JEE Advanced Topper 2026 Kabir Chhillar: इजीनियरिंग की दुनिया में सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा JEE Main और JEE Advanced 2026 में देश के लाखों छात्रों ने अपना भाग्य आजमाया। लेकिन इस साल गुरुग्राम के रहने वाले 18 वर्षीय कबीर छिल्लर (Kabir Chhillar) ने जो इतिहास रचा है, उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। कबीर ने पहले JEE Main 2026 में 300 में से पूरे 300 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक-1 (AIR 1) हासिल की और उसके बाद JEE Advanced 2026 में 360 में से 329 अंक लाकर ऑल इंडिया रैंक-2 (AIR 2) अपने नाम कर इतिहास रच दिया है। यह कहानी केवल अंकों की नहीं, बल्कि कबीर के उस अनोखे नजरिए की है जिसने कोचिंग संस्कृति के पुराने ढर्रे से अलग एक नया 'टॉपर फॉर्मूला' दिया। आइए जानते हैं कि उनकी सक्सेस स्टोरी के बारे में।
"पेपर से पहले भी शांत था और बाद में भी"
अक्सर देखा जाता है कि परीक्षा के नाम से ही छात्र भारी मानसिक तनाव में चले जाते हैं। लेकिन कबीर के मामले में ऐसा नहीं था। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका शांत दिमाग रहा। अपनी सफलता पर बात करते हुए कबीर ने कहा कि "मैं पेपर से पहले भी रिलैक्स था, पेपर के दौरान भी शांत था और पेपर देने के बाद भी रिलैक्स था।" उन्होंने कभी भी अंकों या रैंक के दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया, बल्कि उनका पूरा ध्यान विषयों को सही ढंग से सीखने और समझने पर था।
घंटों की नहीं बल्कि क्वालिटी स्टडी पर दिया जोर
देश की सबसे कठिन इंजीनियरिंग परीक्षा पास करन के लिए कहा जाता था कि कुछ घंटों की पढ़ाई नहीं बल्कि 14 से 15 घंटे की पढ़ाई करने पड़ती है। लेकिन इस बात को भी कबीर ने गलत साबित किया। जेईई एडवांस्ड एआईआर 2 कबीर ने इस रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने बताया कि वह रोजाना केवल 8 से 10 घंटे फोकस होकर पढ़ाई करते थे। उनके मुताबिक, पढ़ाई में मायने यह नहीं रखता कि आप कितने घंटे बैठते हैं, बल्कि यह मायने रखता है कि उस दौरान आपका ध्यान कितना सटीक है। उन्होंने क्वालिटी ओवर क्वांटिटी को सपोर्ट किया है।
रटने के बजाय कॉन्सेप्ट क्लियरिटी करना और सेल्फ-एनालिसिस है जरूरी
कबीर का मानना है कि केवल फॉर्मूले रट लेने से जेईई जैसी कठिन परीक्षा क्रैक नहीं की जा सकती। उन्होंने अपनी तैयारी के दौरान किसी भी शॉर्टकट का सहारा नहीं लिया। फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स (PCM) के गहरे वैज्ञानिक सिद्धांतों और उनके व्यावहारिक उपयोग को समझना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। मॉक टेस्ट देने के बाद अधिकांश छात्र केवल अपने नंबर देखते हैं, लेकिन कबीर का तरीका इन सबसे अलग था। वे हर टेस्ट के बाद अपनी गलतियों का बारीकी से एनालिसिस करते थे। कबीर बताते हैं कि "अगर मुझसे कोई सिली मिस्टेक होती थी, तो मैं सोचता था कि उस वक्त मेरे दिमाग में क्या चल रहा था? मैंने ऐसा क्यों सोचा? इस निरंतर फीडबैक प्रक्रिया ने मेरी एक्यूरेसी और टाइम मैनेजमेंट को बहुत मजबूत किया।"
छोटे-छोटे डेली टारगेट में बांटा बड़ा सिलेबस
जेईई का सिलेबस एक विशाल समंदर की तरह है, जिसे देखकर कोई भी छात्र घबरा सकता है। कबीर ने इस समस्या का हल निकालने के लिए पूरे पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे और आसान डेली टारगेट में बांट दिया। जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि छोटे हिस्सों को बड़े हिस्सों की तुलना में याद करना आसान होता है। उन्होंने इस तरकीब के अनुसार ही पढ़ाई की। वह हर दिन सुबह उठकर अपने लिए एक टारगेट सेट करते थे, अपने नोट्स व्यवस्थित रखते थे और नियमित रूप से उनका रिवीजन करते थे।
10वीं में मिले थे 98% अंक
कबीर बचपन से ही पढ़ने में तेज रहे हैं। उनके पिता, जिन्होंने खुद IIT खड़गपुर से सॉफ्टवेयर इंजीनियर की थी, बताते हैं कि जब कबीर कक्षा 2 में था, तब टीचर ने उनसे पृथ्वी से सबसे दूर स्थित दूसरे तारे का नाम पूछा था। कबीर ने एक के बजाय लाइन से 10 तारों के नाम गिना दिए थे। इसी प्रतिभा के दम पर कबीर ने 10वीं कक्षा में भी 98 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। कबीर के इस शानदार सफर में उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान रहा। उनके पिता मोहित छिल्लर एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं और मां प्रियंका छिल्लर एक स्कूल टीचर हैं। कबीर के घर का माहौल हमेशा से शिक्षा के अनुकूल था और उनके परिवार का एक ही मंत्र था— "अपना कर्म करो और परिणाम को भूल जाओ।"
ओलंपियाड की असफलता से मिली सीख
शुरुआत में कबीर के माता-पिता उन्हें कोचिंग के गढ़ 'कोटा' भेजने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन कबीर ने खुद जिद करके एलन करियर इंस्टीट्यूट, कोटा में दाखिला लिया। कोटा में देश भर के बेहतरीन दिमागों से मिलकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा। हालांकि, कक्षा 11वीं में वे एक साइंस ओलंपियाड के अगले राउंड में क्वालीफाई करने से चूक गए। इस असफलता से उन्होंने सीखा कि बिना पूरे आत्मविश्वास के परीक्षा हॉल में नहीं जाना चाहिए, जिसके बाद उन्होंने हर टेस्ट को पूरे कॉन्फिडेंस के साथ दिया।
फुटबॉल और दोस्तों के साथ स्ट्रेस मैनेजमेंट
कबीर किताबी कीड़ा बनकर रहने के सख्त खिलाफ थे। वे इंग्लिश प्रीमियर लीग (EPL) के बहुत बड़े फैन हैं और खुद हरियाणा की तरफ से फुटबॉल प्रतियोगिताओं में खेल चुके हैं। पढ़ाई के तनाव को दूर करने के लिए वे नियमित रूप से फुटबॉल खेलते थे, संगीत सुनते थे और अपने दोस्तों के साथ वक्त बिताते थे, जिससे उनका दिमाग हमेशा फ्रेश रहता था और पढ़ाई में फोकस बेहतर हो पाता था।
आईआईटी बॉम्बे और दुनिया की नंबर-1 यूनिवर्सिटी MIT
जेईई एडवांस में देश में दूसरा स्थान हासिल करने के बाद अब कबीर का भविष्य को लेकर विजन बिल्कुल साफ है। वे IIT बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग (CSE) में बी.टेक करना चाहते हैं। इसके बाद, उनका सपना उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका के मशहूर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) जाने का है। फिलहाल, कबीर इंटरनेशनल केमिस्ट्री ओलंपियाड की तैयारियों में जुटे हैं।
