West Bengal Assembly Election 2026: पहले चरण के बाद बुधवार, 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में दूसरे फेज के मतदान संपन्न हो चुके हैं। इसी बीच 90 वर्षीय बंदना सेन, जो लंबे समय से अस्वस्थ चल रही हैं और हाल ही में कई बार अस्पताल में भर्ती हो चुकी हैं, कुछ दिन पहले एक खास मुलाकात से वे हैरान रह गईं। दक्षिण कोलकाता स्थित उनके घर पर चुनाव आयोग के अधिकारी पहुंचे और उन्हें मतदान प्रक्रिया में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। वरिष्ठ नागरिक होने के कारण अधिकारियों ने उन्हें घर से ही मतदान करने की सुविधा देने की बात कही, ताकि उन्हें मतदान केंद्र तक न जाना पड़े। हालांकि वहां मौजूद अधिकांश अधिकारियों को यह जानकारी नहीं थी कि बंदना सेन के ससुर सुकुमार सेन स्वतंत्र भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। उन्होंने ही देश के पहले आम चुनावों की ऐतिहासिक प्रक्रिया की निगरानी की थी और भारत के लोकतांत्रिक सफर की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी।
पहली बार कब किया था मताधिकार का इस्तेमाल?
सेन परिवार इस अनुभव से बेहद खुश और भावुक है। बंदना सेन ने पहली बार वर्ष 1957 में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। उनके बेटे और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सुदीप्तो सेन ने बताया कि चुनाव आयोग की यह पहल किसी पारिवारिक पहचान की वजह से नहीं थी, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों को मतदान प्रक्रिया से जोड़ने के विशेष अभियान का हिस्सा थी। उन्होंने कहा कि अधिकारियों की टीम में सिर्फ एक महिला अधिकारी को ही यह जानकारी थी कि बंदना सेन देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन की बहू हैं और उन्होंने भी शुरुआती मतदान प्रक्रिया पूरी होने तक यह बात बाकी अधिकारियों को नहीं बताई।
बंदना सेन ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को क्या बताया?
मतदान करने के बाद बंदना सेन ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से कहा कि उनका चुनावी प्रक्रिया से एक पुराना और खास संबंध भी रहा है। उन्होंने बताया कि 1962 के लोकसभा चुनाव से पहले, जब के.वी.के. सुंदरम मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब सेन परिवार से अमिट स्याही की जांच में सहयोग करने का अनुरोध किया गया था। उस समय 26 वर्षीय गृहिणी बंदना सेन, जो 1957 से सुकुमार सेन की बहू थीं, ने चुनाव से काफी पहले अपनी उंगलियों पर वह स्याही लगवाई थी। उन्होंने अधिकारियों को बताया कि यह प्रक्रिया इस बात की जांच के लिए थी कि मतदान में इस्तेमाल होने वाली स्याही कितनी प्रभावी और टिकाऊ साबित होती है।
Indelible Ink की जांच में सहयोग
मतदान करने के बाद बंदना सेन ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से कहा कि उनका चुनावी प्रक्रिया से एक पुराना और खास संबंध भी रहा है। उन्होंने बताया कि 1962 के लोकसभा चुनाव से पहले, जब के.वी.के. सुंदरम मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब सेन परिवार से अमिट स्याही (Indelible Ink) की जांच में सहयोग करने का अनुरोध किया गया था। उस समय 26 वर्षीय गृहिणी बंदना सेन, जो 1957 से सुकुमार सेन की बहू थीं, ने चुनाव से काफी पहले अपनी उंगलियों पर वह स्याही लगवाई थी। उन्होंने अधिकारियों को बताया कि यह प्रक्रिया इस बात की जांच के लिए थी कि मतदान में इस्तेमाल होने वाली स्याही कितनी प्रभावी और टिकाऊ साबित होती है।
कैसे हुआ मतदान?
बंदना सेन के मतदान की पूरी प्रक्रिया कई दिन पहले ही शुरू हो गई थी। चुनाव आयोग की एक अधिकारी, जिन्हें उनके ससुर सुकुमार सेन के बारे में जानकारी थी, जरूरी दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी कराने के लिए तीन बार उनसे मिलने पहुंचीं। मतदान के दिन अधिकारियों ने उनके बिस्तर के पास ही अस्थायी मतदान केंद्र तैयार किया, जहां उन्होंने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। मतदान पूरा होने के बाद अधिकारियों ने वोट वाले लिफाफे को नियमानुसार सील कर दिया।
सेन परिवार की देश के लिए सेवा
भारत के पहले चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल पूरा करने के बाद सुकुमार सेन को दंडकारण्य आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। इस आयोग का उद्देश्य तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास और सहायता कार्यों को संभालना था। संक्षिप्त बीमारी के बाद वर्ष 1963 में उनका निधन हो गया। सुकुमार सेन के भाई अशोक सेन भी देश की राजनीति में अहम भूमिका निभा चुके थे। वे जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में केंद्रीय कानून मंत्री रहे। वहीं बंदना सेन के दिवंगत पति दीपक सेन पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे।
