शक्तिशाली देशों की तरह उत्तर कोरिया भी अपनी नौसेना को लगातार मजबूत करने में जुटा है। हाल ही में उसने अपनी नौसेना में दूसरे नए डिस्ट्रॉयर (North Korea Naval Destroyer) को शामिल किया है। करीब 5,000 टन के इस युद्धपोत का नाम 'कांग कोन' (Kang Kon) है। इसे रविवार को पूर्वी बंदरगाह शहर वॉनसान में आयोजित एक समारोह के दौरान नौसेना में शामिल किया गया।
उत्तर कोरिया लंबे समय से अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में जुटा है। हालांकि, दो नए डिस्ट्रॉयर को नौसेना में शामिल किए जाने की खबर ने सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण कोरिया और जापान की बढ़ाई है। उनके साथ उनकी बेटी किम जू ए भी नजर आईं, जिनकी भविष्य की भूमिका को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अटकलें लगती रही हैं।
बेटी बेटी किम जू ए के साथ एक फिर सार्वजनिक मंच पर नजर आए किम जोंग। AP
कांग कोन की एंट्री क्यों अहम है?
‘कांग कोन’ चो ह्योन श्रेणी का दूसरा 5,000 टन का डिस्ट्रॉयर है। इससे पहले इसी श्रेणी का पहला जहाज ‘चो ह्योन’ नौसेना में शामिल किया गया था। जुलाई 2026 में कांग कोन से क्रूज मिसाइल, नौसैनिक तोप, एंटी-एयरक्राफ्ट हथियार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का परीक्षण भी किया गया था।
उत्तर कोरिया ने इस युद्धपोत को सिर्फ समुद्री गश्त के लिए इस्तेमाल होने वाला जहाज नहीं बताया है। किम जोंग उन के मुताबिक, यह परमाणु जवाबी कार्रवाई में भूमिका निभाने वाला प्लेटफॉर्म होगा। यानी किसी बड़े हमले की स्थिति में उत्तर कोरिया समुद्र से भी जवाब देने की क्षमता विकसित करना चाहता है। सबसे अहम बात यह है कि उत्तर कोरिया इसे सिर्फ समुद्री सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाला युद्धपोत नहीं बता रहा है। किम के मुताबिक, नया डिस्ट्रॉयर देश की राज्य परमाणु जवाबी कार्रवाई प्रणाली का हिस्सा होगा।
युद्धपोत ‘कांग कोन’ की तस्वीर। AP
डिस्ट्रॉयर की क्या है ताकत?
उत्तर कोरिया की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, यह उसके अब तक के सबसे आधुनिक और बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म में से एक है। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उत्तर कोरिया लंबे समय से अपनी परमाणु ताकत को जमीन आधारित मिसाइलों से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अगर परमाणु क्षमता को समुद्री प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाता है तो किसी विरोधी के लिए खतरे का आकलन और ज्यादा जटिल हो जाता है। यानी जवाबी कार्रवाई का खतरा सिर्फ जमीन से नहीं, बल्कि समुद्र से भी पैदा हो सकता है।
हालांकि, उत्तर कोरिया की ओर से किए गए सैन्य दावों को स्वतंत्र रूप से पूरी तरह सत्यापित करना मुश्किल है। इसलिए इस युद्धपोत की वास्तविक हथियार क्षमता और ऑपरेशनल क्षमता को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।
जानें युद्धपोत त ‘कांग कोन’ की ताकत। AI IMAGE
जमीन से समुद्र तक परमाणु रणनीति
उत्तर कोरिया की परमाणु ताकत को अब तक मुख्य रूप से जमीन आधारित मिसाइलों और अन्य रणनीतिक हथियारों के संदर्भ में देखा जाता रहा है। लेकिन समुद्री प्लेटफॉर्म इसमें एक नया आयाम जोड़ सकते हैं क्योंकि समुद्र में तैनात हथियारों को ट्रैक करना जमीन पर मौजूद स्थायी लॉन्च साइटों की तुलना में अधिक मुश्किल हो सकता है। इससे किसी विरोधी के लिए यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि हमला होने की स्थिति में उत्तर कोरिया के पास कहां और कितनी जवाबी क्षमता बची हुई है।
यही परमाणु प्रतिरोध यानी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का मूल विचार है, विरोधी को यह विश्वास दिलाना कि हमला करने पर जवाबी हमला इतना भारी हो सकता है कि उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालांकि, यहां एक जरूरी सावधानी भी है। उत्तर कोरिया अपने हथियारों को ‘परमाणु-सक्षम’ बताता है, लेकिन उसकी वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता और कुछ हथियार प्रणालियों की पूरी क्षमताओं को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना मुश्किल है। विशेषज्ञ भी कई मामलों में प्योंगयांग के दावों को सावधानी से देखने की सलाह देते हैं।
किम की रणनीति में ‘दो मोर्चे’ क्यों?
कांग कोन की तैनाती भी इस लिहाज से दिलचस्प है। यह जहाज उत्तर कोरिया के ईस्ट सी यानी जापान सागर वाले क्षेत्र में तैनात किया जाएगा, जबकि पहला चो ह्योन पश्चिमी तट से जुड़ा है। उत्तर कोरिया इस तरह अपने दोनों समुद्री क्षेत्रों में नए हथियारों की मौजूदगी बढ़ा रहा है।
इसका रणनीतिक फायदा यह हो सकता है कि उत्तर कोरिया अपनी नौसैनिक शक्ति को सिर्फ एक इलाके तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग दिशाओं में फैलाए। दूसरे शब्दों में किम की कोशिश शायद यह है कि उसकी परमाणु क्षमता का नक्शा सिर्फ ‘जमीन से हमला’ तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें ‘समुद्र से जवाब’ भी शामिल हो।
अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया की चिंता क्यों बढ़ेगी?
