Times Now Navbharat
live-tv
Premium

सीजफायर पर बातचीत नाकाम होने पर ट्रंप के सामने कौन-कौन से होंगे विकल्प? ईरान को घेरने की अब क्या हो सकती है रणनीति

सवाल है कि MoU पर जब बातचीत चल रही थी और सबकुछ ठीक-ठाक जा रहा था तो अचानक से होर्मुज में ईरान ने तीन तेल टैंकरों पर हमला क्यों कर दिया? क्या वह इस बात से अनजान था कि अमेरिका की तरफ से पलटवार नहीं होगा लेकिन पलटवार भी हुआ। क्या ईरान में कोई है जो नहीं चाहता कि पीस डील हो?

Image
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है।
Written by: Alok Rao
Updated Jul 10, 2026, 13:54 IST

US Iran Crisis: 'हम डील के बहुत करीब हैं, डील बस होने वाली है, बहुत शानदार डील है, ईरान डील के लिए बेताब है', ये शब्द अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हैं। ईरान के साथ 'मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' पर बातचीत शुरू होने से पहले वह लगातार इन शब्दों को दोहराते रहे लेकिन हाल ही में तुर्किये की राजधानी अंकारा में दो दिनों तक चले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) की बैठक में लगता है कि 'डील' शब्द से एक तरह से उन्हें 'मोहभंग' हो गया। ट्रंप ने बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि 'अब सीजफायर खत्म हो चुका है। एमओयू का अब उनके लिए कोई मतलब नहीं है। ईरान के लोग पागल हैं। उनके पास न्यूक्लियर हथियार होते तो वे उसका इस्तेमाल कर चुके होते।'

ईरान के 90 ठिकानों पर CENTCOM ने किए हमले

ट्रंप का यह बयान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन ऑयल टैंकरों पर हमले के बाद CENTCOM की जवाबी कार्रवाई के बाद आया। कुवैत, बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के पलटवार के बाद अमेरिकी सेना ने बुशहर न्यूक्लियर प्लांट सहित करीब 90 ठिकानों पर हमले किए। यानी जंग के मैदान में अमेरिका और ईरान एक बार आमने-सामने आ गए हैं। हालांकि, अमेरिकी सेना ने हमले रोक कर नरमी के संकेत दिए हैं। ईरान की तरफ से भी नए हमले नहीं हुए हैं। कूटनीतिक बातचीत का दरवाजा खुला हुआ है। एक्सपर्ट मान रहे हैं कि इन हमलों के बाद दोनों पक्ष करीब-करीब बातचीत शुरू होने से पहले वाली स्थिति में पहुंच गए हैं। यदि यहां से बातचीत बिगड़ती है तो ट्रंप के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

स्विटजरलैंड में MoU पर हुई बातचीत

बता दें कि 18 जून 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर के लिए ईरान के साथ एक 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से स्विटजरलैंड में बातचीत शुरू हुई। इस बैठक में अमेरिका की तरफ से उप राष्ट्रपति जेडी वेंस, ट्रंप के दामाद जेयर्ड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ शामिल हुए तो ईरान की तरफ से विदेश मंत्री अब्बास अराघची, ईरानी संसद के स्पीकर गालिबाफ और अन्य नेता शामिल हुए। दस्तावेज पर हस्ताक्षर को ट्रंप ने अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत बताया था। 14 बिंदुओं वाले इस MoU में होर्मुज खोलने, ईरान की संपत्तियां डिफ्रीज करने, सभी मोर्चों पर युद्ध रोकने, ईरान पर से प्रतिबंध हटाने और वहां निवेश करने जैसी बातें शामिल की गईं। होर्मुज इसलिए अहम है क्योंकि दुनिया का करीब 20 प्रतिशत ईंधन यहीं से गुजरता है। जब यह बंद हुआ तो दुनिया ने अब तक का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट झेला। समझौते के बाद तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से भी नीचे गिर गईं और लग रहा था कि हालात सुधर रहे हैं लेकिन यह शांति टिकाऊ साबित नहीं हुई। महज तीन हफ्तों बाद ही सीजफायर टूट गया।

strait of Hormuz

strait of Hormuz

क्या ईरान में हो रहा सत्ता का टकराव?

