संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने दुनिया के नक्शे में ऐतिहासिक सुधार करने और महाद्वीपों के वास्तविक आकार को सही ढंग से दर्शाने के लिए पेश किए गए प्रस्ताव Correct the Map (नक्शा सही करें) को भारी बहुमत से पारित कर दिया। इस प्रस्ताव के जरिए पिछले 450 से अधिक वर्षों से चले आ रहे विवादित नक्शे की जगह समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों को अपनाने का आह्वान किया गया है। इस ऐतिहासिक वोटिंग में भारत सहित 164 देशों ने समर्थन में वोट दिया, जबकि अमेरिका ने अकेले विरोध में मतदान किया। 6 देश (यूक्रेन, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और सर्बिया) मतदान से अनुपस्थित रहे। क्या है पूरा मामला, कैसा पैदा हुआ विवाद, और भारत का क्या नजरिए हैं, विस्तार से समझते हैं।
क्या है 16वीं सदी का 'मर्केटर नक्शा'है?
मौजूदा समय में दुनिया भर के स्कूलों, किताबों, मीडिया और गूगल मैप्स जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर 'मर्केटर प्रोजेक्शन' (Mercator Projection) का इस्तेमाल होता है। इस नक्शे को 1569 में आधुनिक बेल्जियम के मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर (Gerardus Mercator) ने तैयार किया था। इसे मुख्य रूप से जहाजरानी/समुद्री नेविगेशन (दिशा और कोण सीधे रखने) के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन इसमें एक खामी थी। मर्केटर नक्शे पर भूमध्य रेखा (Equator) से दूर उत्तर और दक्षिण में स्थित देशों (जैसे अमेरिका, यूरोप, ग्रीनलैंड और रूस) का आकार बहुत बड़ा दिखाई देता है, जबकि भूमध्य रेखा के पास स्थित ग्लोबल साउथ (अफ्रीका, भारत/दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका) का आकार काफी छोटा दिखता है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका एक ही आकार के दिखते हैं। जबकि असलियत में अफ्रीका (3.04 करोड़ वर्ग किमी) ग्रीनलैंड (22 लाख वर्ग किमी) से 14 गुना बड़ा है। अफ्रीका महाद्वीप इतना विशाल है कि इसके भीतर संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और पूरे पश्चिमी यूरोप को समाहित किया जा सकता है।
नए Equal Earth नक्शे की जरूरत क्यों पड़ी?
अफ्रीकी देश टॉगो (Togo) द्वारा अफ्रीकी संघ के समर्थन से लाए गए इस प्रस्ताव में कहा गया कि मर्केटर नक्शे की विकृतियों ने सदियों से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह पैदा किए हैं।इसे संज्ञानात्मक न्याय और ऐतिहासिक सुधार का मामला बताया गया। 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' (Equal Earth Projection), जिसे 2018 में विकसित किया गया या अन्य 'इक्वल एरिया' नक्शे महाद्वीपों के सापेक्ष आकार को बिल्कुल सटीक अनुपात में दिखाते हैं। इसमें अफ्रीका, भारत, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका अपने वास्तविक और बड़े आकार में नजर आते हैं।
भारत ने वोट देकर क्यों जताई आपत्ति?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि (प्रथम सचिव) रघू पुरी ने भारत का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत अधिक सटीक और प्रतिनिधि मानचित्रण का स्वागत करता है क्योंकि नक्शे समाज की भौगोलिक समझ को आकार देते हैं। हालांकि, भारत ने अपना समर्थन देते समय बेहद महत्वपूर्ण शर्तें रखीं।
- भारत ने साफ किया कि उसका समर्थन व्यापक समान-क्षेत्रफल सिद्धांतों के लिए है, न कि सिर्फ 'इक्वल अर्थ' (Equal Earth) या किसी एक विशिष्ट नक्शे/डिजाइन का एकतरफा अनुमोदन।
- भारत का कहना था कि अलग-अलग कार्यों (जैसे समुद्री नेविगेशन, नागरिक विमानन, शिक्षा या शोध) के लिए अलग-अलग नक्शों की जरूरत होती है। इसलिए प्रस्ताव को तकनीकी और पद्धतिगत रूप से तटस्थ रहना चाहिए।
विदेश मंत्रालय (MEA) का आधिकारिक रुख
विदेश मंत्रालय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह प्रस्ताव महाद्वीपों के भौगोलिक आकार के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है, न कि राष्ट्रीय सीमाओं से। भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा। भारत का संप्रभु क्षेत्र—जिसमें केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं, सिर्फ और सिर्फ भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दर्शाया जाना चाहिए। किसी भी नए वैश्विक नक्शे या प्रोजेक्शन द्वारा भारतीय सीमाओं में किसी भी प्रकार का गलत या भ्रामक चित्रण पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा।
अमेरिका ने क्यों दिया 'खिलाफ' में वोट?
अमेरिका ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस कदम की तीखी आलोचना की।अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा, "जब संयुक्त राष्ट्र यह सवाल करता है कि वह दुनिया में अपनी साख और गंभीरता क्यों खो रहा है, तो हमें ऐसे ही प्रस्तावों की ओर देखना पड़ता है।" अमेरिका का मानना था कि दुनिया इस समय युद्धों, भुखमरी और आर्थिक संकटों का सामना कर रही है, ऐसे समय में 16वीं सदी के नक्शों की बहस और वैचारिक एजेंडे में यूएन का समय और संसाधन नष्ट करना हास्यास्पद है।
इस प्रस्ताव का क्या असर होगा?
यूएन का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और न ही यह मर्केटर नक्शे के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाता है। यह प्रस्ताव दुनिया भर के शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया, सरकारों और टेक कंपनियों (जैसे Google Maps) को प्रोत्साहित करता है कि जहां आकार की तुलना महत्वपूर्ण हो, वहां 'इक्वल एरिया' नक्शों का उपयोग करें। फ्रांस ने घोषणा की है कि वह अपने स्कूलों और आधिकारिक सामग्रियों से मर्केटर नक्शा हटाकर नए सटीक नक्शों को अपनाएगा।