दोजख में पांव हाथ में जाम-ए-शराब हो..
ये शेर है सरजमीन-ए-हिंदुस्तान की मिट्टी से निकले उस शायर का, जिसने गजलों को उसके दर्द और विरह से आजाद किया। नगमों को इश्क, मोहब्बत और मिलन का नया जोड़ा पहनाया। शायरी के पैरों से भारी-भरकम फारसी की पायल उतार दिल्ली की आसान उर्दू से सजाया। उसके लिखे शेर उसके बदन पर लगे इत्र से भी ज्यादा खुशबू देते। हम बात कर रहे हैं उर्दू शायरी के उस नगमानिगार की, जिसे लोग आज दाग देहलवी के नाम से जानते हैं।
दाग का असल नाम इब्राहिम था। 1831ई. में दिल्ली में पैदा हुए। जब वो महज चार बरस के थे तभी उनके वालिद नवाब शम्सुद्दीन वाली-ए-फिरोजपुर झिरका अंग्रेज अफसर के कत्ल की साजिश के आरोप में फांसी पर चढा दिये गए। पिता के इंतेकाल के बाद उनकी मां ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बेटे वली अहद मिर्जा फखरू से निकाह कर लिया। नए वालिद से दाग को नया नाम मिला- नवाब मिर्जा खान।
खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
दाग देहलवी
दाग दिल्ली के लाल किले में जवान हुए। यहां उन्होंने उस जमाने के मशहूर शायर जौक को अपना उस्ताद बनाया और गजल-शायरी की तालीम ली। जवानी की दहलीज पर पहुंचने से पहले ही दाग की शायरी जवां हो गई। उनके अंदाज-ए-बयां को इमाम बख्श सहबाई, गालिब और शेफ्ता जैसे तब के बड़े-बड़े शायरों ने सराहा। शायरी के लिए उन्होंने दाग को अपना तखल्लुस चुना। दिल्ली का होने के कारण वो दाग देहलवी कहलाए।
कोई नाम-ओ-निशां पूछे तो ऐ कासिद बता देना
तखल्लुस 'दाग' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
दाग ने लाल किले को खूब जिया। किले में सजने वाली तवायफों की महफिल उन्हे खूब रास आती। वो तवायफों के हुस्न के आगे अकसर हार जाते। मरते दम तक वो ऐसे ही रहे। हालांकि वो किसी अफलातूनी इश्क के शिकार नहीं हुए, वो तो बस खूबसूरत चेहरों के रसिया थे। अगर अच्छी सूरत पत्थर में भी नजर आ जाये तो वो उसके आशिक हो जाते।
बुत ही पत्थर के क्यों न हों ऐ दाग़
अच्छी सूरत को देखता हूं मैं
1857 की क्रांति के बाद लाल किले समेत दिल्ली की गलियों में खूब खून बहा। दाग को दिल्ली छोड़नी पड़ी। वो रामपुर चले गए। वहां उन्हें नवाब रामपुर कल्बे अली खां की सोहबत मिली। यहां भी उनकी रातें तवायफों के आगोश में बीतती।
50 से अधिक के हो चुके दाग को मुन्नीबाई हिजाब नाम की तवायफ से इश्क हो गया। हालांकि मुन्नीबाई को बस दौलत से इश्क था जो दाग से ज्यादा नवाब रामपुर के छोटे भाई हैदर अली के पास थी। मुन्नीबाई हिजाब के इश्क ने दाग की तड़प को उनके इस शेर से समझा जा सकता है जो उन्होंने हैदरअली को नजर की थी-
'दाग हिजाब के तीरे नजर का घायल है
आपके दिल बहलाने के और भी सामान हैं
दाग बेचारा हिजाब को न पाए तो कहा जाए ..