सवाल है कि MoU पर जब बातचीत चल रही थी और सबकुछ ठीक-ठाक जा रहा था तो अचानक से होर्मुज में ईरान ने तीन तेल टैंकरों पर हमला क्यों कर दिया? क्या वह इस बात से अनजान था कि अमेरिका की तरफ से पलटवार नहीं होगा लेकिन पलटवार भी हुआ। क्या ईरान में कोई है जो नहीं चाहता कि पीस डील हो? इस पर रिपोर्टों में कहा गया है कि सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई के मारे जाने के बाद ईरान में सत्ता का संघर्ष शुरू हो गया है। नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं और उनका कोई अता-पता नहीं है। ईरान की IRGC जो नियमित सेना के ढांचे से ऊपर है और जो सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है। माना जाता है कि देश के हर बड़े फैसले अब वही ले रही है। बताया जाता है कि युद्ध को लेकर IRGC का नजरिया राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद के स्पीकर गालिबाफ से अलग है। आईआरजीसी युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं जबकि ईरान के सियासतदां शांति के पक्ष में हैं। यानी अमेरिका से युद्ध को लेकर आईआरजीसी और ईरान का राजनीतिक नेतृत्व एक पेज पर नहीं है। दिक्कत यहीं है। सुप्रीम लीडर तक सीधी पहुंच IRGC की होती है। सुप्रीम लीडर से यदि किसी को मिलना भी है तो उसे पहले IRGC की इजाजत लेनी होती है। यहां तक कि ईरान का राष्ट्रपति भी अपनी मर्जी से सुप्रीम लीडर से नहीं मिल सकता। हालांकि, पेजेश्कियान ने कहा कि कुछ दिनों पहले वह सुप्रीम लीडर मोजतबा से मिले थे।

ट्रंप के सामने हैं 4 विकल्प!

एक्सपर्ट मान रहे हैं कि अब राष्ट्रपति ट्रंप के सामने चार बड़े विकल्प हैं लेकिन हर एक में भारी जोखिम है। इसमें सबसे पहला विकल्प है-मामले से पीछे हट जाना। इसका मतलब होगा कि दुनिया को यह मान लेना पड़ेगा कि होर्मुज जलसंधि पर विवाद बना ही रहेगा, जिससे ऊर्जा महंगी होगी और जहाजों का आना-जाना जोखिम भरा बना रहेगा, ऐसा होने पर अमेरिका की वैश्विक साख को झटका लगेगा। ट्रंप के माथे पर दाग लग जाएगा कि वह लाख कोशिशों के बावजूद होर्मुज खुलवा नहीं पाए। दूसरा विकल्प -ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला करना। इसमें ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे या बिजली संयंत्रों पर हमले या होर्मुज के तटीय इलाकों में जहां ईरान के सैन्य प्रतिष्ठान हैं वहां सैन्य कार्रवाई शामिल हो सकती है। एक और विकल्प है ईरान के खर्ग द्वीप पर कब्जा करना लेकिन इसमें अमेरिकी सैनिकों की जान जाने का बड़ा खतरा है। खर्ग द्वीप ईरान का सबसे बड़ा तेल भंडार है। यहां से करीब 90 प्रतिशत अपने तेल एवं गैस का निर्यात करता है। खर्ग द्वीप पर यूएस पहले भी हमला कर चुका है। पिछली बार उसने खर्ग द्वीप पर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया था।

'युद्ध छेड़ने के पीछे की सोच में शुरू से ही खामी थी'

तीसरा विकल्प -होर्मुज में फिर से नाकेबंदी लागू करना, यानी वही ब्लॉकेड नीति दोबारा अपनाना जिसे डील के तहत हटाया गया था। ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी दोबारा शुरू करने पर तेहरान पर काफी दबाव पड़ेगा और वह बातचीत एवं किसी समझौते की तरफ बढ़ेगा। चौथा और शायद सबसे मुश्किल विकल्प यह है कि कमजोर पड़ चुके संघर्षविराम को फिर से जीवित करने की कोशिश करना। भले ही इसके बदले ईरान को अरबों डॉलर की रियायतें देनी पड़ें।

Donald Trump

Donald Trump

अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट सांसद एडम स्मिथ का कहना है कि युद्ध छेड़ने के पीछे की सोच में शुरू से ही खामी थी क्योंकि ईरान को पूरी तरह झुकाना संभव ही नहीं था। यहां तक कि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पूर्ण युद्ध भी ईरान की जलसंधि को धमकाने की क्षमता को खत्म नहीं कर पाएगा क्योंकि मुट्ठी भर ड्रोन भी दूर से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए काफी हैं।

हर विकल्प में यूएस को नुकसान

इस युद्ध का सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। अलजजीरा की एक रिपोर्टों में कहा गया है कि अमेरिका का आपातकालीन तेल भंडार जिसे स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व कहा जाता है। वह युद्ध-पूर्व स्तर से 23% घट चुका है और यह 1983 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। इसका मतलब है कि अगर भविष्य में होर्मुज फिर पूरी तरह बंद होता है तो अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ेगी। कुल मिलाकर ट्रंप के सामने अब कोई आसान रास्ता नहीं बचा है। हर विकल्प के साथ या तो सैन्य जोखिम जुड़ा है या आर्थिक कीमत, या फिर राजनीतिक शर्मिंदगी। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए आगे की राह आसान नहीं है।

End of Article