पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का साल एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया है। दशकों तक वामपंथियों और फिर तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग रहे इस राज्य में अब भगवा लहर ने अपनी जगह बना ली है। सुवेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभालने के लिए तैयार हैं। लेकिन बंगाल में यह बदलाव सिर्फ चेहरों का नहीं है, बल्कि प्रतीकों का भी है। इसी कड़ी में सबसे बड़ा फैसला यह लिया गया है कि राज्य का पॉवर सेंटर अब हावड़ा के 'नबन्ना' से हटकर वापस कोलकाता की ऐतिहासिक ‘राइटर्स बिल्डिंग’ में लौटेगा।
इतिहास की जड़ों में राइटर्स बिल्डिंग
कोलकाता के हृदय स्थल बीबीडी बाग में स्थित यह इमारत करीब 250 साल पुरानी है। इसकी नींव तब रखी गई थी जब भारत की राजधानी दिल्ली नहीं बल्कि कलकत्ता हुआ करती थी। 1777 में थॉमस लियोन द्वारा डिजाइन की गई यह इमारत शुरू में ईस्ट इंडिया कंपनी के जूनियर क्लर्कों के रहने और बैठने के लिए बनाई गई थी, जिन्हें उस समय 'राइटर' कहा जाता था। इसी कारण इसका नाम 'राइटर्स बिल्डिंग' पड़ा। 1854 में इसे पूरी तरह कंपनी ने खरीद लिया और धीरे-धीरे यह ब्रिटिश हुकूमत का सबसे ताकतवर गढ़ बन गई।

250 साल पुरानी राइटर्स बिल्डिंग (चित्र साभार: Incredible India)
क्रांतिकारियों की वीरता का गवाह: बीबीडी बाग
राइटर्स बिल्डिंग के ठीक सामने तीन महापुरुषों की आदमकद मूर्तियां खड़ी हैं, बिनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता। इन्हीं के नाम पर इस इलाके को 'बीबीडी बाग' कहा जाता है। 8 दिसंबर 1930 को इन तीनों क्रांतिकारियों ने यूरोपीय लिबास में इस इमारत के भीतर घुसकर अत्याचारी ब्रिटिश अफसर कर्नल एन. सिम्पसन को गोली मार दी थी। घंटों चली गोलीबारी के बाद जब गोला-बारूद खत्म हो गया, तो इन वीरों ने आत्मसमर्पण के बजाय मौत को चुना। बादल ने जहर खा लिया, जबकि बिनॉय और दिनेश ने खुद को गोली मार ली।
ममता बनर्जी की कसम और नबन्ना का उदय
आजादी के बाद राइटर्स बिल्डिंग पश्चिम बंगाल का सचिवालय बनी और 2013 तक सत्ता का सर्वोच्च केंद्र रही। लेकिन इसके साथ एक कड़वी याद भी जुड़ी है। 1993 में युवा कांग्रेस नेता के तौर पर ममता बनर्जी एक दुष्कर्म पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलने यहां आई थीं। तब पुलिस ने उन्हें घसीटते हुए सीढ़ियों से नीचे उतारा था, जिसके बाद उन्होंने कसम खाई थी कि वह मुख्यमंत्री बनकर ही यहां लौटेंगी। 2011 में उन्होंने यह कसम पूरी की, लेकिन 2013 में सुरक्षा और मरम्मत का हवाला देकर सचिवालय को हावड़ा की 14 मंजिला इमारत 'नबन्ना' में शिफ्ट कर दिया।
भाजपा का प्रतीकवाद और भविष्य की योजना
भाजपा के सत्ता में आने के बाद अब फिर से बदलाव की बयार है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार 2021 के अपने वादे के अनुसार राइटर्स बिल्डिंग से ही शासन चलाएगी। हालांकि, राइटर्स बिल्डिंग वर्तमान में जीर्णोद्धार के दौर से गुजर रही है। लोक निर्माण विभाग के अनुसार, मुख्य इमारत का केवल 25% काम पूरा हुआ है और इसे पूरी तरह तैयार होने में 6 से 8 महीने लग सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार, जब तक राइटर्स बिल्डिंग तैयार नहीं हो जाती, तब तक नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल विधानसभा के 'विस्तार भवन' (Extension Building) से अपना कामकाज संभाल सकते हैं। विधानसभा सचिवालय को इसके लिए बुनियादी ढांचा और सुरक्षा व्यवस्था तैयार रखने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

लाल कोठी के नाम से भी जानी जाती है राइटर्स बिल्डिंग (चित्र साभार: Incredible India)
सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, भावनाएं भी
टेराकोटा ईंटों से बनी यह तीन मंजिला इमारत, जिसकी छत पर ग्रीक और रोमन देवताओं की मूर्तियां न्याय और वाणिज्य का संदेश देती हैं, एक बार फिर 'लाल कोठी' के रूप में अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक गौरव को वापस पाने की कोशिश है जिसे बंगाल की मिट्टी और वहां के क्रांतिकारियों ने सींचा है। नबन्ना का दौर शायद एक अध्याय था, लेकिन राइटर्स बिल्डिंग की वापसी बंगाल की शाश्वत पहचान की ओर एक कदम है।
