Paper Manufacturing Process: हम रोजाना स्कूल, कॉलेज या दफ्तरों में जिस कॉपी, नोटबुक या रजिस्टर का इस्तेमाल लिखने के लिए करते हैं, लेकिन इनके पन्नों पर लिखते हुए आपने कभी सोचा की इसे बनाया कैसे जाता है। किसी से भी पूछा जाए की नोटबुक में इस्तेमाल होने वाले पन्ने या कागज कैसे बनता है, तो जवाब आता है पेड़ों से। बता दें कि पन्नों के बनने के पीछे एक बेहद दिलचस्प और जटिल औद्योगिक प्रक्रिया छिपी होती है। नोटबुक के पन्नों, विशेष रूप से लेआउट या 'लेग पेज' की ढलाई और छपाई केवल कागज बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रीसाइक्लिंग, पल्पिंग, रिफाइनिंग, रोलिंग और सटीक रूलिंग (लाइनिंग) का एक तकनीकी सफर है। अक्सर छात्रों और आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि पेड़ों की लकड़ियों या रद्दी कागजों से लेकर हमारे हाथों में मौजूद चिकने, सफेद और लाइन वाले पन्ने आखिर किस प्रक्रिया से गुजर कर तैयार होते हैं। तो आइए आपको इसके बारे में आज विस्तार से बताएं -
कच्चा माल और लुगदी तैयार करने की प्रक्रिया
कागज निर्माण की शुरुआत सबसे पहले कच्चे माल के चयन से होती है। मुख्य रूप से दो प्रकार के कच्चे माल का उपयोग किया जाता है— पहला, पेड़ों की मुलायम लकड़ी (सॉफ्टवुड/हार्डवुड) और दूसरा, रीसायकल किया गया पुराना कागज और रद्दी। आइए अब इसके आगे प्रक्रिया के बारे में जानें-
चिपिंग और कुकिंग: लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठों को मशीनों में डालकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है, जिसे चिपिंग कहा जाता है। इसके बाद इन्हें केमिकल डाइजेस्टर में उच्च तापमान और दबाव पर पकाया जाता है, जिससे लकड़ी में मौजूद 'लिग्निन' अलग हो जाता है और प्राकृतिक फाइबर प्राप्त होता है।
ब्लीचिंग: तैयार लुगदी यानी पल्प का रंग भूरा होता है और हमारी कॉपी में इस्तेमाल होने वाले पन्नों का रंग सफेद। तो बता दें कि कॉपियों के पन्नों को दूधिया सफेद बनाने के लिए इसमें हाइड्रोजन पेरोक्साइड या क्लोरीन-फ्री ब्लीचिंग एजेंट मिलाए जाते हैं, जिसके कारण यह चटर सफेद रंग के बनते है।
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पेपर शीट का निर्माण
लुगदी तैयार होने और ब्लीचिंग की प्रक्रिया पूरी करने के बाद इसे विशाल फोरड्रिनियर पेपर मेकिंग मशीन में भेजा जाता है। जहां, 99% पानी और 1% फाइबर के घोल को एक चलती हुई मेश यानी जाली पर फैलाया जाता है। वैक्यूम और रोलर्स के जरिए पानी को बाहर निकाला जाता है। उसके बाद बचे गीली फाइबर शीट को भारी भाप से गर्म रोलर्स के बीच से गुजारा जाता है। इसके बाद 'कैलेंडर रोलर्स' कागज की सतह को दबाकर एकदम समतल, चिकना और एक समान मोटाई (GSM) प्रदान करते हैं।
कॉपियों के पन्नों का जीएसएम कितना होता है?
बता दें कि पेपर की मोटाई को जीएसएम कहा जाता है। मार्केट में विभिन्न प्रकार के जीएसएम वाले पेपर उपलब्ध हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉपियों के लिए आमतौर पर कितने जीएसएम की शीट का इस्तेमाल किया जाता है। बता दें कि कॉपियों में 58 GSM से 70 GSM तक के कागज का उपयोग होता है।
लेग पेज या रूलिंग की छपाई
कागज के बड़े रोल तैयार होने के बाद एक सबसे मुख्य चरण शुरू होता है— जो रूलिंग (Ruling) है, जिसे आम भाषा में 'लेग पेज' या 'लाइनिंग पेज' बनाना कहा जाता है। नोटबुक बनाने वाली फैक्ट्रियों में ऑटोमेटिक 'रूलिंग सह कटिंग' मशीनें लगी होती हैं। कागज का बड़ा रोल एक तरफ से मशीन में डाला जाता है। वाटर-बेस्ड जल्दी से सुखाने वाली स्याही का उपयोग करके कागज के दोनों तरफ एक साथ नीली, काली या लाल लाइनें छापी जाती हैं।
सिंगल लाइन/फोर लाइन: आवश्यकतानुसार हिंदी के लिए सिंगल लाइन, अंग्रेजी के लिए फोर-लाइन या गणित के लिए स्क्वायर बॉक्स बनाए जाते हैं।
मार्जिन लाइन: पन्ने के बाएं हिस्से पर लाल रंग की वर्टिकल मार्जिन लाइन खींची जाती है, जिसे हेडर/फुटर और बाइंडिंग स्पेस के लिए छोड़ा जाता है।
कटिंग, फोल्डिंग और स्टिचिंग
रूलिंग के बाद कागज की शीट आगे की प्रोसेसिंग के लिए जाती है, जिसमें कंटिंग, फोल्डिंग और स्टिचिंग का काम शामिल होता है। इस दौरान रूलिंग मशीन पन्नों को नोटबुक के निर्धारित आकार में काटती है और उन्हें मोड़ने का काम करती है। अंदरूनी लेग पेजों के सेट के ऊपर प्रिंटेड गत्ते का कवर लगाया जाता है। इसके बाद पिनिंग या थ्रेड बाइंडिंग (सिलाई) द्वारा पन्नों को एक साथ मजबूती से बांधा जाता है। इसके बाद बाइंडिंग के बाद कॉपी के तीनों किनारों को हाइड्रोलिक कटिंग ब्लेड से एकदम फिनिशिंग के साथ काटा जाता है ताकि सभी पन्ने बराबर और साफ दिखें।
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इन कड़े नियमों के साथ होता है कागज का निर्माण
गुणवत्ता, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए पन्नों के निर्माण को लेकर कड़े नियमों का पालन किया जाता है। जी हां, कागज निर्माताओं को यह प्रमाणित करना होता है कि इस्तेमाल की गई लकड़ी टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल जंगलों से ली गई है। साथ ही भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के नियमों के अनुसार, शैक्षणिक कॉपियों में स्याही के फैलाव को रोकने के लिए निर्धारित मानक GSM का ही प्रयोग किया गया है। स्कूली बच्चों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कॉपियों में छापी जाने वाली लाइनों के लिए हेवी-मेटल फ्री और इको-फ्रेंडली स्याही का इस्तेमाल किया गया है, ताकि उन्हें परेशानी न हो।
ऊपर दिए गए लंबे प्रोसेस के बाद ऑटोमेटिक और मानक-आधारित प्रक्रिया के गुजरने के बाद ही एक सादा कागज 'लेग पेज' में बदलकर हमारे इस्तेमाल योग्य नोटबुक के रूप में बाजार में आता है, जिसका इस्तेमाल हम स्कूल, कॉलेज और ऑफिस में अलग-अलग रूप में करते हैं।
