West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल के पूर्व वर्धमान जिले की कटवा विधानसभा सीट इस बार चुनावी नजरों के केंद्र में है, जहां मुकाबला मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच माना जा रहा है। इस क्षेत्र में किसानों की परेशानियां और युवाओं की आकांक्षाएं चुनावी बहस का अहम हिस्सा बनी हुई हैं। कभी यह सीट वाम का गढ़ हुआ करती थी, लेकिन टीएमसी ने उसे यहां उखाड़ कर फेंक दिया और अब बीजेपी टीएमसी से छिनने की तैयारी में है। कटवा एक सामान्य सीट है और पूर्व वर्धमान लोकसभा क्षेत्र के सात विधानसभा क्षेत्रों में शामिल है। यहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, जबकि करीब 35 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में निवास करती है। सामाजिक संरचना की बात करें तो अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 27 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 22 प्रतिशत है।
कटवा विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने यहां दो बार और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने छह बार जीत दर्ज की। कांग्रेस का भी यहां मजबूत प्रभाव रहा, खासकर वरिष्ठ नेता रवीन्द्रनाथ चटर्जी के नेतृत्व में, जिन्होंने 1996 में जीत हासिल की और फिर लगातार कई चुनाव जीते। बाद में चटर्जी 2016 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और 2016 व 2021 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। साल 2016 के चुनाव में कड़ा मुकाबला देखने को मिला था, जिसमें चटर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार श्यामा मजूमदार को केवल 911 वोटों से हराया था। 2021 में भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मजूमदार 9,155 मतों से चटर्जी से हार गए थे। इस बार चुनाव में चटर्जी का मुकाबला भाजपा उम्मीदवार कृष्णा घोष और माकपा के संजीब दास से है, हालांकि मुकाबला मुख्यतः दो दलों के बीच माना जा रहा है।
रणनीतिक दृष्टि से अहम
कटवा शहर के नाम पर बनी इस सीट का ऐतिहासिक महत्व भी है। अजय और हुगली नदियों के संगम के पास स्थित यह क्षेत्र कभी मुगल और नवाब काल में रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जाता था। स्थानीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है, जहां धान, जूट और सब्जियों की खेती होती है। छोटे व्यापार और उद्योग भी लोगों की आजीविका का हिस्सा हैं।
कटवा के मुद्दे
हालांकि, यहां के किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। आलू और धान जैसी फसलों के कम दाम मिलने से उनकी आय प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि बाजार भाव लागत के मुकाबले बेहद कम है और उन्हें मजबूरी में फसल बेचनी पड़ती है। वहीं, युवाओं के बीच रोजगार को लेकर निराशा भी देखने को मिल रही है। स्थानीय छात्र-छात्राओं का कहना है कि बेहतर शिक्षा और करियर के अवसरों की कमी उन्हें बड़े शहरों की ओर पलायन के लिए मजबूर कर रही है। कुल मिलाकर, कटवा में इस बार चुनाव सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि विकास, रोजगार और कृषि संकट जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है।
