अधिकारियों के साथ राजभवन पहुंचे, जहां उन्होंने राज्यपाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंप दिया। इसके बाद सरकार में परिवहन मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता चंपई सोरेन को विधायक दल का नेता चुन लिया गया। चंपई सोरेन ने 43 विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल को सौंपते हुए सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया है। हालांकि, उनकी ताशपोशी कब होगी, इसको लेकर राजभवन की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है।

चंपई सोरेन से पहले हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का नाम भी मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे बताया जा रहा था। हालांकि, इस बीच सोरेन परिवार में आंतरिक कलह की खबरें सामने आईं और शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन ने कल्पना के नाम पर आपत्ति जताई, जिसके बाद चंपई सोरेन का नाम आगे बढ़ाया गया। झारखंड की राजनीति में हुए इस उठापटक के बाद एक बार फिर सोरेन परिवार चर्चा में आ गय है। आइए जानते हैं शिबू सोरेन कौन हैं? झारखंड की राजनीति में उनका क्या योगदान है? उनके परिवार में कौन-कौन राजनीति में है?

झारखंड की राजनीति के गुरू जी

झारखंड की राजनीति में सोरेन परिवार का वर्चस्व हमेशा से ही रहा है और इस परिवार के मुखिया हैं झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन, जिन्हें गुरू जी कहकर भी संबोधित किया जाता है। शिबू सोरेन एक आदिवासी नेता से झारखंड के सीएम पद तक पहुंचे। उनका जन्म झारखंड के रामगढ़ में हुआ था, जो उस वक्त बिहार में आता था। शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 में हुई, जब आदिवासी आंदोलन में उन्होंने एक हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था। इस घटना में 11 लोग मारे गए थे। शिबू सोरेन ने पहली बाद 1977 में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन इसमें उन्हें हार मिली। इसके बाद 1980 में वे लोक सभा चुनाव जीते। इसके बाद क्रमश: 1986, 1989, 1991, 1996 में भी चुनाव जीते। 10 अप्रैल 2002 से 2 जून 2002 तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे। 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिये चुने गये। शिबू सोरेन 2005 में झारखंड के मुख्यमंत्री बनें, हालांकि, बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। वे तीन बाद झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

परिवार में कौन-कौन

शिबू सोरेन की शादी रूपी सोरेन से हुई थी। दंपति के तीन बेटे हैं, ओर एक बेटी है। जिसमें सबसे बड़े दुर्गा सोरेन हैं। इसके बाद बेटी अंजलि सोरेन, हेमंत सोरेन और बंसत सोरेन हैं। ये तीनों बेटे राजनीति में सक्रिय रहे हैं। हालांकि, 2009 में दुर्गा सोरेन बिस्तर पर मृत अवस्था में पाए गए थे, उस समय वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक थे। दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरने भी दुमका से विधायक हैं। इसके अलावा शिबू सोरेन के सबसे छोटे बेटे बसंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के यूथ विंग के अध्यक्ष हैं।

अब हेमंत सोरेन के बारे में जानिए

हेमंत सोरेन की शादी कल्पना सोरेन से हुई है। कल्पना राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे अपना एक प्ले स्कूल चलाती हैं। कल्पना सोरेन ने बीटेक के साथ एमबीए भी किया है। हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के दो बच्चे हैं, जिनके नाम निखिल व अंश है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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