मुंबई के मलाड इलाके की मरीना एन्क्लेव नामक बहुमंजिला इमारत में भीषण आग लगने की घटना के बाद शहर के तमाम रिहायशी इमारतों में फायर सेफ्टी के नियम और पालन का विषय एक बार फिर तूल पकड़ने लगा है। शहर में सैकड़ों ऐसी इमारतें जहां अग्नि सुरक्षा के नियमों को ताक पर रखकर लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। ऐसा ही एक मामला पश्चिम उपनगर के ओशिवारा इलाके का भी सामने आया है जहां एसआरए की इमारत में नियमों के उल्लंघन को लेकर दमकल विभाग ने डेवलपर को नोटिस थमा दिया है। सहयोग होम्स डेवलपर को जारी नोटिस में फायर ब्रिगेड ने 30 दिनों के भीतर फायर सेफ्टी के इंतजामों को दुरुस्त करने का निर्देश दिया है।

दमकल विभाग को नोटिस

दमकल विभाग को नोटिस
मुंबई के ओशिवारा में एक इमारत रहने वाले लोगों की जान के साथ खिलवाड़ हो रहा है, बिल्डर की मनमानी फायर रूल्स की धज्जियां उड़ा रहे हैं। बहरहाल दमकल विभाग ने डेवलपर को सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने को लेकर नोटिस जारी कर दी है। महाराष्ट्र सरकार लोगों को बेहतर जीवन देने के लिए झुग्गी झोपड़ियों का रीडेवलपमेंट कराती है। इस रीडेवलप को जो बिल्डर करते हैं उन्हें बदले में नई इमारत के लिए मंजूरी दी जाती है। जिसकी वो निजी तौर पर बिक्री करते हैं। लेकिन अक्सर रिडेवलपमेंट के फ्लैटों और निजी निर्माण में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। मामला है मुंबई के ओशिवारा इलाके का। यहां सहयोग होम्स नाम के डेवलपर की कथित मनमानी के चलते एसआरए की इमारत के करीब 189 घरों में रहने वालों लोगों की नींद उड़ी हुई है। शिकायत के मुताबिक डेवलपर ने इमारत के कॉमन पैसेज को लोहे के शिकंजों से कैद कर दिया है। यहां रह रहे लोगों को डर है कि इससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
मामले की गंभीरता को समझते हुए लोगों ने फायर डिपार्टमेंट में शिकायत दर्ज कराई, फायर डिपार्टमेंट ने इमारत का निरीक्षण भी किया और बिल्डर को नोटिस जारी कर दिया, नोटिस में बिल्डर को 30 दिन की भीतर सारी अनियमितताओं को ठीक करने को कहा गया है लेकिन हैरानी की बात ये है कि शिकायतकर्ताओं के मुताबिक बिल्डर को दो साल पहले भी ऐसी नोटिस मिल चुकी है, लेकिन बिल्डर के रूतबे के चलते सहयोग होम्स ने फायर डिपार्टमेंट को ठेंगा दिखा रखा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि नई प्राइवेट बिल्डिंग में ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में बिल्डर ने एसआरए प्रोजेक्ट में तमाम नियमों की अनदेखी की है।
गौरतलब है कि 2019 में देशभर में इमारतों में 11 हजार से अधिर आग लगने के मामले हुए हैं जिनमें 57% हिस्सा रेजीडेंशियल इमारतों का है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि फायर विभाग नोटिस भेजने के बाद भी कार्रवाई करने से क्यों हिचक रहा है? इतनी अनियमिताओं के बाद भी इस तरह की इमारत को स्थानीय निकायों से मंजूरी कैसे मिल जाती है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
(अरूनील की रिपोर्ट)
