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INDIA में शामिल विपक्षी दलों के पास 'सिर्फ एक' सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा, समझिए मायने

Lok Sabha Chunav: वैसे तो विपक्षी पार्टियों के गठबंधन में शामिल पार्टियां आगामी चुनाव को लेकर कई मुद्दों को तूल दे रही हैं, मगर जिस सबसे बड़े मुद्दे का जिक्र किया जा रहा है वो है, 'मोदी को हराना' और 'भाजपा को देश की सत्ता से उखाड़ फेंकना'। आपको इसके सियासी मायने समझाते हैं।

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विपक्षी गठबंधन का सबसे बड़ा मुद्दा क्या?

Photo : BCCL

Elections 2024: एक वक्त था जब चुनावी रणभूमि में सियासी पार्टियों का चुनावी मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी, महिला सशक्तिकरण, गरीबी, भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द रहता था। सत्ताधारी पार्टियां हो या फिर विपक्षी दल सभी ने ऐसे ज्वलनशील मुद्दों को तूल दिया, जो सामाजिक सरोकार और जनहित से जुड़ा रहता था। विकास के मॉडलों का जिक्र किया जाता था, भ्रष्टाचार को उजागर कर सरकार की आलोचनाएं होती थीं, गरीबी, बेरोजगारी के आंकड़ों को दिखाकर चुनावी मैदान में सियासी दलों में दो-दो हाथ होते थे। जनता मुद्दों के आधार पर फैसला करती थी। पर सियासत का स्वरूप अब बदल चुका है।

गाली, आलोचना, टांग खिंचाई पर सबका ध्यान

सियासत कितनी बदल चुकी है इसका अंदाजा विपक्षी पार्टियों के गठबंधन में शामिल पार्टियों के सबसे बड़े चुनावी एजेंडे से समझा जा सकता है। चुनाव आते ही बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, जब उसे धरातल पर उतारने की बारी आती है तो मिजाज बदला-बदला नजर आने लगता है। पहले के समय में जब कोई विपक्षी पार्टी सरकार पर आरोप लगाती थी तो उसके मजबूत आधार हुआ करते थे, घोटालों के सबूत पेश किए जाते थे। मगर आज के दौर में आधारहीन इल्जाम लगाने का ट्रेंड है। गाली देकर आलोचना करना एक प्रकार का फैशन बन चुका है। बेतुकी बयानबाजी और टांग खिंचाई का सिलसिला अब आम बात हो गई है।

विपक्षी गठबंधन INDIA का सबसे बड़ा मुद्दा क्या?

लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर 28 विपक्षी दलों ने गठबंधन कर इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (INDIA) का गठन किया। इस गुट ने चार बैठकें की, जिनमें कई विषयों पर चर्चा हुई। कहा गया कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की उपेक्षा, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, अन्याय और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर पार्टियां एकजुट हुई हैं। मगर जब इन पार्टियों के नेताओं से ये सवाल पूछा जाता है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो एक-दूसरे के विरोधी कहे जाने वाले कई दल इस गठबंधन में साथ आ गए, तो जवाब यही मिलता है कि 'हम सबका लक्ष्य मोदी को हराना है। भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए हम साथ आए हैं।'

मतलब साफ है इन पार्टियों का सबसे बड़ा मुद्दा है मोदी को हराना और भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकना। इस बात का जिक्र सिर्फ एक नेता ने नहीं किया, बल्कि इस मुद्दे को लेकर सभी के सुर एक दूसरे से पूरी तरह मेल खाते हैं। इस गठबंधन में कई ऐसे भी दल हैं जो खुद कभी भाजपा के साथ सरकार में शामिल थे।

किन-किन नेताओं ने भाजपा को हराने की ठानी?

मोदी को हराना और भाजपा को सरकार से बेदखल करने के लिए कई पार्टियां अपने दिल पर पत्थर रखकर उन विरोधी पार्टियों के साथ मंच साझा करने पर मजबूर हो गए, जो एक दूसरे को फूटे आंख भी नहीं देखना चाहते थे। इनमें कांग्रेसी नेताओं के अलावा ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, नीतीश कुमार, लालू यादव, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता और उनकी पार्टियां शामिल हैं।

नेताओं की मजबूरी, गठबंधन के लिए जरूरी

इन नेताओं में सबसे ज्यादा मजबूर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी नजर आ रही हैं, जिन पर बार-बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी निशाना साध रहे हैं। हालांकि चुनाव और गठबंधन को देखते हुए ममता कुछ भी बोलने के मूड में नहीं हैं। वहीं हाल ही में अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस पार्टी के बीच भी जमकर तकरार देखी गई थी। एमपी चुनाव में दोनों ने एक-दूसरे को जमकर खरी-खोटी सुनाई थी।

महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना की हातल भी कांग्रेस के सामने कुछ ठीक नहीं है। दोनों की पार्टियां टूट चुकी हैं, ऐसे में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटों की डिमांड करने के मूड में होगी। पलटी मारने में माहिर कहे जाने वाले नीतीश कुमार की भी मजबूरी ही है जो कभी सियासत में अपने सबसे बड़े विरोधी लालू यादव से बार-बार गले मिलना पड़ता है। अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के बीच का विवाद किसी से छिपा नहीं है।

मतलब साफ है, इन सभी पार्टियों ने अब तक महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, किसान को लेकर अपना प्लान नहीं बताया, मगर ये लक्ष्य सभी ने बताया कि मोदी को हराना ही उनका असल मकसद है। भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का दावा करने वाली INDIA खेमे की पार्टियों में अबतक सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन सकी है। इन दलों के बीच 4 राउंड की बैठक हो चुकी है। ये बात और है कि बैठकों में सीट शेयरिंग जैसे अहम मुद्दे पर एक बार भी चर्चा नहीं हुई।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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