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राजस्थान में मोदी की गारंटी के लिए वसुंधरा राजे साबित होंगी संजीवनी? समझिए अहमियत

Rajasthan Election 2023: भाजपा को इस बात का भरोसा है कि एक बार फिर राजस्थान में वो सरकार बनाने जा रही है। मगर इस चुनाव में वसुंधरा राजे की कितनी अहमियत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार अपने संबोधन में मोदी की गारंटी का जिक्र कर रहे हैं। इन वादों में वसुंधरा राजे की क्या भूमिका रहने वाली है?

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क्या फिर राजस्थान की मुख्यमंत्री बनेंगी वसुंधरा राजे?

Photo : Times Now Digital

BJP in Rajasthan Chunav: राजस्थान में क्या 5 साल भाजपा, 5 साल कांग्रेस वाला फॉर्मूला जारी रहेगा या फिर 30 साल पुराने रिकॉर्ड को कांग्रेस ध्वस्त कर देगी? इस सवाल का जवाब अगले महीने यानी 3 दिसंबर, 2023 को मिल जाएगा। राजस्थान में भाजपा पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है, मगर इसमें कोई शक नहीं है कि यदि भाजपा जीतती है तो वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद की प्रबल दावेदार होंगी। इन दिनों राजस्थान में 'मोदी की गारंटी' पर सियासी उठापटक का दौर बदस्तूर जारी है। भाजपा के लिए वसुंधरा राजे कितनी जरूरी हैं, आपको समझाते हैं।

मोदी की गारंटी और वसुंधरा राजे का चेहरा

"मोदी की गारंटी" के बैनर तले भाजपा राजस्थान में महिला सशक्तिकरण का वादा कर रही है। राजस्थान के राजनीतिक माहौल में इन दिनों अचानक काफी बदलाव देखा गया। विपक्षी पार्टी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे खुद पीएम मोदी के वादों को लेकर भाजपा पर पलटवार कर रहे हैं। महिलाओं के मुद्दे ने राजस्थान चुनाव में जोर पकड़ लिया है, ऐसे में वसुंधरा राजे एक बार फिर मजबूत होती नजर आ रही है। भाजपा ने जब पहली बार वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनाया था तो उस वक्त महिला सशक्तिकरण का संदेश देने की कोशिश की थी।

भाजपा के लिए कितनी अहम हैं वसुंधरा राजे?

साल 2003 की बात है जब अशोक गहलोत 5 साल तक सूबे के सीएम रहे। कांग्रेस को हराकर भाजपा वापस सत्ता में लौटी, तो पहली बार वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनाया गया था। भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर राजस्थान में महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया था। भाजपा-कांग्रेस के बीच 5-5 साल ये सिलसिला 30 सालों से जारी है। मगर जब राजस्थान विधानसभा चुनाव का जिक्र होता है तो साल 2013 की याद जरूर आती है, जब वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव लड़ा और राजस्थान के इतिहास में सबसे बड़ी जीत साबित हुई। साल 2013 में राजस्थान की लड़ाई अशोक गहलोत बनाम वसुंधरा राजे की हो चुकी थी। सूबे में भाजपा का चेहरा वसुंधरा थीं और कांग्रेस गहलोत के चेहरे पर अपना दांव खेलती थी। उस चुनाव में भाजपा ने 163 सीटों पर जीत का बिगुल बजाया और कांग्रेस की झोली में सिर्फ 37 विधानसभा सीटें गईं। वसुंधरा राजे एक दूसरी बार राजस्थान की सीएम बनीं। और इसी के साथ ये जीत राजस्थान के इतिहास की सबसे बड़ी जीत थी।

'राजस्थान की हर बहन-बेटी को ये मोदी की गारंटी'

इस बार के चुनाव में वसुंधरा राजे की राजनीतिक सुर्खियों में वापसी का सफर आसान नहीं रहा। माना जा रहा था कि पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया है, मगर वसुंधरा राजे जबसे एक्टिव हुईं तो हवा बदलनी शुरू हो गई। महिला आरक्षण विधेयक के लिए मोदी सरकार के रुख को लेकर वसुंधरा और राजस्थान ने स्पष्ट समर्थन किया। मोदी की गारंटी में महिलाओं-बेटियों पर खास जोर दिया जा रहा है। ऐसे में वसुंधरा की भूमिका अपने आप अहम हो जाती है। एक बार फिर भाजपा महिला सशक्तिकरण के रूप में वसुंधरा को आगे कर सकती है। हालांकि ये होता है या नहीं आने वाला वक्त ही बताएगा।

तीन दिसंबर को आएंगे चुनाव के नतीजे

भाजपा ने भले ही राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के लिए अपने चेहरे का ऐलान नहीं किया हो, मगर वसुंधरा राजे मोदी की गारंटी वाले वादों के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। राजस्थान में पिछले कई दिनों से भाजपा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। टिकट बंटवारे को लेकर कई नेताओं का विरोध देखा गया, वसुंधरा राजे के खेमे के कई नेताओं का टिकट कटा। इसके सीएम की कुर्सी के लिए वसुंधरा अभी भी रेस में बनी हुई हैं। तीन दिसंबर को तय हो जाएगा कि सूबे में भाजपा की सरकार बनती है या नहीं।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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