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प्रदर्शनकारियों को पकड़कर यहां क्यों लाती है पुलिस? कभी यहीं बनने वाला था राष्ट्रपति भवन!

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं को अक्सर पुलिस हिरासत में लेकर यहां ले जाती है। आखिर क्यों प्रदर्शनकारियों को यहां ले जाती है पुलिस? यह इलाका ऐतिहासिक है और माना जाता है कि कभी यहां राजधानी बसने वाली थी।

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प्रदर्शनकारियों को पकड़कर यहीं लाती है दिल्ली पुलिस

दिल्ली देश की राजधानी और यहां अक्सर राजनीतिक और अन्य तरह के धरने प्रदर्शन होते रहते हैं। कभी-कभी प्रदर्शन उग्र हो जाते हैं या कानून व्यवस्था को बनाने के लिए पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लेती है। ऐसे में आंदोलनकारियों, विशेषतौर पर हिरासत में लिए गए नेताओं को लेकर पुलिस दिल्ली में एक खास जगह पहुंचती है। इस जगह का संबंध ब्रिटिश काल से है और कभी यहां पर रानी विक्टोरिया के लिए दरबार सजाया गया था। आखिर कौन सी है वह जगह और क्या है उस जगह की खासियत, चलिए जानते हैं -

प्रदर्शनकारियों को कहां ले जाती है दिल्ली पुलिस

दिल्ली पुलिस आंदोलन और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के बाद किंग्जवे कैंप पहुंचती है। यहां पुलिस लाइन में प्रदर्शनकारियों को रखा जाता है। हालांकि, अब किंग्जवे कैंप का नाम बदलकर जीटीबी नगर (गुरु तेग बहादुर नगर) कर दिया गया है, लेकिन आज भी आम बोलचाल में इसके लिए लोग किंग्जवे कैंप नाम ही पुकारते हैं। कभी-कभी इसे सिर्फ कैंप कहकर भी पुकारा जाता है।

प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर यहां क्यों लाती है पुलिस?

किंग्जवे कैंप स्थित पुलिस लाइन में सुरक्षा व्यवस्था काफी अच्छी है। यहां बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं। इसलिए किसी नेता या वीवीआईपी की सुरक्षा में कोई दिक्कत नहीं होती। प्रदर्शनकारियों को यहां उत्सव सदन में रखा जाता है। यहां काफी जगह मौजूद है। दिल्ली में आमतौर पर धरने जंतर-मंतर या संसद भवन के आसपास होते हैं। ऐसे में किंग्जवे कैंप की यहां से दूरी भी एक कारण है कि पुलिस प्रदर्शनकारियों को पकड़कर यहां लाती है। कैंप की दूरी प्रदर्शन स्थल से 10-12 किमी दूर है, जिसके कारण प्रदर्शनकारी वापस जल्द सी धरना स्थल तक नहीं पहुंच पाते हैं।

किंग्जवे कैंप का सीधे अर्थों में मतलब निकाला जाए तो यह राजा का रास्ता और कैंप यानी शिविर है। यह वह जगह है जहां गुलामी के समय में कभी राजाओं को टेंट-तंबू गाड़कर ठहराया जाता था। फिर कभी यहां पर शरणार्थियों के लिए भी शिविर बनाए गए थे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से लेकर भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं को अलग-अलग समय पर पुलिस प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लेकर यहां लेकर जा चुकी है।

तो किंग्जवे कैंप में होता राष्ट्रपति भवन!

ब्रिटिश काल में रियासतों के राजाओं, मंत्रियों और विशेष मेहमानों को यहां पर ठहराया जाता था। एक समय ब्रिटिश सरकार के वायसराय का निवास भी यहीं पर था। माना जाता है कि प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया, अन्यथा उस समय वायसराय हाउस और अब राष्ट्रपति भवन भी इसी जीटीबी नगर इलाके में होता। कहते हैं वायसराय आज के दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिज क्षेत्र में रुके थे। आज जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति का ऑफिस है, कभी वह वायसराय का निवास हुआ करता था। इस लिहाज से संभव है कि यहीं पर अंग्रेज अपनी राजधानी बसाते। यहां नई राजधानी व राजनिवास के लिए स्मृति पत्थर भी लगाया गया।

फिर बाद में वायसराय हाउस और राजधानी की जगह बदल दी गई, क्योंकि यहां से यमुना नदी काफी नजदीक थी और बाढ़ आने का खतरा हमेशा बना रहता। इसी डर के चलते नई राजधानी और वायसराय हाउस (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) को रायसीना हिल्स में बसाया गया। अगर शुरुआती योजना परवान चढ़ती तो आज राष्ट्रपति भवन जीटीबी नगर में मौजूद होता।

ब्रिटिश इंडिया में 1 जनवरी 1877 को महारानी विक्टोरिया को भारत की शासक घोषित किया गया। उस समय इसी इलाके में उनका दरबार लगाया गया था। इसके लिए किंग्जवे कैंप चौक से बुराड़ी की तरफ जाने वाले रास्ते पर आज के कोरोनेशन पार्क की जगह को चुना गया था। हालांकि, इस दरबार में महारानी विक्टोरिया कभी नहीं आई, तत्कालीन वायसराय लियट्टन ने उनका प्रतिनिधित्व किया। ब्रिटिश सरकार के कई बड़े अधिकारी, सरकारी प्रतिनिधि, सैन्य अधिकारी, देश के कई राजघरानों के लोग दरबार में आए और उन्हें यहीं ठहराया गया।

यहीं पर राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाने का हुआ फैसला

फिर 1 जनवरी 1903 को दूसरी बार कोरोनेशन पार्क में दरबार लगा। उस समय एडवर्ड सप्तम को सम्राट घोषित किया गया था और उस समय लॉर्ड कर्जन भारत के वायसराय थे। उस समय भी कई रियासतों से राजा-महाराजा, सामंत, ब्रिटिश सरकार और सैन्य अधिकारी दिल्ली आए। उस समय यहां एक विशेष रेलवे लाइन भी बिछाई गई थी। एडवर्ड के आने की तैयारियां पूरी थीं, लेकिन वह नहीं आ सके तो उनके भाई यहां पहुंचे।

फिर 12 फरवरी 2011 कोरोनेशन पार्क में जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हुआ। एक बार फिर यहां दरबार लगा। एक बार फिर अलग-अलग रियासतों से राजा-महाराजा और सामंत दिल्ली आए। इसी दरबार में ब्रिटिश इंडिया की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाए जाने की घोषणा भी हुई।

आजादी के बाद किंग्जवे कैंप

साल 1947 में देश आजाद हुआ और भारत-पाकिस्तान के रूप में दो हिस्सों में बंट गया। उस दौरान सीमा पार से लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत आए। दिल्ली में कई जगह रिफ्यूजी कैंप लगाए गए। दिल्ली में सबसे बड़ा रिफ्यूजी कैंप किंग्जवे कैंप में ही लगाया गया था। उस समय बड़ी संख्या में सीमा पार से आए शरणार्थी यहां लंबे समय तक तंबूओं में रहे।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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