खामेनेई की तस्वीर से सिगरेट जला रहीं युवतियां, 217 मौतों का दावा; महंगाई से आजादी की मांग तक कैसे पहुंचा आंदोलन?
- Authored by: शिव शुक्ला
- Updated Jan 10, 2026, 07:43 PM IST
तेहरान के हालात बेहद नाजुक हैं। लोग सड़क पर हैं, हिंसा में कइयों की जान जा चुकी है, इंटरनेट सेवाएं लगभग 36 घंटे से ठप हैं। लोगों का गुस्सा ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई और शासन व्यवस्था के खिलाफ उग्र रूप ले चुका है। वहीं, ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि यह विरोध कब और कैसे शुरू हुआ, अभी इसका प्रसार कहां तक है और यह पहले के आंदोलनों से क्यों अलग है? साथ ही इसके पीछे ‘मोरल पुलिसिंग’, आर्थिक दबाव और अमेरिका के साथ टकराव जैसी परतें कैसे जुड़ी हैं?
ईरान में क्यों भड़का विद्रोह?
ईरान की सड़कों पर जो कुछ इन दिनों दिख रहा है, वह किसी हालिया फैसले या किसी एक घटना का परिणाम नहीं है। यह सालों की उस बेचैनी की तस्वीर है, जो दशकों से आम लोगों के भीतर जमा होती रही और अब अचानक बाहर आ गई है। इस आंदोलन की शुरुआत भले ही महंगाई से हुई हो, लेकिन बात अब सिर्फ वस्तुओं की कीमत और रियाल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने तक सीमित नहीं रह गई है। यह आंदोलन आज जीवन की आजादी, महिलाओं की भूमिका, राज्य की निगरानी और सत्ता की जवाबदेही जैसे बुनियादी सवालों तक पहुंच चुका है। लोगों का गुस्सा ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई और शासन व्यवस्था के खिलाफ उग्र रूप ले चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि यह विरोध कब और कैसे शुरू हुआ, अभी इसका प्रसार कहां तक है और यह पहले के आंदोलनों से क्यों अलग है? साथ ही इसके पीछे ‘मोरल पुलिसिंग’, आर्थिक दबाव और अमेरिका के साथ टकराव जैसी परतें कैसे जुड़ी हैं?
ईरान की सत्ता के केंद्र में कौन?
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था की जड़ें 1979 की इस्लामिक क्रांति में हैं, जब मौलवियों ने पश्चिम समर्थित शाह की सत्ता को हटाकर इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की थी। तब से देश की सर्वोच्च शक्ति निर्वाचित सरकार के बजाय धार्मिक नेतृत्व के पास केंद्रित रही है। भले ही 2024 में मसूद पेजेशकियान राष्ट्रपति चुने गए हों, लेकिन आज भी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई ही हैं।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान
कैसे और कब शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन?
ईरान में हालिया प्रदर्शन 28 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ था, जब तेज महंगाई, खाद्य और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में उछाल और रियाल के रिकॉर्ड स्तर तक गिरने से जनता का धैर्य टूट गया। शुरुआती प्रदर्शन बाजारों और व्यावसायिक इलाकों में व्यापारियों ने किया था। उन्होंने अपनी दुकानों के शटर गिरा दिए। जनता इस आंदोलन में तब जुड़ी जब बाजार से खाने का तेल, चिकन जैसी चीजें या तो गायब हो गईं या फिर उनकी कीमते बेहहाशा बढ़ गईं। वहीं, फिर खामेनेई सरकार द्वारा सस्ती डॉलर व्यवस्था को बंद कर देने के फैसले ने इस आग को और भड़का दिया।

इस सबके बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की जलती हुई तस्वीरों का इस्तेमाल करके सिगरेट जलाती हुई ईरानी महिलाओं की तस्वीरें वायरल हो गई हैं।
कहां तक फैला आंदोलन?
