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Kannauj Lok Sabha Election: 12 साल बाद अखिलेश यादव की कन्नौज में वापसी ने बिगाड़ा भाजपा का समीकरण, कैसे रहेंगे नतीजे

Kannauj Lok Sabha Election: कन्नौज लोकसभा सीट पर मतदान हो चुका है। यहां अखिलेश यादव बनाम निवर्तमान सांसद सुब्रत पाठक के बीच मुकाबला था। अब लोगों को इंतजार है तो बस 4 जून का, इस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के साथ-साथ कन्नौज लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों से भी पर्दा उठेगा।

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Kannauj Lok Sabha Seat

Photo : Times Now Digital

Kannauj Lok Sabha Election: उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों की बात की जाए तो कन्नौज लोकसभा सीट का नाम सबकी जुबान पर रहता है। मुलायम सिंह यादव की जमाने में कभी समाजवादी पार्टी का गढ़ रही यह लोकसभा सीट 2019 के चुनाव में सपा के हाथ से छिटक गई थी और भाजपा ने यहां चौंकाने वाली जीत हासिल की। भारतीय जनता पार्टी इस बार भी जीत के लिए आश्वस्त थी, लेकिन अंतिम समय में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने इस सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर भाजपा के सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया।

कन्नौज लोकसभा सीट पर मतदान हो चुका है। यहां अखिलेश यादव बनाम निवर्तमान सांसद सुब्रत पाठक के बीच मुकाबला था। अब लोगों को इंतजार है तो बस 4 जून का, इस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के साथ-साथ कन्नौज लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों से भी पर्दा उठेगा। आइए जानते हैं इस सीट का सियासी इतिहास कैसा रहा और अखिलेश यादव की वापसी ने भाजपा को कितना नुकसान पहुंचाया।

लोहिया ने पहली बार हासिल की थी जीत

कन्नौज लोसकभा सीट पहली बार 1967 में अस्तित्व में आई थी और इसी साल हुए आम चुनाव में यहां दिग्गज समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेस के एसएन मिश्रा को 472 वोटों के अंतर से हराया था। हालांकि, 1971 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज में बाजी पलट गई और कांग्रेस प्रत्याशी एसएन मिश्रा ने इस सीट से जीत हासिल की। हालांकि, आपातकाल के बाद 1977 में यह सीट कांग्रेस के कब्जे में नहीं रह पाई और भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे राम प्रकाश त्रिपाठी ने जीत हासिल की। 1980 के मध्यावधि चुनाव में यह सीट जनता पार्टी (सेकुलर) के उम्मीदवार छोट सिंह यादव के कब्जे में चली गई। हालांकि, 1984 के चुनाव में इस सीट पर शीला दीक्षित की एंट्री हुई और उन्होंने जीत हासिल की।

कैसे सपा का गढ़ बनी कन्नौज

1984 के बाद हुए आम चुनावों में कन्नौज लोकसभा सीट पर हार-जीत का सिलसिला लगा रहा। इसके बाद जब 1999 का चुनाव आया तो इस सीट पर मुलायम सिंह यादव की एंट्री हुई और उन्होंने यहां के साथ-साथ संभल लोकसभा सीट से भी जीत हासिल की। हालांकि, नतीजों के बाद मुलायम सिंह ने कन्नौज लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया और 2000 के उपचुनाव में उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मैदान में उतारा। यहीं से अखिलेश यादव की सियासत में भी एंट्री हुई। अखिलेश यादव इस सीट पर 2000 के बाद 2004 और 2009 में भी जीत हासिल की। हालांकि, 2012 में अखिलेश यादव ने इस सीट से इस्तीफा दे दिया और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बन गए। उन्होंने अपनी पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारा और वह निर्विरोध चुनी गईं। 2014 के चुनाव में डिंपल यादव और भाजपा के सुब्रत पाठक के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया और इस चुनाव को डिंपल यादव सिर्फ 19,907 वोटों से जीत सकीं।

करीब 12 साल बाद अखिलेश यादव की वापसी

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत पाठक ने सपा के इस अभेद किले को भेद दिया और उन्होंने डिंपल यादव को 12,353 वोटों से हराया। सुब्रत पाठक इस बार भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने करीब 12 साल बाद कन्नौज में वापसी का ऐलान कर भाजपा के सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया है।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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