1887 में नवाब रामपुर कल्बे अली खां के निधन के बाद दाग को रामपुर रास ना आया। नए नवाब मुश्ताक अली खान को शेर-ओ-शायरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। दाग को रामपुर छोड़ना पड़ा। वो हैदराबाद चले गए।
दिल्ली से चलो दाग करो सैर दकन की
गौहर की हुई कद्र समुंदर से निकल कर
हैदराबाद के निजाम मीर महबूब अली ने उन्हें अपना उस्ताद बनाया। उनका रुतबा बढ़ने लगा। दौलत भी बेशुमार बरसने लगी। दौलत आई तो जिंदगी में फिर से तवायफें भी आईं। उन्होंने आगरा की मशहूर तवायफ साहिबा जान को नौकर रख लिया। उसके बाद मेरठ की उम्दा जान नौकर हुई जो गाने में माहिर थी। सूरत की अख्तर जान दाग की स्थाई मुलाजिम थी।
ये सैर है कि दुपट्टा उड़ा रही है हवा
छुपाते हैं जो वो सीना कमर नहीं छुपती
हमेशा नवाबों के बीच रहे दाग
तवायफों के लिए दाग की दीवानगी दिल बहलाने से ज्यादा कुछ नहीं थी। वो दिन में जो गजल कहते शाम को वही तवायफ को याद करा देते, खुद धुन बनाते, तर्ज सिखाते और अच्छी तरह से गवा कर सुनते। उसी रात वो तवायफ अपने कोठे पर वही गजल गाती जो दूसरी तवायफें भी याद कर लेतीं। अगली सुबह वही गजल सारे शहर में मशहूर हो जाती।
हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
दाग के दास्तान नवाबों और तवायफों की दुनिया में चर्चा-ए-खास हो गए। बात रामपुर में मुन्नीबाई हिजाब तक भी पहुंची। अचानक उसके दिल में दाग के लिए चाहत बढ़ गई। वो हैदराबाद पहुंच गई। दाग से हाल-ए-दिल बयां किया। 71 की उम्र में भी दाग मुन्नीबाई की खूबसूरती का मोह ना छोड़ पाए थे। उन्होंने उसे कुबूल किया और जिंदगी के आखिरी दिनों तक साथ रहे।
इश्क के साथ मुश्क के भी मुरीद थे दाग
मुगलों और नवाबों के बीच पले-बढ़े दाग अपनी शख्सियत को लेकर बेहद सजग रहते थे। उनकी गजलों में इश्क, हुस्न और नजाकत का जो रंग दिखाई देता है, उसी का असर उनके रहन-सहन में भी झलकता था। साफ-सुथरे कपड़े, सुंदर सा साफा और उम्दा इत्र उनके साथी थे। दाग इसे पूरे शौक से अपनाते थ। इत्र के तो वो बड़े दीवाने थे।
दाग देहलवी के बारे में मशहूर था कि वो ना तो एक तवायफ से संतुष्ट होते और ना ही एक खुशबू से। अलग-अलग मौकों के लिए अलग इत्र चुनते। कई बार तो वे एक साथ दो-तीन तरह के इत्र लगा लेते, ताकि उनकी खुशबू सबसे अलग और सबसे खास लगे। उन्हें गुलाब, केवड़ा, खस और ऊद से बने इत्र बेहद पसंद थे।
कहा जाता है कि अगर कोई उनसे मिलने आता और अच्छी खुशबू लगाकर आता, तो दाग उसे चूम लिया करते। महफिलों में उनके आने का अंदाजा लोग अकसर उनके कदमों की आहट से नहीं, हवा में फैली खुशबू से लगा लेते थे। लोग कहते दाग साहब के आने से पहले उनका इत्र दस्तक दे देता है।
मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जां चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है
दाग चाहे दिल्ली रहे, रामपुर रहे या फिर हैदराबाद, तवायफों और इत्र से मोहब्बत हमेशा करते रहे। उनके इश्क और मुश्क के चर्चे सालों तक नवाबों की महफिल में चर्चा-ए-खास का सामान रहे।
दाग को पूरे हिंदुस्तान ने अपनाया। हर जगह उनके मुरीद और शागिर्द हुए। उनको जो लोकप्रियता अपनी जिंदगी में मिली वो किसी और शायर को नहीं मिली। तोहमत और शोहरत दोनों साथ में मिले। दाग करीब 73 साल जिंदगी की धूप-छांव झेलकर 1905 में हैदराबाद में ही अपनी पत्नी के पहलू में हमेशा के लिए सुकून की नींद सो गये।
कोई नाम-ओ-निशां पूछे तो ऐ कासिद बता देना
तखल्लुस 'दाग' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