महंगाई की परेशानी सिर्फ एक शहर या एक वर्ग की नहीं थी। इसने हर परिवार को छुआ, बेरोजगारी ने युवाओं को। इसकी शुरुआत छोटे इलाकों से हुई, फिर तेहरान जैसे बड़े शहरों तक पहुंची। इंटरनेट बंदी और सख्त पुलिसिंग ने भी आग में घी का काम किया। लोगों को लगा कि सिर्फ उनकी मुश्किलें ही नहीं, उनकी आवाज भी दबाई जा रही है। यही भावना विरोध को स्थानीय से राष्ट्रीय लहर में बदल ले गई। अब तक ये आंदोलन देश के सभी 31 प्रांतो में फैल चुका है। इतना ही नहीं, इसमें हर उम्र और हर लिंग के लोग शामिल हैं। कई युवतियों को अयातुल्ला अली खामेनेई की तस्वीरों से सिगरेट जलाते हुए देखा जा रहा है।
हालिया प्रदर्शनों में अब तक करीब 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन तेज हो चुका है। यह आंदोलन साल 2022 के वीमेन लाइफ फ्रीडम आंदोलन के बाद सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन माना जा रहा है। ईरान के सर्वोच्च लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के विरोध में प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं और खुलकर खामेनेई मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। 28 दिसंबर से शुरू हुआ ये आंदोलन 13वें दिन में पहुंच चुका है। वहीं, ईरान के एक डॉक्टर ने दावा किया है सरकार आंदोलन में होने वाली मौतों के आंकड़ों को छिपा रही है। उन्होंने टाइम मैगजीन को बताया कि अब तक करीब 217 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, मौतों का जो आधिकारिक आंकड़ा है वो 62 ही है।
यह आंदोलन पहले के विरोध प्रदर्शनों से कैसे अलग है?
इस बार विरोध की सबसे अहम और असाधारण बात यह है कि इसकी चिंगारी उस वर्ग से उठी, जिसे अब तक सत्ता का पारंपरिक सहारा माना जाता रहा है वह है बाजार और व्यापारी समुदाय। ईरान के राजनीतिक इतिहास में कारोबारी और धार्मिक नेतृत्व का रिश्ता बहुत पुराना है। कई बार वहां सत्ता परिवर्तन में व्यापारियों की बड़ी भूमिका रही।1979 की इस्लामिक क्रांति में भी व्यापारियों के आर्थिक सहयोग ने मौलवियों को वह ताकत दी, जिससे शाह का शासन गिर सका। इस बार खामेनेई के यही समर्थक उनके विरोधी बन गए हैं। इसके अलावा, इस बार का विरोध प्रदर्शन किसी एक मुद्दे पर नहीं टिका। इस बार लोग महंगाई, सामाजिक पाबंदियां और राजनीतिक असंतोष तीनों के मुद्दे पर एक साथ आए हैं। दूसरी, इसमें महिलाओं की भूमिका बेहद मुखर है; वे सिर्फ आंदोलन में शामिल नहीं हैं, बल्कि आंदोलन का चेहरा बन रही हैं।
आंदोलन के पीछे की ये वजहें भी हैं
- कमजोर पड़ती अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई और गहराती गरीबी, ऊपर से सख्त नियम, पाबंदियां इन सबने मिलकर जनता में निराशा और हार की भावना पैदा कर दी है।
- ईरान की मुद्रा रियाल की कीमत इतनी गिर चुकी है कि आम लोगों की कमाई रोजमर्रा की जरूरतें भी मुश्किल से पूरी कर पा रही हैं।
- जनता का आरोप है कि सरकार अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा हिज़्बुल्लाह और हमास जैसे बाहरी गुटों को समर्थन देने में झोंक रही है, जबकि देश के भीतर जनता महंगाई से जूझ रही है।
- दूसरी ओर, हिजाब नियमों से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी तक, ईरान का युवा वर्ग अब इस तथाकथित ‘धार्मिक निगरानी’ से ऊब चुका है और एक खुली, आजाद जिंदगी चाहता है।
- वहीं, हाल के महीनों में इजराइल द्वारा ईरान के भीतर घुसकर हमास और हिज़्बुल्लाह के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाए जाने से लोगों के मन में यह सवाल और गहरा गया है कि जब सरकार अपनी सुरक्षा ही सुनिश्चित नहीं कर पा रही, तो आम नागरिकों की हिफाजत कैसे करेगी?
ताजा हालात क्या हैं?
