Mumbai Dabbawala History: मुंबई की पहचान आर्थिक राजधानी, मायानगरी, लोकल ट्रेन से तो है ही इसके साथ डब्बावालों की भी खास भूमिका है। कहते हैं कि मुंबई की लाइफलाइन(Dabbawala News) पर भले ही असर पड़े। लेकिन डब्बावाले पर अपने क्लांट्स को लेकर इतने समर्पित होते हैं कि वो किसी भी मुश्किल की परवाह नहीं करते। मुंबई हमले के बाद जब पूरा शहर ठहर गया तो उस समय भी डब्बावाले(Dabbawala service Mumbai) अपनी सेवा देते रहे। मुंबई के डब्बावाले एक बार फिर चर्चा में हैं। किंग्स चार्ल्स की ताजपोशी (King Charles Coronation) में उन्हें विशेष मेहमान की तरह बुलाया गया है। यहां हम बताएंगे कि मुंबई शहर से इन डब्बावालों का नाता कबसे है, वो किस तरह से अपने फर्ज को अंजाम देते हैं। मुंबई में घर और दफ्तर तक टिफिन बॉक्स यानी डब्बा पहुंचाने की शुरुआत 1890 से हुई। खासतौर से मुंबई में रहने वाले पारसी और अंग्रेज परिवारों में इस तरह की डिमांड थी। महादेव भावाजी बछ्छे(Mahadev Bhavaji ) पहले वो शख्स से जिनको पहला डब्बावाला होने का गौरव हासिल हुआ।
डब्बावालों पर एक नजर
- 1890 में मुंबई में से शुरुआत
- पारसी और ब्रिटिश लोगों की थी डिमांड
- समय और गुणवत्तायुक्त खाना पहचान
- ब्रिटेन के राजशाही से खास संबंध
मुंबई में पांच हजार डब्बावाले
ताजा आंकड़ों के मुताबिक सफेद कुर्ता और पगड़ी पहन करीब 5 हजार डब्बावाले करीब दो लाख लोगों की जरूरतों को पूरी करते हैं। ये शहर के डब्बावाले हैं, जिनका एकमात्र काम यह सुनिश्चित करना है कि मुंबई के आसपास के घरों से आने वाला भोजन लंच के समय सुरक्षित रूप से उनके मालिकों तक पहुंचे। इनका पूरा सिस्टम चार बुनियादी स्तंभों यानी दक्षता, समय प्रबंधन, समन्वय और संस्कृति पर काम करता है। लोगों का कहना है कि वे चीजों को जटिल नहीं बनाते हैं। वे बाहरी मूल्य नहीं जोड़ते हैं। वे आसानी से समझते हैं कि उनके ग्राहक क्या चाहते हैं, और वे उस आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपना 100 प्रतिशत समय और ऊर्जा केंद्रित करते हैं।वे एक संगठित सहकारी समिति का हिस्सा हैं जो नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। अधिकांश डब्बावाले महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय से संबंधित हैं, और इस समुदाय को एक घनिष्ठ संबंध के रूप में जाना जाता है अगली पीढ़ी अक्सर अपने पिता से आगे बढ़कर इस श्रृंखला को जारी रखते हैं।
