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सत्य निकेतन हादसा: फिर वही एक्शन, फिर वही ऐलान... सवाल ये कि दिल्ली में हादसे से पहले सिस्टम सोते क्यों रहता है?

Satya Niketan building collapse: दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे के बाद सरकार और प्रशासन दोनों सवालों के घेरे में हैं। आखिर हादसे से पहले हादसे रोकने के लिए कार्रवाई क्यों नहीं होती है?

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दिल्ली में सत्य निकेतन हादसे के बाद सरकार और प्रशासन पर उठते सवाल
Reported by: गौरव श्रीवास्तवEdited by: शिशुपाल कुमार
Updated Sep 7, 2026, 12:19 IST
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Satya Niketan building collapse: सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी की इमारत ढही तो मलबे में सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं दबे, दिल्ली की व्यवस्था पर उठते पुराने सवाल भी फिर बाहर आ गए। ज्यादातर छात्र, दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े युवा, एक ऐसी इमारत में रह रहे थे जो देखते ही देखते मलबे में बदल गई। हादसे के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल का दौरा किया। भवन मालिक के खिलाफ FIR, जिम्मेदार एमसीडी अधिकारियों पर कार्रवाई, पांचवीं मंजिल वाले भवनों की जांच और आसपास के PG की सघन जांच के निर्देश दिए गए। सरकार ने साफ कहा कि लापरवाही करने वाले किसी को नहीं बख्शा जाएगा।

हर हादसे के बाद एक जैसा ऐलान

लेकिन दिल्ली में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अब किसके खिलाफ कार्रवाई होगी। सवाल यह है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, उसकी स्थिति की निगरानी किसके पास थी? PG के तौर पर इस्तेमाल हो रही इमारत की जांच की जिम्मेदारी किसकी थी? बेसमेंट में चल रहे काम की जानकारी किसे थी। और सबसे बड़ा सवाल, अगर नियम थे तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ।

दिल्ली में यह सवाल नया नहीं है। किसी इमारत में आग लगती है तो फायर सेफ्टी जांच की घोषणा होती है। कोई बिल्डिंग गिरती है तो अवैध निर्माण की जांच शुरू होती है। कोचिंग सेंटर में छात्र मरते हैं तो बेसमेंट सील होते हैं। PG में हादसा होता है तो PG की जांच का आदेश आता है। फिर कुछ दिन गुजरते हैं। सीलिंग की खबरें आती हैं। FIR की खबर आती है। जांच कमेटी बनती है। अधिकारियों पर कार्रवाई का भरोसा मिलता है और फिर दिल्ली अपनी रफ्तार से चलने लगती है। अगली बार कोई हादसा होता है और वही सवाल फिर सामने खड़ा होता है।

रेसक्यू ऑपरेशन में भी लग रहा है काफी समय (फोटो- PTI)

रेसक्यू ऑपरेशन में भी लग रहा है काफी समय (फोटो- PTI)

क्या दिल्ली का सिस्टम हादसे रोकने के लिए बना है?

सत्य निकेतन में छात्र थे, इसलिए सवाल और बड़ा है। सत्य निकेतन कोई सुनसान इलाका नहीं है। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास का वह इलाका है जहां बड़ी संख्या में छात्र पीजी और निजी हॉस्टल में रहते हैं। वर्षों में इलाके के कई पुराने रिहायशी मकान छात्र आवास और पीजी में बदल गए हैं। यानी यहां रहने वाले लोग सामान्य किरायेदार नहीं हैं। इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की है जो देशभर से पढ़ने के लिए दिल्ली आते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को यह भरोसा करके दिल्ली भेजते हैं कि वे पढ़ेंगे, परीक्षा देंगे, करियर बनाएंगे। लेकिन अगर जिस मकान में वे रह रहे हैं उसकी संरचनात्मक सुरक्षा, फायर सेफ्टी, निकासी व्यवस्था और निर्माण नियमों की निगरानी ही ठीक से नहीं होगी तो सवाल सिर्फ नगर निगम का नहीं रहेगा। सवाल दिल्ली की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर उठेगा।

पांचवीं मंजिल पर कार्रवाई का ऐलान, लेकिन पांचवीं मंजिल बनी कैसे?

मुख्यमंत्री ने पांचवीं मंजिल वाले भवनों को तत्काल सील करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला हादसे के बाद जरूरी हो सकता है। लेकिन इसी फैसले से एक और सवाल पैदा होता है। अगर पांचवीं मंजिल नियमों के खिलाफ थी तो वह बनी कैसे? और क्या सिर्फ पाचवीं मंजिल वालों के खिलाफ ही एक्शन होगा, बाकी के सेफ्टी ऑडिट का क्या?

