Shivratri Special: आज सावन शिवरात्रि के अवसर पर देशभर के शिवालयों में शिवभक्त जलाभिषेक कर रहे हैं। खासतौर पर कांवड़ लाने वाले शिवभक्त अपने अपने इलाकों के शिवमंदिरों में पहुंचकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर रहे हैं। शिवलिंग की पूजा और जलाभिषेक, रुद्राभिषेक आपने भी किया होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवलिंग की पूजा कब और कहां से शुरू हुई थी। चलिए जानते हैं -
भारत में भगवान शिव की पूजा की परंपरा बहुत ही प्राचीन मानी जाती है। लेकिन यहां हम इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं कि दुनिया में पहली बार शिवलिंग की पूजा कहां शुरू हुई थी? हालांकि, इसका कोई ऐसा पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर किसी एक स्थान को निश्चित रूप से शिवलिंग पूजा का जन्मस्थान तय किया जा सके। इतिहास और पुरातत्व में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सुबूत जरूर हैं, जो इस परंपरा की प्राचीनता की तरफ संकेत करते हैं।
जागेश्वर धाम में शुरू हुई शिवलिंग की पूजा
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित पवित्र धाम Jageswar भी काफी मशहूर है। जागेश्वर धाम को कई कथाओं में वह स्थान माना गया है जहां सप्तऋषियों ने सबसे पहले शिवलिंग स्थापित कर पूजा की थी। मान्यता है कि यहीं पर सबसे पहले शिवलिंग की पूजा शुरू हुई थी। यहां लगभग 250 मंदिर हैं, जिनमें से 224 छोटे-बड़े मंदिर एक ही प्रांगण में मौजूद हैं। जागेश्वर धाम जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से करीब 35-40 किमी और काठगोदाम रेलवे स्टेशन से लगभघ 125 किमी दूर है।

जागेश्वर मंदिर
गुप्तेश्वर महादेव मंदिर
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में मौजूद गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के शिवलिंग को दुनिया के सबसे पुराने शिवलिंगों में से एक माना जाता है। यह शिवलिंग यहां एक गुफा के अंदर है और इसके बारे में धार्मिक पुष्तकों में भी जिक्र है। माना जाता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है।
सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा दावा कितना सही?
सिंधु घाटी सभ्यता के कई पुरातात्विक स्थलों से ऐसे पत्थर और आकृतियां मिली हैं, जिन्हें कुछ विद्वानों ने लिंग और योनि के प्रारंभिक रूपों से जोड़ा है। यह सभ्यता लगभग 3000 साल ईसा पूर्व में विकसित हुई थी। कुछ पुराने अध्ययनों में इन आकृतियों को प्रजनन या उर्वरता से जुड़े प्रतीकों के रूप में देखा गया है।
हालांकि, यहां सावधानी जरूरी है। उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री से यह स्पष्ट नहीं होता कि सिंधु सभ्यता के लोग इन्हीं वस्तुओं को शिवलिंग के रूप में पूजते थे। इसी तरह प्रसिद्ध 'पशुपति' मुहर को भी शिव का प्रारंभिक रूप मानने की परिकल्पना मौजूद है, लेकिन आधुनिक विद्वानों में इस पहचान को लेकर पूर्ण सहमति नहीं है।
गुडिमल्लम लिंग सबसे अहम प्रमाण
बात ऐसे प्राचीन शिवलिंग की हो रही है, जिसकी पहचान शिव से अधिक स्पष्ट रूप से जुड़ी हुई है, तो आंध्र प्रदेश का गुडिमल्लम लिंग बेहद अहम माना जाता है। गुडिमल्लम के परशुरामेश्वर मंदिर में स्थित इस लिंग पर शिव की मानव आकृति उकेरी गई है। कला-इतिहास के कुछ अध्ययनों में इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास का माना गया है। इसे भारत में उपलब्ध सबसे शुरुआती स्पष्ट शिवलिंगों में शामिल किया जाता है।
क्या यहीं से शुरू हुई थी शिवलिंग पूजा?
इतिहासकारों के लिए भी इसका जवाब सीधा 'हां' नहीं है। शोध बताते हैं कि शिव लिंग की अवधारणा और शिव पूजा का विकास कई सदियों में हुआ। शिव के प्रतीक के रूप में लिंग बाद में शैव परंपरा का प्रमुख धार्मिक प्रतीक बन गया। धार्मिक ग्रंथों, कला और मंदिर परंपरा में इसका स्वरूप समय के साथ विकसित हुआ।
इसलिए उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि शिवलिंग पूजा की जड़ें बेहद प्राचीन हैं, लेकिन दुनिया में इसकी शुरुआत किसी एक स्थान पर हुई थी, ऐसा निर्णायक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। सिंधु सभ्यता संभावित शुरुआती सांस्कृतिक संदर्भ देती है, जबकि गुडिमल्लम लिंग शिवलिंग के स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाणों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