ईरान में जारी प्रदर्शन को 12 दिन बीत चुके हैं। देश के पश्चिमी हिस्सों, खासकर कुर्द बहुल इलाकों में हालात सबसे ज्यादा तनावपूर्ण बने हुए हैं। यहां प्रदर्शनकारियों का सीधा निशाना सत्ता का शीर्ष बन चुका है। सड़कों पर गूंज रहे नारों में अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ खुली चुनौती दिखाई दे रही है। लोग ‘तानाशाही खत्म हो’, ‘सत्ता को जवाब देना होगा’ जैसे नारे लगा रहे हैं। राजधानी तेहरान, मशहद और कई बड़े शहरों में भी प्रदर्शनकारी राजशाही की वापसी और रजा पहलवी के नेतृत्व के समर्थन में नारे लगाते नजर आ रहे हैं। कई शहरों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे हालात और अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
इंटरनेट पर भी बैन
इसी बीच सरकार ने इंटरनेट पर पहरा लगा दिया है। इंटरनेट स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली संस्था नेटब्लॉक्स के अनुसार, देशभर में लगाया गया इंटरनेट शटडाउन 36 घंटे से अधिक समय बाद भी जारी है। संस्था का कहना है कि उनके नेटवर्क आंकड़े दिखाते हैं कि ईरान में ऑनलाइन कनेक्टिविटी अब भी लगभग पूरी तरह ठप है। तेज होते प्रदर्शनों के बीच सरकार ने न सिर्फ इंटरनेट बल्कि टेलीफोन सेवाओं पर भी व्यापक पाबंदियां लागू कर दी हैं, जिससे संपर्क और सूचनाओं के आदान–प्रदान पर भारी असर पड़ा है।
ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी देश लौटने को तैयार
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी का नाम काफी चर्चा में है। उन्होंने एक संदेश जारी कर लोगों को एकजुट होकर लड़ाई लड़ने को कहा था और शनिवार को फिर एक वीडियो बयान जारी किया है। उन्होंने फारसी में इस्लामिक रिपब्लिक शासन के खिलाफ दो और रातों के प्रदर्शनों और सरकारी कर्मचारियों से देश भर में हड़ताल में शामिल होने की अपील की है।
पहलवी ने गुरुवार और शुक्रवार की रात को ईरानियों के सड़कों पर उतरने के बाद प्रदर्शनकारियों की “हिम्मत” की तारीफ की और प्रदर्शनकारियों से अपील की कि वे बढ़ते विद्रोह को कंट्रोल करने की सरकार की काबिलियत को कमजोर करते रहें।
यातायात और ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वालों से मुखातिब, पहलवी ने शनिवार रात और रविवार को शाम 6 बजे इस्लामिक रिपब्लिक का विरोध करने के लिए फिर से सड़कों पर उतरने को कहा। रजा पहलवी ने इस संदेश में तख्तापलट की बात की। उन्होंने कहा कि हमारा मकसद अब सिर्फ सड़कों पर उतरना नहीं है। मकसद शहर के सेंटर्स पर कब्जा करने और उन्हें अपने कब्जे में रखने की तैयारी करना है। उन्होंने आगे कहा कि वह अपने वतन लौटने की तैयारी भी कर रहे हैं।
खामेनेई ने अमेरिका को बताया हिंसा का जिम्मेदार
वहीं, सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हमला करते हुए कहा कि उनके हाथ इरानियों के खून से सने हुए हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को 'आतंकवादी' करार दिया। साथ ही चेतावनी दी कि उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। न्यायपालिका प्रमुख घोलामहुसैन मोहसनी-एजी ने भी कहा कि प्रदर्शनों में शामिल लोगों को अत्यधिक सजा दी जाएगी।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई
ट्रंप ने क्या कहा?
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया गया, तो अमेरिका कड़े उपाय करेगा। उन्होंने कहा कि इरान बड़े संकट में है और लोग कुछ शहरों पर काबू पा रहे हैं, जो कुछ हफ्ते पहले असंभव लगते थे। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन ने तेहरान तक यह बात साफ़ पहुंचा दी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगी। इसके बाद ऊर्जा कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में भी उन्होंने दोहराया कि ईरानी सुरक्षा बलों को संयम बरतना चाहिए।

ट्रंप
मार्को रुबियो ने ईरानी आंदोलनकारियों को खुले समर्थन का दावा किया
इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरानी आंदोलनकारियों को खुले समर्थन का दावा किया है। उन्होंने कहा कि यूनाइटेड स्टेट्स ईरान के बहादुर लोगों का सपोर्ट करता है। उनका बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि ठीक एक दिन पहले लेबनान दौरे के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों को बढ़ाने का काम इजरायल और अमेरिका ने किया है। उनकी इस टिप्पणी को अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भ्रम का नाम दिया था। प्रवक्ता ने कहा कि यह बयान ईरानी सरकार के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों से ध्यान हटाने की एक भ्रमपूर्ण कोशिश दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और दबाव
वहीं, दुनिया की नजरें भी ईरान पर टिकीं हैं। कई देशों ने बल प्रयोग पर चिंता जताई है और संयम की अपील की है। मानवाधिकार संगठनों ने इंटरनेट बंदी और गिरफ्तारियों की आलोचना की। दूसरी ओर, तेहरान इसे आंतरिक मामला बताकर बाहरी दखल से इनकार करता रहा है। वैश्विक ध्यान से प्रदर्शनकारियों को नैतिक समर्थन मिला, लेकिन इससे सरकार की सख्ती भी कम नहीं हुई। ईरान के हालातों पर दुनियाभर से कई नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने संयुक्त बयान जारी कर हिंसा की निंदा की और इरानी नागरिकों को बिना डर के अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देने का आग्रह किया। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने भी पश्चिमी देशों से इरानी शासन की निंदा करने का आह्वान किया।