  • सवाल ये कि क्या निर्माण के दौरान MCD के अधिकारी मौके पर नहीं गए?
  • क्या भवन का नक्शा जांचा गया?
  • क्या निर्माण की मंजूरी थी?
  • क्या भवन का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए हो रहा था जिसके लिए अनुमति मिली थी?
  • क्या PG के तौर पर इस्तेमाल की जानकारी संबंधित विभाग को थी? अगर जवाब हां है तो निगरानी कहां थी। और अगर जवाब नहीं है तो दिल्ली की नगर व्यवस्था में इतना बड़ा गैप क्यों है?

2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने PG को लेकर चेताया था

PG व्यवस्था को लेकर दिल्ली में कानूनी सवाल भी नए नहीं हैं। 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने Darshan Singh And Sons (HUF) बनाम MCD मामले में PG अनुमति की आड़ में पूर्ण व्यावसायिक लॉजिंग हाउस चलाने के सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। उस मामले में कोर्ट ने साफ किया था कि PG की अनुमति का इस्तेमाल पूर्ण व्यावसायिक लॉजिंग हाउस चलाने के लिए नहीं किया जा सकता। जिस योजना के तहत PG की अनुमति दी गई थी, उसमें मालिक का भवन में रहना, सीमित संख्या में कमरे और बेड, बेड एंड ब्रेकफास्ट जैसी शर्तें थीं।

2014 में सिक्योरिटी ऑडिट का ऐलान किया था

अब 2014 पर आइए। अरुण जेटली ने 2014-15 के दिल्ली बजट में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए पीजी अकोमोडेशन और लड़कियों के हॉस्टल के सिक्योरिटी ऑडिट का प्रस्ताव रखा था। आधिकारिक रिकॉर्ड में यह साफ दर्ज है। और यह सिर्फ घोषणा बनकर नहीं रही थी। गृह मंत्रालय की 2014-15 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 405 पीजी अकोमोडेशन और महिला पीजी की सुरक्षा जांच पूरा किए जाने की बात दर्ज है। लेकिन 2014 में जिस PG सुरक्षा व्यवस्था को लेकर ऑडिट की बात हुई थी, 2026 में भी उसका अता-पता नहीं है।

सत्य निकेतन हादसे के बाद रेस्क्यू अभियान (फोटो- PTI)

सत्य निकेतन हादसे के बाद रेस्क्यू अभियान (फोटो- PTI)

2019 में विधानसभा समिति ने भी मांगी थी PG की पूरी सूची

अब इस पूरी कहानी में 2019 की दिल्ली विधानसभा की समिति की रिपोर्ट सबसे अहम दस्तावेजों में से एक बन जाती है। समिति ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के आसपास लाइब्रेरी, ईटरी, हुक्का बार और पीजी अकोमोडेशन की पूरी सूची मांगी थी। सिर्फ सूची नहीं, समिति ने यह भी कहा था कि एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जाए जिसमें इन जगहों के संचालन के लिए लागू नियमों और रेगुलेशन की जानकारी हो और यह भी बताया जाए कि फायर सेफ्टी, बिल्डिंग नॉर्म्स, हेल्थ लाइसेंस और दूसरे मामलों में कौन-कौन से कमियां मौजूद हैं।

लेकिन रिपोर्ट में दर्ज है कि मांगी गई जानकारी समिति को उस समय तक उपलब्ध नहीं कराई गई थी। यानी आज से करीब सात साल पहले ही एक सरकारी समिति पूछ रही थी कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के आसपास चल रहे पीजी और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का पूरा नियामक नक्शा आखिर है कहां? अब उसी छात्र बेल्ट में एक PG की इमारत ढह गई।

2019 की रिपोर्ट में फायर सेफ्टी को लेकर भी गंभीर सवाल थे

2019 की रिपोर्ट का एक और हिस्सा आज बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। दिल्ली फायर सर्विस ने समिति को बताया था कि संबंधित इलाके में होटल, रेस्टोरेंट और हुक्का बार के लिए फायर सेफ्टी क्लीयरेंस की स्थिति गंभीर थी। कई मामलों में जरूरी दस्तावेज और स्वीकृत भवन मानचित्र उपलब्ध नहीं थे और कुछ फायर सर्टिफिकेट लेने के आवेदन खारिज किए गए थे। संयुक्त निरीक्षण में ऐसे प्रतिष्ठानों की स्थिति भी सामने आई जहां रजिस्ट्रेशन नहीं था, उसकी की अवधि खत्म हो चुकी थी या सीटिंग क्षमता भी बढ़ा दी गई थी।

उसने सवाल उठाया कि जिन जगहों के पास फायर सेफ्टी क्लीयरेंस नहीं है, वे फिर भी कैसे चल रही हैं। सात साल बाद सवाल का चेहरा बदल गया है। अब सवाल यह है कि क्या दिल्ली में पीजी और छात्र हॉस्टल की सुरक्षा व्यवस्था भी इसी तरह विभागों के बीच फाइलों में उलझी हुई है।