उत्तर कोरिया की समुद्री क्षमता में यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान अपनी सैन्य साझेदारी मजबूत कर रहे हैं। इसी दौरान तीनों देशों ने ‘फ्रीडम एज’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास भी शुरू किया है। प्योंगयांग इन अभ्यासों को लंबे समय से अपने खिलाफ संभावित सैन्य दबाव के तौर पर देखता रहा है।
इसलिए किम का संदेश साफ है कि अगर उसके विरोधी समुद्र में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाएंगे तो उत्तर कोरिया भी पीछे नहीं हटेगा। यही कारण है कि कांग कोन को सिर्फ एक नया जहाज मानना पूरी तस्वीर को छोटा करके देखना होगा।
किम की ‘समुद्री रणनीति’ का अंतिम लक्ष्य क्या?
उत्तर कोरिया शायद एक ऐसी नौसैनिक क्षमता तैयार करना चाहता है जिसमें तीन चीजें एक साथ काम करें।
पहला— नए डिस्ट्रॉयर, जो क्रूज मिसाइल और दूसरे रणनीतिक हथियार ले जा सकें।
दूसरा— बैलिस्टिक मिसाइल ले जाने वाली पनडुब्बियां, जो समुद्र से परमाणु जवाबी हमला करने की क्षमता बढ़ाएं।
तीसरा— भविष्य में परमाणु-संचालित पनडुब्बी, जो लंबे समय तक समुद्र में रहकर ज्यादा विश्वसनीय समुद्री परमाणु प्रतिरोध तैयार कर सके।
किन देशों के पास न्यूक्लियर-केपेबल नेवल प्लेटफॉर्म हैं?
अमेरिका – आर्ले बर्क-क्लास:
इस क्लास के युद्धपोत टॉमहॉक मिसाइलें दाग सकते हैं। हालांकि, टॉमहॉक का परमाणु संस्करण TLAM-N पहले मौजूद था, जिसे बाद में सेवा से हटा दिया गया। मौजूदा प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से पारंपरिक हथियारों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
रूस – उदालॉय/सोव्रेमेनी-क्लास:
रूसी नौसैनिक प्लेटफॉर्म कैलिबर और जिरकॉन जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस हैं। इनके कुछ संस्करणों की संभावित परमाणु भूमिका को लेकर भी चर्चा होती रही है।
चीन – टाइप-055 / टाइप-052डी:
चीन के आधुनिक डिस्ट्रॉयर लंबी दूरी की लैंड-अटैक क्रूज मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं। कुछ चीनी मिसाइल प्रणालियों को ड्यूल-कैपेबल यानी पारंपरिक और परमाणु, दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है।
उत्तर कोरिया – चो ह्योन श्रेणी / कांग कोन:
उत्तर कोरिया ने 2026 में दावा किया है कि उसके नए डिस्ट्रॉयर न्यूक्लियर-केपेबल हैं और इन्हें देश की परमाणु जवाबी कार्रवाई प्रणाली का हिस्सा बनाया जाएगा।
तानाशाह ने परमाणु प्रतिरोध पर इतना जोर क्यों दिया?
किम जोंग उन नए युद्धपोत को परमाणु प्रतिरोधक क्षमता से जोड़ते हुए लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि उत्तर कोरिया को और ज्यादा भरोसेमंद परमाणु क्षमता विकसित करनी होगी।
परमाणु प्रतिरोध का मूल सिद्धांत यह है कि अगर किसी देश के पास इतनी सैन्य ताकत हो कि उस पर हमला करने वाले को भी भारी नुकसान की आशंका रहे, तो विरोधी हमला करने से पहले कई बार सोचेगा। उत्तर कोरिया लंबे समय से इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।
अब वह अपनी परमाणु ताकत को समुद्री क्षमता से जोड़ने की कोशिश करता दिख रहा है। यही वजह है कि नए डिस्ट्रॉयर को लेकर दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान की नजरें टिकी हुई हैं।
क्या ये अमेरिका के लिए भी एक मैसेज है?
अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान ने इसी दौरान पांच दिन का त्रिपक्षीय सैन्य अभ्यास 'फ्रीडम एज' शुरू किया है। उत्तर कोरिया इन सैन्य अभ्यासों को लंबे समय से अपने खिलाफ संभावित हमले की तैयारी के तौर पर देखता रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में दक्षिण कोरिया के साथ बड़े सैन्य अभ्यास को कम करने का फैसला लिया था। इसे उत्तर कोरिया के साथ तनाव घटाने की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा गया। लेकिन प्योंगयांग ने इसके बावजूद अपनी सैन्य गतिविधियों को कम करने के बजाय नया डिस्ट्रॉयर सामने ला दिया। यानी अमेरिका ड्रिल कम करे या बढ़ाए, उत्तर कोरिया अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा है।
उत्तर कोरिया के तानाशह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर।
क्या ट्रंप और किम के बीच फिर होगी बातचीत?
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच भविष्य में बातचीत की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। दक्षिण कोरियाई खुफिया आकलनों में भी दोनों देशों के बीच संभावित संवाद के संकेतों की चर्चा हुई है। ऐसे में किम का नया डिस्ट्रॉयर सिर्फ सैन्य ताकत दिखाने का मामला नहीं हो सकता। इसे भविष्य में बातचीत की मेज पर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है।
उत्तर कोरिया एक तरफ अपनी परमाणु और नौसैनिक क्षमता को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ संभावित बातचीत के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करता दिख रहा है। ऐसे में कांग कोन की एंट्री सिर्फ उत्तर कोरिया की नौसैनिक ताकत में इजाफा नहीं, बल्कि उसकी बदलती परमाणु रणनीति का भी संकेत हो सकती है।
