अयोध्या : राम मंदिर में चढ़ावे की कथित हेराफेरी के मामले में आरोपियों के वकील ने मंगलवार को विशेष अदालत में पुलिस की जांच और एफआईआर में लगाई गई धाराओं पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष ने दावा किया कि पुलिस ने मामले में चोरी और गबन, दोनों से जुड़ी धाराएं लगा दी हैं, जबकि ये दोनों धाराएं एक साथ लागू नहीं हो सकतीं। आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ता कुल शेखर सिंह ने अयोध्या की विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) राजत वर्मा की अदालत में अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि आरोपियों पर ऐसी धाराएं भी लगाई गई हैं, जिनमें आजीवन कारावास का प्रावधान है।
वकील ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आजीवन कारावास जैसी कठोर सजा का प्रावधान ऐसे मामलों में लागू नहीं किया जा सकता, जहां आरोपी आदतन अपराधी हों या पहले किसी अपराध में दोषी ठहराए जा चुके हों। बचाव पक्ष के मुताबिक, इस मामले में आरोपी पहली बार अपराध के आरोपों का सामना कर रहे हैं।
आरोपियों को सरकारी कर्मचारी के रूप में पेश किया
कुल शेखर सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने आरोपियों को सरकारी कर्मचारी के रूप में पेश किया है और उन पर सार्वजनिक संपत्ति के गबन से संबंधित धाराएं लगाई हैं। उनका तर्क था कि राम मंदिर का प्रबंधन करने वाला ट्रस्ट सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है। मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से गठित विशेष जांच दल (SIT) की शुरुआती रिपोर्ट के बाद आगे बढ़ी। SIT ने 23 जून को अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी थी, जिसके बाद कथित चढ़ावा हेराफेरी के मामले में एफआईआर दर्ज की गई और मंदिर में दान की राशि की गिनती से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
इसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए कई लोगों के बयान दर्ज किए। इनमें श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का बयान भी शामिल है।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि यदि पुलिस ने सही धाराओं में मामला दर्ज किया होता तो उनके मुवक्किलों को स्थानीय अदालत से जमानत मिल सकती थी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी।