MCD-फायर डिपार्टमेंट पर फिर सवाल

दिल्ली में बिल्डिंग सुरक्षा की जिम्मेदारी एक विभाग की नहीं है। MCD के पास बिल्डिंग प्लान, निर्माण और कई तरह के इस्तेमाल से जुड़े अधिकार और जिम्मेदारियां हैं। वहीं फायर सर्विस के पास फायर सेफ्टी से जुड़ी जिम्मेदारी है।

दूसरे विभागों के पास स्वास्थ्य, पुलिस, लाइसेंसिंग और अन्य नियामक पहलू हैं। यही वजह है कि जब कोई हादसा होता है तो सवाल एक-दूसरे की तरफ जाने लगते हैं। एमसीडी कह सकता है कि फायर सर्विस का मामला था। फायर सर्विस कह सकता है कि बिल्डिंग स्ट्रक्चर की जिम्मेदारी दूसरे विभाग की थी। पुलिस कह सकती है कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की गई, और अंत में सवाल वहीं रह जाता है।

इमारत में रहने वाले छात्र की सुरक्षा की संयुक्त जिम्मेदारी किसकी थी। 2019 की विधानसभा समिति ने भी विभागों के बीच प्रभावी समन्वय की कमी को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी। यही वह हिस्सा है जिसे हर हादसे के बाद पढ़ा जाना चाहिए।

दिल्ली में आग और हादसे सिर्फ खबर नहीं, आंकड़े भी हैं

दिल्ली फायर सर्विस के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राजधानी में आग की घटनाओं का बोझ कितना बड़ा है। 2022-23 में दिल्ली फायर सर्विस को 31,958 फायर कॉल मिलीं और इन घटनाओं में 1,029 लोगों की मौत दर्ज हुई। 2023-24 में 31,575 फायर कॉल के साथ 1,303 मौतें दर्ज हुईं।

ये आंकड़े सिर्फ आग की घटनाओं के आंकड़े हैं। इनमें हर तरह के भवन हादसों को जोड़कर दिल्ली की पूरी बिल्डिंग सेफ्टी तस्वीर नहीं बनती।

राजेंद्र नगर ने भी यही कहानी दिखाई थी

जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर के Rau's IAS Study Circle के बेसमेंट में पानी भरने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने जांच दिल्ली पुलिस से CBI को ट्रांसफर करने का आदेश दिया और कहा कि घटना की प्रकृति को देखते हुए जांच को लेकर जनता के मन में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए।

लेकिन इस हादसे का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह था कि हादसे से पहले शिकायत भी हुई थी। एक सिविल सेवा अभ्यर्थी ने 26 जून 2024 को MCD से शिकायत की थी कि बेसमेंट का कथित तौर पर अवैध इस्तेमाल हो रहा है। 15 जुलाई और 22 जुलाई को रिमाइंडर भी भेजे गए। 27 जुलाई को तीन छात्रों की मौत हो गई। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं था कि हादसा कैसे हुआ। सवाल यह भी था कि हादसे से पहले मिली चेतावनी का क्या हुआ?

राजेंद्र नगर कोचिंग हादसे के बाद भी यही सवाल उठा था (फोटो- PTI)

राजेंद्र नगर कोचिंग हादसे के बाद भी यही सवाल उठा था (फोटो- PTI)

दिल्ली ने क्या सीखा?

राजेंद्र नगर के बाद बेसमेंट वाले कोचिंग सेंटरों पर कार्रवाई हुई। सीलिंग हुई।नियमों की जांच हुई और अदालत में मामला गया। फिर CBI जांच हुई, लेकिन दो साल बाद सत्य निकेतन में फिर एक छात्र PG की इमारत ढह गई।

इस बार भी शुरुआती जांच का फोकस निर्माण, बेसमेंट में चल रहे काम और बिल्डिंग की सुरक्षा पर है। रिपोर्टों के मुताबिक इमारत में बेसमेंट और पांच ऊपरी मंजिलें थीं और निर्माण/मरम्मत का काम चल रहा था। तो सवाल फिर वहीं लौट आया, क्या दिल्ली में कानून के पालन का मॉडल हादसे के बाद शुरू होता है? भ्रष्टाचार का सवाल भी इसी कहानी का हिस्सा है। अवैध निर्माण अचानक एक दिन में खड़ा नहीं होता। एक मंजिल अचानक नहीं बन जाती। और बेसमेंट अचानक व्यावसायिक नहीं हो जाता है। रिहायशी मकान अचानक PG में नहीं बदलता। कहीं न कहीं नक्शा होता है, कहीं न कहीं निर्माण होता है। कहीं न कहीं निरीक्षण होना चाहिए, नोटिस जारी होना चाहिए।

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