शहर

क्या मैली ही रहेगी गंगा? पानी में बह गए 1000 करोड़! सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर नहीं लगाम; CAG रिपोर्ट में खुली पोल

गंगा सफाई को लेकर लंबे समय से सरकार एक बड़ा अमाउंट खर्च कर रही है, लेकिन कोई बेहतर परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। ताजा सीएजी की रिपोर्ट में पाया गया है कि उत्तराखंड में 1,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन एक तिहाई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अभी भी गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं।

Image

उत्तराखंड में गंगा को दूषित कर रहे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट

राम तेरी गंगा मैली ही रहेगी या कभी अविरल नीर लेकर बहेगी? अभी तक को कानपुर शहर बट्टा लगा रहा था। लेकिन इस जिस राज्य से गंगा का उद्गम है वहीं से धारा मैली सी हो चली है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट कह रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में गंगा नदी के पानी को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट दूषित कर रहे हैं। कैग ऑटिड रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में लगभग एक तिहाई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) भारी खर्चे के बावजूद गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों में गंदा जहरीला (मल-मूत्र) वााल पानी छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 44 संयंत्रों में से 12, यानी लगभग 32%, अपर्याप्त क्षमता, दोषपूर्ण कनेक्शन और खराब रखरखाव के कारण बिना साफ किए कूड़ा कचरा रहित पानी छोड़ रहे हैं। इससे न सिर्फ गंगा की सफाई पर व्यवधान आ रहा है, बल्कि इस पर नहाने और आचमन करने वाले लोगों को भी खतरा है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के हवाले से साल 2018-2023 की अवधि के बीच ऑडिट में गंगा सफाई को लेकर खर्च और परिणामों के बीच अंतर को उजागर किया गया, जिसमें यह बताया गया कि राज्य में लगभग 1,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन सीवेज प्रबंधन में सीमित सुधार हुआ। दशकों के सफाई प्रयासों के बावजूद, देवप्रयाग से हरिद्वार तक नदी के किनारे प्रदूषण का सबब बना हुआ है।

ऑडिट में पाया गया कि कई प्लांट टेक्निकल और परिचालन संबंधी समस्याओं के कारण या तो खराब प्रदर्शन कर रहे थे या पूरी तरह से बंद हो गए थे। ऋषिकेश, कीर्ति नगर और रुद्रप्रयाग में स्थित संयंत्र अपर्याप्त क्षमता या जल निकासी प्रणालियों में खराबी के कारण बिना साफ किए सीवेज को सीधे बहा रहे थे। गंगा नदी में अभी भी कई गंदे नाले और सीवर का पानी सीधे गिर रहा है।

कई स्थानों पर रिसाव और रुकावटों के कारण संरचनात्मक दोषों के कारण उचित ट्रीटमेंट संभव नहीं हो पाया। गोपेश्वर और कर्णप्रयाग में क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत नहीं की गई, जबकि कुछ संयंत्र घरों से निकलने वाले दूषित जल को एकत्रित करने में विफल रहे। रिपोर्ट में निगरानी में लापरवाही का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें फरवरी 2023 के एक निरीक्षण का हवाला दिया गया है, जिसमें बिना किसी कानूनी कार्रवाई के अनुपचारित (Untreated) सीवेज को नदी में बहाया जा रहा था। इसके अलावा, सुरक्षा और निर्माण संबंधी चिंताओं के कारण 18 संयंत्रों को रखरखाव एजेंसियों द्वारा अपने नियंत्रण में नहीं लिया गया, जिससे संचालन में देरी हुई और निगरानी प्रणालियां कमजोर हो गईं।

एनजीटी के मानकों का नहीं है ख्याल

पर्यावरण मानकों का अनुपालन खराब पाया गया। 2023 की शुरुआत में निरीक्षण किए गए 44 संयंत्रों में से केवल पांच ही राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा कर पाए, जबकि अधिकांश निर्धारित मानकों को पूरा करने में विफल रहे। साल के अंत में स्थिति और भी खराब हो गई, केवल तीन संयंत्र ही मानकों को पूरा कर पाए। इसके अलावा, 33 संयंत्र केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरे।

रिपोर्ट में मल में पाए जाने वाले कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के खतरनाक स्तर की ओर इशारा किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है और गंभीर प्रदूषण का संकेत देता है। हरिद्वार और ऋषिकेश में पानी की गुणवत्ता मुख्य रूप से 'बी' श्रेणी में बनी रही, जिसमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ही कुछ समय के लिए सुधार हुआ था।

ऑडिट में नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत बुनियादी ढांचे और योजना में मौजूद प्रमुख कमियों को भी उजागर किया गया। हालांकि 2014 और 2023 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की गई, उत्तराखंड में कई संयंत्र सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं रहे, जिससे वे अप्रभावी हो गए। कुछ कस्बों में ट्रीटमेंट सुविधाएं तो बनाई गईं, लेकिन उनमें घरों तक पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिसे लेखा परीक्षकों ने 'प्रतीकात्मक' बताया। रिपोर्ट में व्यापक नदी बेसिन प्रबंधन योजना के अभाव और योजना निर्माण में सीमित सामुदायिक भागीदारी का भी उल्लेख किया गया है।

2014 में नमामि गंगे की शुरू हुई कवायत

केंद्र में 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद गंगा की निर्मलता और अविरता को बनाए रखने के लिए नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की गई थी। हजारो करोड़ रुपये आवंटित कर नदी को दूषित होने से बचाने के लिए योजना को व्यापक तौर पर प्रचार प्रसार के साथ लॉच किया गया। वर्तमान में भी नमामि गंगे सहित कई परियोजनाओं पर काम लगातार चल रहा है। बावजूद इसके गंगा को किनारे बसे शहरों के नालों ने दूषित करना नहीं छोड़ा। प्रदूषित गंगा की हालत ऐसी है कि लोग इसका पानी पीना तो दूर नहाने और आचमन करने लायक नहीं समझते।

देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (Hindi News) पढ़ें हिंदी में और देखें छोटी बड़ी सभी न्यूज़ Times Now Navbharat Live TV पर। शहर (Cities News in Hindi) अपडेट और चुनाव (Elections) की ताजा समाचार के लिए जुड़े रहे Times Now Navbharat से।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमार author

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से ... और देखें

End of Article