भारत में फोटो वाले आईडी कार्ड की शुरुआत का पूरा श्रेय 10वीं मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन (T. N. Seshan) को जाता है। उन्होंने साल 1990 में पद संभाला और चुनाव प्रणाली को सुधारने का बीड़ा उठाया। टी. एन. शेषन ने ही पहली बार फर्जी वोटिंग रोकने के लिए फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड का आइडिया दिया था।
टी. एन. शेषन के कड़े प्रयासों के बाद देश में आधिकारिक तौर पर फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड की शुरुआत साल 1993 में की गई। शुरुआती समय में इस योजना का पुरजोर विरोध किया गया और इसे खर्चीला बताया गया, लेकिन शेषन के दृढ़ फैसले ने पूरे देश में इसे लागू किया।
1993 में जब पहली बार फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड बनाया गया, तो वह आज के आधुनिक PVC कार्ड के जैसा बिल्कुल नहीं था। शुरुआती समय में वोटर आईडी कार्ड काले और सफेद रंग का होता था, जिसमें धुंधली सी फोटो और डिटेल्स शामिल थी। इसपर प्लास्टिक लेमिनेशन किया जाता था ताकि यह फटे या गले न और सुरक्षित रहे।
फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड बनाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती फोटो हुआ करती थी। जी हां, 90 के दशक में देश की एक बड़ी आबादी के पास अपनी कोई फोटो नहीं थी। ऐसे में चुनाव आयोग के लिए करोड़ों लोगों की तस्वीरें खींचना, उनका रिकॉर्ड बनाना और कार्ड प्रिंट करना एक बेहद जटिल और खर्चीला काम था। कई राजनीतिक दलों ने यह दावा भी किया था कि यह कभी सफल नहीं हो पाएगा।
जब सरकारों ने बजट और संसाधनों का बहाना बनाया तो टी. एन. शेषन ने बिना झुके साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि मतदाताओं को फोटो वाले पहचान पत्र उपलब्ध नहीं कराया गया तो वे देश के किसी भी राज्य का चुनाव आयोजित नहीं कराएंगे।
समय बदलने के साथ तकनीकों में आए बदलाव के वोटर आईडी कार्ड का रूप भी बदल गया। पहले ब्लैक एंड व्हाइट फोटो हुआ करती थी अब कार्ड पर रंगीन फोटो देखने को मिलती है। पुराने समय के कागज वाले लेमिनेटेड कार्ड की जगह अब हाई-टेक डिजिटल पीवीसी कार्ड ने ले ली है।
टी. एन. शेषन फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड वाले इस फैसले ने भारतीय चुनाव प्रणाली की पूरी तस्वीर ही बदल दी। इसने 'फर्जी मतदान' और 'बूथ कैप्चरिंग' जैसी गंभीर समस्याओं पर काफी हद तक लगाम लगा दी। आज फोटो वाले यह कार्ड न केवल वोट देने के लिए, बल्कि देश के हर नागरिक के लिए एक वैध पहचान पत्र बन चुके हैं।